शनिवार, 22 नवंबर 2008

विवाह समय निर्घारण में मंद ग्रहों की भूमिका ( Astrology )

विवाह पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था के लिए एक महवपूर्ण मांगलिक कार्य है। युवकों और युवतियों के विवाह योग्य उम्र में प्रवेश करते ही माता-पिता और अभिभावक उनके विवाह के लिए चिन्तित हो जाते हैं , ताकि उन्हें अपने दायित्व से छुट्टी मिले। यदि विवाह-निर्धारण में थोड़ा भी विलंब होता है ,तो अधिकांश अभिभावक विवाह के निश्चित समय की जानकारी के लिए ज्योतिषियों से भी परामर्श देखे जाते हैं । कभी किसी ज्योतिषी की बातें सच निकलती हैं तो कभी झूठ भी , ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अभी तक ज्योतिष की पुस्तकों में कोई ऐसा निश्चित सूत्र उपलब्ध नहीं है ,जिसे आधार पर हम किसी जातक के विवाह समय की निश्चित जानकारी प्राप्त कर सकें। इसे बावजूद प्राय: सभी जन्मपत्रों में शादी की कोई न कोई निश्चित उम्र लिखी हुई पायी जाती है। इस निश्चित उम्र का उल्लेख परंपरावादी पंडित किस आधार पर करते हैं ,यह तो वे ही जानते होंगे, परंतु इसमें सत्यता बिल्कुल नहीं होती ,इसे हमने महसूस किया है।

जहॉ तक हमारा विचार है , ज्योतिष शास्त्र में ऐसा कोई भी सिद्धांत विकसित नहीं किया जा सकता है ,जिससे विवाह उम्र की निश्चित जानकारी प्राप्त हो सके । इसका कारण यह है कि विवाह उम्र के निर्धारण में परिवार ,समाज ,युग ,वातावरण और परिस्थितियों की भूमिका ग्रह-नक्षत्र से अधिक महत्वपूर्ण होती है। प्राचीनकाल में भी वही 12 राशियां होती थीं ,वही नवग्रह हुआ करते थें, दशाकाल का गणित वही था ,उसी के अनुसार जन्मपत्र बनते थे । उस समय विवाह की उम्र 5 वर्ष से भी कम होती थी , फिर क्रमश: बढ़ती हुई 10.15.20.25.से 30 वर्ष तक हो गयी है । अभी भी अनेक जन-जातियों में बाल-विवाह की प्रथा है। क्या उस समाज में विशेष राशियों और नक्षत्रों के आधार पर जन्मपत्र बनते हैं ? यदि नही तो यह अंतर क्यों ? इसलिए हमारी धारणा है कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय ही उसके विवाह वर्ष को नहीं बतलाया जा सकता । हॉ , परिवार ,समाज और युग का अनुमान लगाते हुए ग्रहों के प्रभाव के सापेक्ष विवाह समय की जानकारी किसी हद तक अवश्य दी जा सकती है।


आज भारतवर्ष में मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय परिवारों में युवतियों के विवाह की उम्र 20 वर्ष से 25 वर्ष और युवकों के विवाह की उम्र 25 वर्ष से 30 वर्ष बिल्कुल सामान्य हो गयी है। इससे पूर्व इनके विवाह की बात सोंची भी नहीं जाती है। यदि युवकों के विवाह 30 वर्ष के पश्चात् एवं युवतियों के 25 वर्ष के पश्चात् हों तो आज की परिस्थिति में विवाह में विलम्ब कहा जा सकता है । इस लेख को लिखने के पूर्व हमने अनेक जन्मपत्रियों का विस्तृत अध्ययन किया। हमने पाया कि जिन युवतियों के सातवें भाव का स्वामी बुध काफी मजबूत हो या सातवीं राशि में मजबूत बुध की उपस्थिति हो या सातवें राशीश के साथ मजबूत बुध की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उन युवतियों का विवाह जल्द हो जाता है।विवाह के पश्चात् उन्हें अच्छा माहौल ,हर प्रकार की सुख सुविधा ,प्रतिष्ठा और प्यार मिल पाता है तथा विवाह के प्रारंभिक वर्षों में वे सुखी होती हैं। इसके विपरीत , जिन युवतियों के सातवें भाव का स्वामी बुध काफी कमजोर हो या सातवीं राशि में कमजोर बुध की उपस्थिति हो या सातवें राशीश के साथ कमजोर बुध की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उन युवतियों का विवाह जल्द हो जाता है। विवाह के पश्चात् घर-गृहस्थी में अनेक प्रकार की समस्याएं और कष्ट दिखाई पड़ते हैं तथा विवाह के प्रारंभिक वर्षों में वे दाम्पत्य सुख में कमी प्राप्त करती हैं।


जिन युवकों एवं युवतियों के सातवें भाव का स्वामी कमजोर मंगल हो या या सातवें भाव में कमजोर मंगल की उपस्थिति हो या सप्तमेश के साथ कमजोर मंगल की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उनके विवाह में देर होने की भी संभावना होती है या जल्दी विवाह हो भी जाए तो 30 वर्ष की उम्र तक दाम्पत्य जीवन कमजोर बना रहता है। 30 वर्ष की उम्र के बाद ही इसमें कुछ सुधार देखा जा सकता है ,वैसे पूरे सुधार की उमीद 36 वर्ष की उम्र के बाद ही की जा सकती है। इसके विपरित जिन युवकों एवं युवतियों के सातवें भाव का स्वामी मजबूत मंगल हो या सातवें भाव में मजबूत मंगल की उपस्थिति हो या सप्तमेश के साथ मजबूत मंगल की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उनका विवाह 24 वर्ष का उम्र से 30 वर्ष की उम्र तक या कभी कभी 32 वें वर्ष में भी होने की संभावना होती है । विवाह के पश्चात् उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय व्यतीत होता है । जिन युवकों एवं युवतियों के सातवें भाव का स्वामी शुक्र हो या या सातवें भाव में शुक्र की उपस्थिति हो या सप्तमेश के साथ मंगल या बुध की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय न हो तो उनके विवाह में अधिक देर होने की संभावना होती है । इनका विवाह 31वें वर्ष या कभी-कभी 36वें वर्ष तक भी होता है।


उपरोक्त बातों से किसी भी जन्मकुंडली से मोटे तौर पर जातक के विवाह की उम्र निकाली जा सकती है ,किन्तु सूक्ष्म गणना के लिए ग्रहों की गोचर के चाल को जानना आवश्यक होगा। हमने पाया है कि विवाह-समय के निर्धारण में मंद ग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।सभी ग्रह वक्री होने से पूर्व और मार्गी होने के बाद बिल्कुल धीमी गति में चलते हैं। ग्रह सामान्य तब होते हैं ,जब ये पृथ्वी से औसत दूरी पर अपनी औसत गति में होते हैं। पृथ्वी को स्थिर मानकर जब हम भचक्र की संपूर्ण राशियों और सभी ग्रहों का अध्ययन करते हैं , तो हमें सभी ग्रहों का एक-एक काल्पनिक पथ प्राप्त होता है , जिनमें सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं। ज्योतिषीय पंचांगों का आधार ये काल्पनिक पथ हैं , जहॉ ग्रह अतिशीघ्री , समरुप , मंद और वक्री होते हैं। कभी-कभी ये ग्रह बिल्कुल स्थिर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति वक्री होने से कुछ दिन पूर्व और मार्गी होने के कुछ दिन पश्चात् बनती है। इस स्थिति में ग्रह अचल होते हैं। ये काफी उर्जावान होते हैं । `गत्यात्मक दशा पद्धति´ के अनुसार बुध ग्रह 10 दिन पूर्व से वक्री होने के दिन तक तथा मार्गी होने के दिन से 10 दिन बाद तक मंद गति में होता है । शुक्र ग्रह डेढ़ महीने पूर्व से वक्री होने के दिन तक तथा मार्गी होने के दिन से डेढ़ हीन बाद तक मंद गति में होता है। शनि और बृहस्पति एक महीने पूर्व से वक्री होने के दिन तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होते है। वैवाहिक कार्यक्रमों में मंद ग्रहों की निश्चित ही बडी भूमिका होती है , किन्तु किस ग्रह के मंद रहने पर किस जातक का विवाह संपन्न या निश्चित होगा , इसकी जानकारी महत्वपूर्ण है।इस संबंध में तीन बातें देखी गयी है--------


जिस जातक के सातवें भाव का राशीश ग्रह मजबूत स्थिति में हो , उसका विवाह सामान्यतया उसी ग्रह की मंद स्थिति में संपन्न होता है। जब भी सातवें भाव का स्वामी मंद होगा , कहीं न कहीं वैवाहिक संबंधों की बात चलती रहेगी , विवाह तय या संपन्न भी होगा।


जिन जातकों के सातवें भाव का राशीश ग्रह कमजोर स्थिति में हो , उनका विवाह दूसरे उन ग्रहों के मंद रहने पर होता है , जो उनके जन्मकाल में सातवें भाव में मजबूत होकर स्थित होते हैं।


जिन जातकों के सातवें भाव का राशीश ग्रह कमजोर स्थिति में हों और उनके सातवें भाव में किसी मजबूत ग्रह की उपस्थिति न हो , तो वैसे जातकों का विवाह गोचर में सातवे भाव में किसी ग्रह के मंद होने पर होता है।



गोचर में 13 दिसम्बर 2008 को शनि ग्रह सूर्य से 90 डिग्री की कोणात्मक दूरी पर स्थित सामान्य शक्ति होगा। शनि ग्रह मकर और कुभ राशि का स्वामी है और इस समय इसकी स्थिति सिंह राशि में है। ये राशियां क्रमश: कर्क , सिंह और कुंभ लग्नवालों का सातवॉ भाव है , इसलिए इन लग्नवालों के वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना बना रहेगा और विवाह की संभावना के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण रहेगा। 30 दिसंबर तक दिन-प्रतिदिन बातचीत में गंभीरता आती जाएगी और इस समय तक अधिकांश युवक-युवतियॉ प्रणय-सूत्र में बंध भी चुके होंगे , परंतु इसके बाद जैसे ही शनि ग्रह वक्री होना आरंभ होगा , वैवाहिक संदर्भों या बातचीत में कुछ न कुछ बाधा उपस्थित होगी। 9 मार्च 2009 के आसपास स्थिति बहुत ही बिगड़ी हुई रहेगी। रोशनी की एक किरण भी दिखाई नहीं देने से माहौल तनाव देनेवाला बन जाएगा , किन्तु 16 मई 2009 को शनि ग्रह के मार्गी होते ही पुन: वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना आरंभ होगा और विवाह होने की संभावना दिखाई पड़ने लगेगी । 6 जून 2009 तक इनमें से अधिकांश के विवाह संपन्न हो चुके होंगे।


गोचर में 16 जनवरी 2009 को शुक्र ग्रह सूर्य से 45 डिग्री की कोणात्मक दूरी पर स्थित सामान्य शक्ति का होगा। शुक्र ग्रह वृष और तुला राशि का स्वामी है और इस समय इसकी स्थिति कुंभ और मीन राशि में होगी। ये राशियॉ क्रमश: वृश्चिक , मेष ,सिंह और कन्या लग्नवालों का सातवॉ भाव है , इसलिए इन लग्नवालों के वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना बना रहेगा और विवाह की संभावना के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण रहेगा। 7 मार्च 2009 तक दिन-प्रतिदिन संबंधों में गंभीरता आती जाएगी और इस समय तक अधिकांश युवक-युवतियॉ प्रणय-सूत्र में बंध भी चुके होंगे , परंतु इसके बाद जैसे ही शुक्र ग्रह वक्री होना आरंभ होगा , वैवाहिक संदर्भों या बातचीत में कुछ न कुछ बाधा उपस्थित होगी। 28 मार्च 2009 के आसपास स्थिति बहुत ही बिगड़ी हुई रहेगी। रोशनी की एक किरण भी दिखाई नहीं देने से माहौल तनाव देनेवाला बन जाएगा , किन्तु 18 अप्रैल 2009 को शुक्र ग्रह के मार्गी होते ही पुन: वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना आरंभ हो जाएगा और विवाह होने की संभावना दिखाई पड़ने लगेगी । 14 जून 2009 तक इन लग्नवालों में से अधिकांश के विवाह संपन्न हो चुके होंगे ।


इस वर्ष गोचर में 16 मई से 16 जून 2009 तक बृहस्पति ग्रह बहुत अधिक क्रियाशील होगा बृहस्पति ग्रह धनु और मीन राशि का स्वामी है और इस समय इसकी स्थिति मकर और कुंभ राशि में होगी। ये राशियां मिथुन , कर्क , सिंह और कन्या लग्नवालों का सातवॉ भाव है , इसलिए इन लग्नवालों के वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना बना रहेगा और विवाह की संभावना के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण रहेेगा। इस समय तक अधिकांश युवक-युवतियॉ प्रणय-सूत्र में बंध भी चुके होंगे।
इसी प्रकार गोचर में 29 दिसम्बर 2008 को बुध ग्रह सूर्य से 25 डिग्री की कोणात्मक दूरी पर स्थित सामान्य शक्ति का होगा। बुध ग्रह मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है और इस समय इसकी स्थिति मकर राशि में होगी। ये राशियॉ क्रमश: धनु , मीन और कर्क लग्नवालों का सातवॉ भाव है , इसलिए इन लग्नवालों के वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना बना रहेगा और विवाह की संभावना के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण रहेगा। 12 जनवरी 2009 तक दिन-प्रतिदिन संबंधों में गंभीरता आती जाएगी और इस समय तक अधिकांश युवक-युवतियॉ प्रणय-सूत्र में बंध भी चुके होंगे , परंतु इसके बाद जैसे ही बुध ग्रह वक्री होना आरंभ होगा , वैवाहिक संदर्भों या बातचीत में कुछ न कुछ बाधा उपस्थित होगी। 21 जनवरी के आसपास स्थिति बहुत ही बिगड़ी हुई रहेगी। रोशनी की एक किरण भी दिखाई नहीं देने से माहौल तनाव देनेवाला बन जाएगा , किन्तु 1 फरवरी 2009 को बुध ग्रह के मार्गी होते ही पुन: वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना और विवाह होने की संभावना दिखाई पड़ने लगेगी । 14 फरवरी 2009 तक इन लग्नवालों में से बहुतों के विवाह संपन्न हो चुके होंगे ।


पुन: गोचर में 25 अप्रैल 2009 को बुध ग्रह सूर्य से 27 डिग्री की कोणात्मक दूरी पर स्थित सामान्य शक्ति का है। बुध ग्रह मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है और इस समय इसकी स्थिति वृष राशि में होगी। ये राशियॉ क्रमश: धनु और मीन और वृश्चिक लग्नवालों का सातवॉ भाव है , इसलिए इन लग्नवालों के वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना बना रहेगा और विवाह की संभावना के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण रहेगा। 8 मई 2009 तक दिन-प्रतिदिन संबंधों में गंभीरता आती जाएगी और इस समय तक अधिकांश युवक-युवतियॉ प्रणय-सूत्र में बंध भी चुके होंगे , परंतु इसके बाद जैसे ही बुध ग्रह वक्री होना आरंभ होगा , वैवाहिक संदर्भों या बातचीत में कुछ न कुछ बाधा उपस्थित होगी। 18 मई 2009 के आसपास स्थिति बहुत ही बिगड़ी हुई रहेगी। रोशनी की एक किरण भी दिखाई नहीं देने से माहौल तनाव देनेवाला बन जाएगा , किन्तु 31 मई को बुध ग्रह के मार्गी होते ही पुन: वैवाहिक प्रस्तावों का आना-जाना आरंभ होगा और विवाह होने की संभावना दिखाई पड़ने लगेगी । 15 जून 2009 तक इन लग्नवालों में से बहुत के विवाह संपन्न हो चुके होंगे ।


इस प्रकार इस वर्ष विभिन्न लग्नवालों के विवाह की संभावना इन समयों में बनीं रहेगी -------------



मेष लग्न -- 16 जनवरी से 7 मार्च , 18 अप्रैल से 14 जून 2009,
मिथुन लग्न -- 16 मई से 16 जून 2009
कर्क लग्न -- 13 दिसम्बर से 30 दिसम्बर 2008, 29 दिसम्बर 2008 से 14 फरवरी 2009 , 16 मई से 16 जून 2009,
सिंह लग्न -- 13 दिसम्बर से 30 दिसम्बर 2008 , 16 जनवरी से 7 मार्च , 18 अप्रैल से 16 जून 2009,
कन्या लग्न -- 16 जनवरी से 7 मार्च , 18 अप्रैल से 16 जून 2009,
वृिश्चक लग्न -- 16 जनवरी से 7 मार्च ,18 अप्रैल से 15 जून 2009,
धनु लग्न -- 29 दिसम्बर 2008से 14 फरवरी 2009, 25 अप्रैल से 15 जून 2009,
कुंभ लग्न -- 13 दिसम्बर से 30 दिसम्बर 2008, 16 मई से 6 जून 2009,
मीन लग्न -- 29 दिसम्बर 2008 से 14 फरवरी , 25 अप्रैल से 15 जून 2009

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

कमजोर चंद्रमाःअसाधारण व्यक्तित्व ( Astrology )


गत्यात्मक ज्योतिष में सूर्य से 40 डिग्री तक की दूरीवाले चांद को कमजोर माना जाता है , जिसके कारण बाल्यावस्था के वातावरण में किसी प्रकार की कमी रह जाती है , जिसे बच्चा मन ही मन महसूस करता है और बाद के जीवन में यदि अन्य ग्रह उसकी मदद करते हैं तो वह अपनी कमजोरी को दूर करने के लिए असाधारण कार्य कर डालता है और असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है। इस प्रकार किसी महान व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में कमजोर चंद्रमा की बहुत बड़ी पृष्ठभूमि होती है—-.



झांसी की महारानी लख्मीबाई का जन्म संवत्1891 में कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष कह चतुर्दशी तिथि को तुला लग्न में हुआ था। इनका चंद्रमा दशम भावाधिपति कमजोर होकर लग्न में स्थित है , इसलिए उन्होनें बाल्यावस्था में शरीर और पिता के सुख में कमी का अहसास किया और इसकी क्षतिपूर्ति के लिए ऐसा असाधारण कार्य कर बैठी कि पूरी दुनिया उनके व्यक्तित्व का लोहा मानती है और प्रतिष्ठा देती है।



महात्मा गांधी का जन्म 02.10.1869 को तुला लग्न में ही हुआ था , चंद्रमा दशम भावाधिपति एकादश भाव में स्थित है , इस कारण बचपन में लाभ और प्रतिष्ठा की कमी महसूस की आर ऐसा असाधारण कार्य कर डाला कि पूरी दुनिया इनके लाभ प्राप्ति के तरीके की इज्जत करती है।



पं रविन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 07.05.1861 में मीन लग्न में हुआ था , कमजोर चंद्रमा बुद्धि का अधिपति लग्न में स्थित है , इसलिए बाल्यावस्था की शारीरिक और बौद्धिक कमजोरी को दूर करने के लिए बाद में असाधारण पुस्तकें लिखकर असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बन गए।



हैदर अली शाह ने दिसम्बर 1772 में तुला लग्न और वृश्चिक राशि में जन्म लिया था , यानि कमजोर चंद्रमा दशम भावाधिपति द्वितीय भाव में स्थित था। इन्होनें बाल्यावस्था में पिता , प्रतिष्ठा और धन तीनों की कमी को महसूस किया और बाद के जीवन में तीनों को ही मजबूती दे सकें।



श्री आदि शंकराचार्य ने कर्क लग्न में जन्म लिया था , इनका लग्नाधिपति कमजोर चंद्रमा लाभ स्थान में स्थित था , जिसके कारण बाल्यावस्था में शारीरिक कष्ट और लाभ की कमी को महसूस किया और बाद में शरीर लाभ का असाधारण कार्य कर बैठे।



स्वर्गीय देवकी नारायण खत्रीजी का जन्म संवत् 1924 पौष कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मिथुन लग्न में हुआ था , द्वितीय भावाधिपति चंद्रमा कमजोर होकर षष्ठ भाव में स्थित है, जिसके कारण इन्होनें बाल्यावस्था में झंझटों , पेचीदगियों जैसी समस्याओं के कारण आर्थिक कमजोरी महसूस की और बाद में अनेक जासूसी और तिलिस्मी उपन्यास लिखे , जिनसे उन्हें आर्थिक लाभ हुआ।



रामकृष्ण परमहंसजी का जन्म 18.02.1836 को कुंभ लग्न में हुआ था , इनका षष्ठ भावाधिपति चंद्रमा कमजोर होकर लग्न में स्थित है , जिसके कारण बाल्यावस्था में इन्होनें शारीरिक और अन्य जटिलताओं को महसूस किया और बाद में मोक्ष की प्राप्ति हेतु असाधारण कार्य कर बैठे।



मथुरा के प्रसिद्ध सुख संचारक कंपनी के मालिक पं क्षेत्रपाल शर्माजी ने कुंभ लग्न और मकर राशि के अंतर्गत जन्म लिया था , षष्ठ भावाधिपति चंद्रमा द्वादश भाव में स्थित था , जिसके कारण बाल्यावस्था में रोगों की उपस्थिति और क्रयशक्ति की कमजोरी का अनुभव किया और बाद में विश्व स्तर पर लोकप्रिय होनेवाली असाधारण दवाइयां निकाली।



भगवान रजनीश का जन्म 11.12.1931 को कुंभ लग्न में हुआ था , इनका भी षष्ठ भावाधिपति चंद्रमा एकादश भाव में स्थित है , इस कारण बाल्यावस्था में अनेक प्रकार के झंझटों के कारण लाभप्राप्ति के लिए अपने को कमजोर पाया और बाद में लाभप्राप्ति के अनोखे मार्ग को चुना तथा असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बनें।



फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन का जन्म 10.10.1942 को मीन लग्न मे हुआ था , पंचम भावाधिपति चंद्रमा कमजोर होकर अष्टम भाव में स्थित है , जिसके कारण बाल्यावस्था में बौद्धिक और जीवनशैली की कमजोरी महसूस की और उसे दूर करने के लिए असाधारण कार्य कर असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बनें।