शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

प्रेम विवाह या अभिभावक द्वारा आयोजित विवाह ( Astrology )

आज के परिवेश में बच्‍चों के पालन पोषण में अभिभावकों की बढती उदारता से बच्‍चे न सिर्फ स्‍वतंत्र , वरन उच्‍छृंखल भी हो गए हैं। इस कारण अपने दोस्‍तों के साथ उनके व्‍यवहार में काफी खुलापन आ गया है , जिसको देखते हुए पुराने ख्‍यालात के अभिभावक अक्‍सर परेशान हो जाते हैं। यही कारण है कि आजकल सयाने बेटे बेटियों की कुंडलियों को लेकर आनेवाले अभिभावकों का एक सामान्‍य सा प्रश्‍न हो गया है कि उनके बच्‍चे प्रेम विवाह करेंगे या उनके द्वारा तय किया गया विवाह ? इस प्रश्‍न का जवाब देने के लिए कुंडली के सप्‍तम भाव पर ही ध्‍यान दिया जा सकता था , क्‍योंकि परंपरागत ज्‍योतिष में यही भाव पति , पत्‍नी , घर गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य जीवन से लेकर प्‍यार और रोमांस तक के बारे में बतलाता है। यही सोंचकर मैने प्रेम विवाह करने वाले अनेको लोगों की कुंडलियों का परंपरागत ढंग से विवाह करनेवालों की कुंडलियों के साथ तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने में काफी समय जाया किया , पर फल वही ढाक के तीन पात। काफी माथापच्‍ची में कुछ दिन व्‍यतीत होने और किसी निष्‍कर्ष पर न पहुंच पाने से मैं कुछ परेशान ही थी कि अचानक एक काफी बुजुर्ग महिला की कुंडली मेरे पास पहुंची , जिन्‍होने प्रेम विवाह किया था और उस विवाह के कारण उन्‍हें वर्षों तक बहुत ही दर्दनाक परिस्थितियों से गुजरना पडा था। कुछ दिनों तक अपने दोनो परिवारों और समाज से बहिष्‍कृत होने के बाद जब वह ससुराल में रहने लगी थी तो उनपर चोरी तक का इल्‍जाम लगाया गया था। उक्‍त महिला की जन्‍मकुंडली में प्रेम विवाह के कारण उत्‍पन्‍न होने का यह संघर्ष दिखायी पड रहा था। मुझे इस बात पर आश्‍चर्य हुआ कि जब उनकी कुंडली में प्रेम विवाह स्‍पष्‍ट दिखाई पड रहा है , तो अन्‍यों में क्‍यों नहीं दिखाई दे रहा ?


पर तुरंत बाद ही इसका रहस्‍य मेरी समझ में आ ही गया , वह यह कि 20-25 वर्ष पहले के सामाजिक और पारिवारिक स्थिति में विवाहपूर्व प्रेम मानो एक तरह का अपराध ही था और प्रेम विवाह तो बहुत ही असामान्‍य तरह की घटना होती थी । यहां तक कि विवाह तय होने के बाद भी युवक युवतियों को एक दूसरे से मिलने की सख्‍त मनाही होती थी। बहुत उन्‍नत विचारों वाले परिवार में ही युवा अपने जीवन साथी को देख पाते थे , अन्‍यथा अधिकांश जगहों पर विवाह के बाद ही अपने जीवनसाथी की एक झलक तक मिलती थी। मुझे याद आया , जब मैं कालेज में पढ ही रही थी , अपने कालेज के एक सीनियर के प्रेम की बात उसके परिवारवालों के द्वारा स्‍वीकार नहीं किए जाने पर उन्‍होने छुपकर कोर्ट में विवाह कर लिया था तो दोनो ही परिवार के लोग इसे पचा नहीं सके थे और लगभग दस वर्ष तक उन्‍हें अपने परिवारवालों से मिले जुले बिना ही काटनी पडी थी , जबकि दोनो पढे लिखे और भौतिकी के लेक्‍चरर थे और उन्‍होने सोंच समझकर ही निर्णय लिया था। हां , स्‍वजातीय या अपने किसी परिचित के संतान होने पर एक दो प्रतिशत से भी कम मामलों में ही सही , प्रेम करनेवालों की सुन ली जाती थी और उन्‍हें खुशी खुशी वैवाहिक बंधन में बंधने की स्‍वीकृति मिलती थी।


पर आज प्रेम विवाह या परिवार द्वारा आयोजित किए जानेवाले विवाह में कोई अंतर नहीं रह गया है। यदि युवा किसी से प्रेम भी करते हैं तो भले ही कुछ दिन इंतजार करना पडे , पर अपने अपने अभिभावकों को विश्‍वास में ले ही लेते हैं और आखिर में उनकी रजामंदी से प्रेम विवाह को अभिभावक के पसंदीदा विवाह में बदल ही दिया जाता है। सारे नाते रिश्‍तेदारों के मध्‍य उत्‍सवी माहौल में न सिर्फ उनका विवाह ही करवाया जाता है , वरन् उनके प्रेम का कोई गलत अर्थ न लगाते हुए उनके चुनाव की प्रशंसा भी की जाती है। यदि परिवारवालों की पसंद के अनुसार भी विवाह हो रहा हो , तो भी विवाह पूर्व युवकों और युवतियों को एक दूसरे से मिलने और एक दूसरे को समझने की पूरी स्‍वतंत्रता मिल ही जाती है। इस कारण उनके मन में न तो कोई संदेह होता है और न ही अनिश्चितता । अब इस स्थिति में इन दोनो प्रकार के विवाह को परिभाषित करने के लिए क्‍या कोई विभाजन रेखा खींची जा सकती है ? यही कारण है कि हमें आजकल के युवकों और युवतियों की जन्‍मकुंडली में भी इस बात का कोई संकेत नहीं दिखाई देता है कि जातक प्रेम विवाह करेंगे या अरेंज्‍ड ?

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

मौसम की भविष्‍यवाणी की एक बडी विधा ( Astrology )

वसंत के मौसम में इस कोहरे ,ठंड,बारिशऔरबर्फबारीके कारण किसानों , यात्रियों और अन्‍य लोगों को जितना भी नुकसान हो रहा हो , पर आकस्मिक रूप से उत्‍पन्‍न हुए दो चार दिनों के मौसम पर और मौसम से संबंधित खबरों के कारण मेरी भविष्‍यवाणियों के सत्‍य होने से मुझे तो एक बार फिर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष को विज्ञान साबित कर पाने में कामयाबी मिल गयी है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । इससे पहले 2 और 3 जनवरी के मौसम के बारे में की गयी मेरी भविष्‍यवाणीभी सटीक साबित हो चुकी है। 9 और 10 फरवरी के विशेष ग्रहीय योग के कारण मौसम में जो परिवर्तन की बात कही गयी थी , वह बोकारो में 9 फरवरी तक नहीं देखी जा सकी थी । यूं तो मेरे ईमेल में आए कई पत्र यत्र तत्र मौसम के बदलने की जानकारी दे रहे थे , पर मैंने 9 फरवरी को दिनभर बालकनी में आ आकर आसमान को देखते हुए और टी वी खोलकर मौसम की खबरे सुनते हुए व्‍यतीत कर दी थी , पर पूरे भारतवर्ष में मौसम का एक खास खबर बनकर न आ पाना मेरे गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के साथ साथ मेरे आत्‍मविश्‍वास को भी कमजोर बना रहा था। मौसम के मामले में बोकारो का देर से प्रभावित होना भी अक्‍सर मुझे परेशान कर देता है। ऐसी स्थिति में हमेशा ही मेरे पति और बच्‍चे मुझे और तंग करना आरंभ कर देते हैं कि जिस बात पर मैं कन्‍फर्म रहूं , वैसी ही भविष्‍यवाणी करूं , क्‍यो मैं इतना रिस्‍क लेकर डेट देकर भविष्‍यवाणी किया करती हूं । अब मैं दूसरे को क्‍या समझा सकती हूं कि किसी भी सिद्धांत की प्रामाणिकता तो उससे संबंधित तिथि के साथ ही होने से हो सकती है और इसमें अपवाद की संभावना तो रहती ही है , हालांकि मौसम से संबंधित भविष्‍यवाणी की हमारी बहुत पुरानी खोज है और अभी तक इसमें अपवाद देखने को नहीं मिला है , पर फिर भी शब्‍दकोष में अपवाद शब्‍द होने का मतलब ही है कि यह कहीं भी किसी रूप में आ सकता है।


इसी स्थिति में मुझे याद आ गया वह दिन , जब मैने मौसम से संबंधित इस गत्‍यात्‍मक सिद्धांत की जानकारी प्राप्‍त की थी। शायद 2000 की बात थी , जब अप्रैल या मई में मेरे पिताजी बोकारो पहुंचे थे। उनके आने की खबर सुनकर यहां के कुछ पत्रकार उनसे मिलने आए , नजदीक में राजनीति का कोई बडा मुददा उपस्थित नहीं होनेवाला था , जबकि दो दिनों बाद भयंकर आंधी तूफान के आने की संभावना थी , इसलिए पिताजी ने उनके समक्ष यही भविष्‍यवाणी की थी । गर्मी के महीने में धूप की मौजूदगी में कोई ऐसी भविष्‍यवाणी करे , तो अचंभा तो होता ही है , पर मै उस बारे में आश्‍वस्‍त नहीं थी । दूसरे दिन रात काफी देर तक वे टी वी पर न्‍यूज देखते रहें , मौसम विभाग की ओर से भी ऐसी कोई भविष्‍यवाणी नहीं दी गयी थी। मध्‍य रात्रि में अचानक बडे जोर के आंधी , तूफान , बादलों के गरजने और पानी के बरसने से मेरी नींद टूटी , तो मैं टी वी का केबल हटाने टी वी वाले उसी कमरे में गयी , जहां मेरे पिताजी सोए हुए थे , क्‍योकि उस समय एंटीना से हमलोग टी वी देखते थे । पिताजी ने कहा कि उन्‍होने रात को ही केबल हटा दिया था , क्‍योंकि ग्रहों की यह स्थिति थी और इसके कारण रात मौसम में गडबडी आने की संभावना थी। यह मेरे लिए बहुत बडा आश्‍चर्य था , क्‍योकि गर्मी का दिन था इसलिए सामान्‍य स्थिति में टी वी का केबल हटाने का कोई प्रश्‍न ही नहीं था। इसके बाद तो मौसम से संबंधित सारे सिद्धांतों को सिखाए बिना मैने उन्‍हें बोकारों से जाने ही नहीं दिया और तब से ही मौसम से संबंधित मेरी भविष्‍यवाणियों में कभी अपवाद देखने को नहीं मिला।

उपर की घटना आपको अतिशयोक्ति भी लग सकती है , पर ऐसा नहीं है। एक ही साथ हम पूरे वर्ष की ऐसी तिथियों से अवगत करा सकते हैं। एक बात और , मौसम के बारे में भविष्‍यवाणी कर पाने का एक भी फार्मूला प्राचीन पुस्‍तकों से नहीं लिया गया है , क्‍योकि 2 और 3 जनवरी तथा 9 और 10 फरवरी के दिन आसमान में ग्रहों की स्थिति को किसी भी पारंपरिक पद्धति से एक जैसा नहीं कहा जा सकता है। इन तिथियों में समानता है , तो सिर्फ सारे ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति की , जिसे सिर्फ और सिर्फ गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र द्वारा विकसीत किया गया है। अब आगे बढते हैं , 1 से 4 मई 2009 , गर्मियों का दिन है , पर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष का दावा है कि उस समय लगभग पूरे भारतवर्ष में मौसम गडबड रहेगा । सरकार का अरबों रूपए खर्च करने के बावजूद मौसम विभाग तीन महीने पहले इस प्रकार की कोई भविष्‍यवाणी नहीं कर सकता , पर जहां भविष्‍यवाणी की एक बडी विधा विकसित की जा चुकी है ,उसे बुद्धिजीवी वर्ग अंधविश्‍वास कहकर देश का कितना बडा नुकसान कर रहे हें ,वे नहीं बता सकते।