शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

शुक्रिया ... जी छत्‍तीसगढ 24 घंटे ( Astrology )

पता नहीं , कल शाम का चंद्र-शुक्र के मिलन का खूबसूरत और अद्भुत नजारा आपलोगों ने देखा या नहीं , यहां बोकारो में तो पश्चिमी क्षितिज पर बहुत ही सुंदर दृश्‍य दिखाई पड रहा था , बिल्‍कुल वैसा ही जैसा मैने अपने लेखमे बताया था। भारत मे सूर्यास्‍त के बाद जब यह दिखाई पडा तो चंद्र और शुक्र की दूरी 6 डिग्री थी , प्रति दो घंटे में यह दूरी कम होती गयी होगी , अन्‍य देशों में यह और ही खूबसूरत ढंग से दिखाई पडा और जब अमेरिका के आस पास सूर्यास्‍त हो रहा होगा , चंद्र शुक्र को पार करते हुए आगे बढ गया होगा। इस तरह आज जब शाम को ये आसमान में दिखाई पडेंगे , तो चंद्र शुक्र के उतना ही उपर होगा , जितना कल नीचे था ।


चंद्र शुक्र का इस मिलन का भारत पर अच्‍छा खासा प्रभाव देखा जा रहा है। यह एक ओर सरकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्‍ता जैसी खुशी लेकर आया है , वहीं दूसरी ओर झारखंड में एम सी सी का 48 घंटो का बंद चल रहा है। एक रेलवे स्‍टेशन को उडा दिए जाने से रेलवे अधिकारियों को सारे रेलयात्रियों को परेशानी को दूर कर पाने में खासी मशक्‍कत करनी पड रही है , वहीं इन दो दिनों में शादी विवाह या उसी तरह के अन्‍य कार्यक्रम भी बहुतायत में होते देखने को मिल रहे हैं।


पूरी दुनिया पर इसका जो भी प्रभाव पडा हो , चंद्र शुक्र का यह मिलन मेरे लिए बहुत ही अच्‍छा रहा। कल शाम इस खूबसूरत नजारे के दर्शन कर ही रही थी कि फोन की घंटी बजी। उठाने पर मालूम हुआ कि यह फोन जी , छत्‍तीसगढ 24 घंटे से किया जा रहा है। फोन पर मुझे कहा गया कि शुक्र-चंद्र के इस मिलन को देखते हुए वे अभी एक कार्यक्रम आरंभ करने जा रहे हैं , इसलिए थोडी देर में ही विभिन्‍न राशियों के उपर इसका प्रभाव जानने के लिए स्‍टूडियो से मुझे फोन किया जाएगा। ठीक 8 बजे कार्यक्रम आरंभ हुआ , फोन द्वारा मुझे स्‍टूडियो से लाइव ही जोडा गया। बीस मिनट के इस कार्यक्रम में मेरे अलावे एक अन्‍य ज्‍योतिषी भी थे। मैने इस खास युति के अधिक प्रभावशाली होने का कारण और विभिन्‍न राशियों पर पडनेवाले इसके प्रभाव के बारे में जानकारी दी। जी , छत्‍तीसगढ 24 घंटे ने मुझे अपने कार्यक्रम के लायक समझा , इसके लिए उसका तहेदिल से शुक्रिया।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

वास्तुशास्त्र का महत्व ( Astrology )

 (vidya sagar padhdhati, petarbar, bokaro)इन दिनों वास्तुशास्त्र की अनुगूंज हर जगह सुनाई पड़ रही है। बड़े लोग जब लम्बे काल के लिए अपने कार्यक्रमों में विफल होते चले जाते हैं, तब वे अपने कार्यक्रमों, सूझ-बूझ, संगति, समय या संसाधनों के समन्वयन पर दृष्टिपात न कर अपने आवास को, अपने पहनावे को, अपने हस्ताक्षर को दोषपूर्ण समझना शुरु कर देते हैं और उन्हें सुधारने में लग जाते हैं। एक ओर बुरे समय की मार, तो दूसरी ओर इस प्रकार के सुधार का कार्यक्रम — व्यक्ति को लाखों का मूल्य चुकाना पड़ता है। वास्तुशास्त्र के जानकार की शुल्क भी अभियंता की तरह ही होती है। जो व्यक्ति अपने आवास की तोड़-फोड़ में लाखो का नुकसान कर रहे होते हैं, वे भला वास्तुशास्त्रवेत्ता को हजारो क्यों नहीं दे सकते हैं ? इस मनोविज्ञान की जानकारी भी उन्हें खूब होती है और इसका फायदा उठाने से वे नहीं चूकते।


वास्‍तुशास्‍त्र के नियम हर प्रकार से अनुकूलित मकान का नक्‍शा अवश्‍य तैयार कर देते हैं , जहां दिशा के अनुसार हर प्रकार की व्‍यवस्‍था रहती है , ताकि आपको घर में धूप , हवा , पानी आवश्‍यकता के अनुरूप मिल पाए और इससे आपका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहे , आप अनाज का संचय अधिक दिनों तक कर सके , किसी प्रकार के दुश्‍मन से बचे रह सकें। पर उसका भाग्‍य से भी संबंध होता है , यह भ्रम न पालें।

समय जब अच्छा होता है, तो लक्ष्मी का आगमन होता है, यश की वृद्धि होती है, घर का निर्माण हो जाता है, नौकरी मिल जाती है, समाज में पद-प्रतिष्ठा मिलती है, रत्न-जटित मुकुट सिर पर चढ़ जाता है, पत्नी, बाल-बच्चे सब सुख देनेवाले होते हैं, आत्मविश्वास की बढ़ोत्तरी होती है, व्यक्तित्व आकर्षक हो जाता हैं किन्तु जब समय बुरा होता है, तो लक्ष्मी रुठ जाती है, उसका आगमन अवरुद्ध हो जाता है, यश में कमी हो जाती है, घर गिरने लगता है, उसमें तोड़-फोड़ होने लगता है, उसका रख-रक्षाव ठीक से नहीं हो पाता, समाज से तिरस्कृत होना पड़ता है, रत्न-जटित मुकुट सिर से उतर जाता है, जिन रत्नों को आप शुभ या प्रगतिसूचक मानते हैं, वे स्वत: गिर जातेहैं ,गुम हो जाते हैं, पत्नी, बाल-बच्चे या सभी नजदीकी कष्ट के कारण बन जाते हैं। उत्साह के साथ मकान का निर्माण हो रहा हो, तो समझ लीजिए आपका समय अच्छा है, परंतु किसी प्रकार की विवशता में पड़कर आप मकान के नक्शे को बदलने के लिए तोड़-फोड़ कर रहे हों, तो इस अनावश्यक कार्यवाही को ही आप किसी बुरे ग्रह की प्रेरणा समझें।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

हस्तरेखाओं से भविष्य का ज्ञान ( Astrology )

हस्‍तरेखा भविष्‍य कथन की एक बहुत ही प्राचीन और विश्‍वसनीय विधा मानी जाती है। चूंकि सभी लोगों के पास जन्‍म विवरण भी मौजूद नहीं होता है , इसलिए हर युग में हस्‍तरेखा की उपयोगिता बनी हुई है। हस्तरेखाओं से मनुष्य की चारित्रिक विशेषताओं और उसकी प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला जा सकता है। कुछ घटनाओं के संबंध में काफी हद तक सही भविष्यवाणी की जा सकती है, किन्तु हस्तरेखा के साथ सबसे बड़ी कमजोरी है, घटनाओं के साथ समय का उल्लेख न कर पाना। दरअसल ज्योतिषी समय विशेषज्ञ ही होते हैं। यदि घटनाओं के साथ घटित होनेवाले समय का उल्लेख नहीं कर सके, तो उस घटना को जानने का महत्व काफी कम हो जाता है। जीवनरेखा कटी हुई हो, दुर्घटना के संकेत मिल रहें हों, तो व्यक्ति किस उम्र में सावधानी बरते, कारण 10 सेमी की रेखा 100 वर्षों की कहानी कह रही है। विभिन्न रेखाएं कहॉ से शुरु हों और कहॉ पर खत्म हों, जिसके आधार पर समय का सही सही निर्धारण किया जा सके, इसका कोई निश्चित विश्वसनीय सूत्र नहीं निकल सका है। जीवन रेखा का प्रारंभ ऊपर से तथा भाग्य रेखा का प्रारंभ नीचे से ।


किसी भी रेखा को यदि कोई दूसरी रेखा काट रही हो, तो उसका अर्थ अच्छा नहीं है, इसकी भविष्यवाणी तो की जा सकती है, परंतु विश्वासपूर्वक घटना के काल का निर्धारण काफी कठिन काम होगा। हस्तरेखाओं में बड़ी रेखाओं से ज्यादा महत्व पैनी और सूक्ष्म रेखाओं का है, यहॉ तक कि कैपिलरीज का महत्व और अधिक है। पर्वत कितने ऊंचे हैं किधर झुकाव है, हथेली के विभिन्न भागों की ऊंचाई-निचाई को समझने के लिए कंटूरलाइन को समझना, हथेली की कठोरता और कोमलता को समझना, रेखाओं के रंग को समझना, इस तरह बहुत जटिलताएं हैं। इन जटिलताओं को सरल करने की दिशा में बहुत कम काम होने से जटिलताएं ज्यो की त्यों बनी हुई हैं। अत: विश्वासयुक्त तिथियुक्त भविष्यवाणियॉ कर पाना काफी कठिन काम है। आकाश की तरह ही ग्रहों से संबंधित फल-कथन कर पाने में फलित ज्योतिश की सीमाएं असीम है , जबकि हस्तरेखा से भविश्य-कथन बंद मुट्ठी की तरह ही सीमित हो जाती है। किसी प्रकार की सिद्धी प्राप्त करने के बाद हथेली देखकर जन्मकुंडली का निर्माण कर भले ही दूसरे को चमत्कृत किया जा सके, पर वैज्ञानिक विधि से हस्तरेखाओं का रुपांतरण कुंडली के रुप में बिल्कुल असंभव है।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

27 और 28 फरवरी को आसमान में एक अनोखे दृश्‍य का नजारा लें ( Astrology )

गणित ज्‍योतिष के प्राचीन महत्‍वपूर्ण सूत्रों से यह तो निश्चित तौर पर कहा ही जा सकता है कि हमारे ऋषि मुनियों के लिए पूरा ब्रह्मांड ही शोध का विषय रहा है । आसमान के तारों और ग्रहों का एकाग्रता से अवलोकन किए बिना इन महत्‍वपूर्ण सूत्रों को जन्‍म दिया ही नहीं जा सकता था। आसमान में स्थित पिंडों की खास स्थिति का दर्शन कर पाने में आम लोगों की भी अत्‍यधिक दिलचस्‍पी होती है । अभी दो दिन पूर्व ही लुलिन नामक कोमेट के दिखाई पडने की सूचना मिलने के बाद इसे देखने के लिए न जाने कितने लोगों ने रतजग्‍गा किया।

वैसे तो पूरे ब्रह्मांड में अक्‍सर ही कई प्रकार की दृश्‍यावलि बनती है , पर हम उन्‍हे अपनी आंखो से नहीं देख पाते हैं। प्रतिदिन दूरदर्शी यंत्र की सहायता से नासा द्वारा खींची गयी आसमान की वैसी कोई न कोई तस्‍वीर हम अपने कम्‍प्‍यूटर में देख सकते हैं। पर जब हमारे सौरमंडल के अंदर ग्रहों और उपग्रहों के आपसी मेल से किसी प्रकार की खास दृश्‍यावलि बनती है , तो हमें उसको देखना अच्‍छा लगता है , कभी किसी त्‍यौहार के बहाने या कभी अन्‍य बहानों से हम सूर्यग्रहण , चंद्रग्रहण या सुंदर चांद को अकेले भी देखना पसंद करते हैं।


सौरमंडल का एक ग्रह शुक्र पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य होने से अक्‍सर सूर्य के साथ ही उदय और अस्‍त हो जाता है। पर इस दिसम्‍बर से ही सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के बढने से सूर्यास्‍त के बाद , जब तारे भी आसमान में नहीं होते , थोडी देर आसमान में सफेद चमक बिखेरते हुए चमकता दिखाई देता आ रहा है। उसे आप दस-पंद्रह दिनों के अंदर किसी भी दिन देख सकते हैं। पर 27 और 28 दिसम्‍बर को इस चमक बिखेरते शुक्र के साथ चंद्रमा की स्थिति आसमान में अनोखी दृश्‍यावलि उपस्थित करेगी। और यह सब देखने के लिए आपको रतजग्‍गे की भी जरूरत नहीं है। 27 फरवरी को सूर्यास्‍त के एक घंटे बाद से दो घंटे बाद तक आसमान के पश्चिमी क्षितिज पर नीचे दिए गए चित्र के सा दृश्‍य बनेगा.......



वैसे इस दिन चांद दूज का होगा , दूज का चांद कभी कभी ही हमें दिखाई देता है , इसलिए 27 फरवरी की यह दृश्‍यावलि हमें दिखाई देगी या नहीं , इसमें शक की कुछ संभावना बनीं रह जाती है , पर 28 फरवरी को तृतीया का चांद कुछ उपर आ जाएगा और इस कारण इसे आराम से देखा जा सकता है। सूर्यास्‍त के एक घंटे बाद से दो घंटे बाद तक आसमान के पश्चिमी क्षितिज पर पहले दिन की अपेक्षा कुछ बदला हुआ यानि इस प्रकार का दृश्‍य बनेगा...





अब एक फलित ज्‍योतिषी भी होने के नाते शुक्र और चंद्र के इस विशेष मिलन के पृथ्‍वी पर पडने वाले प्रभाव की चर्चा करनी भी आवश्‍यक है। वैसे तो पृथ्‍वी पर इसके अच्‍छे खासे प्रभाव से 27 और 28 फरवरी को जनसामान्‍य तन मन या धन से किसी न किसी प्रकार के खास सुखदायक या दुखदायक कार्यों में उलझे रहेंगे , पर सबसे अधिक प्रभाव सरकारी कर्मचारियों पर पड सकता है यानि उनके लिए खुशी की कोई खबर आ सकती है। दूसरा अंतरिक्ष से संबंधित कोई विशेष कार्यक्रम की संभावना बनती दिखाई दे सकती है। सफेद वस्‍तुओं पर इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकता है। पर इन दोनो दिनों में जो भी काम शुरू किया जाएगा , सबमें 5 मार्च के बाद किसी न किसी प्रकार की बाधा उपस्थित हो जाएगी , जिसके कारण काम कुछ रूका हुआ सा महसूस होगा। उस काम में पुन: 20 अप्रैल के बाद ही तेजी आ सकेगी या सुधार हो पाएगा। यह योग तुला राशि वालों के लिए काफी अच्‍छा और सिंह राशिवालों के लिए कुछ बुरा रह सकता है।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

जन्मकुंडली बनाम् कर्मकुंडली ( Astrology )

लोगों के मन में ज्‍योतिष के प्रति गलत धारणाएं होती हैं। अक्‍सर लोग एक प्रश्‍न किया करते हैं कि आखिर जब ग्रह ही सब कुछ निर्धारित करते हैं , तो फिर कर्म का क्‍या महत्‍व है ? उन्‍हें मैं समझाना चाहूंगी कि मानव जीवन में ग्रहों का प्रभाव तो है , क्‍योंकि आपके सामने जो भी परिस्थितियां उत्‍पन्‍न होती हैं , वह इन्‍हीं ग्रहों के परिणामस्‍वरूप ,इसलिए उसे आपकी जन्‍मकुंडली के अनुसार प्राप्‍त फल कह सकते हें , पर इनसे लडकर खुद की या समाज के अन्‍य लोगों के मेहनत से जो उपलब्धियां आप हासिल करते हैं , वह आपकी कर्मकुंडली के अनुसार होता है। जन्‍मकुंडली और कर्मकुंडली के मुख्‍य अंतर को आपके समक्ष इस प्रकार रखा जा सकता है।

जहां जन्मकुंडली को निश्चित करने में जातक के जन्म के समय भचक्र के विभिन्न कोणों पर स्थित ग्रहों की भूमिका होती है , वहीं कर्मकुंडली को निश्चित करने में जातक के भौगोलिक परिवेश के साथ.साथ युग के परिवर्तन का भी प्रभाव होता है। जन्मकुंडली सांकेतिक तौर पर ही सही , पूरे जीवन की परिस्थितियों का विश्लेषण करती है , जबकि कर्मकुंडली वास्तविक तौर पर , लेकिन सिर्फ भूत और वर्तमान तक का। जातक के लिए जन्मकुंडली निश्चित् होती है , जबकि कर्मकुंडली अनिश्चित। जहां जन्मकुंडली को निश्चित करने में जातक की परिस्थितियां जिम्मेदार होता है , वहीं कर्मकुंडली को निश्चित करने में सामाजिक ,पारिवारिक , राजनीतिक , धार्मिक और आर्थिक वातावरण के साथ.साथ व्यक्ति खुद भी जिम्मेदार होता है। जन्मकुंडली के अनुसार जातक की रूचि होती है , जबकि कर्मकुंडली के अनुसार जातक का खान.पान और रहन.सहन। जन्मकुंडली से व्यक्ति के स्वभाव का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से व्यवहार का।


जन्मकुंडली से स्वास्थ्य का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से शरीर के वजन का। जन्मकुंडली से धन के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से धन की मात्रा का। जन्मकुंडली से भाई.बहन ,बंधु.बांधव से संबंध का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से भाई.बहन ,बंधु.बांधव की संख्या का। जन्मकुंडली से माता के सुख और उनसे मिलनेवाले सहयोग का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से माता के पद और उनकी स्थिति का। जन्मकुंडली से हर प्रकार की संपत्ति से मिलनेवाले सुख या दुख का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से हर प्रकार की संपत्ति के स्तर का। जन्मकुंडली से दिमाग की क्रियाशीलता और एकाग्रता का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से दिमाग की मजबूती और विविध प्रकार की डिग्रियों का। जन्मकुंडली से विविध प्रकार के रोगों से लड़ने की शक्ति या रोगग्रस्तता का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से बीमारियों के नाम का। जन्मकुंडली से ऋणग्रस्तता के होने या न होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से ऋण की मात्रा का।

जन्मकुंडली से दाम्पत्य जीवन के सुखमय या दुखमय होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से विवाह की उम्र या पार्टनर के कद.काठी और पद का। जन्मकुंडली से जीवनशैली के सुखमय या दुखमय होने या जीवनी शक्ति का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से जीवन जीने के स्तर या जातक की उम्र का। जन्मकुंडली से भाग्य या धर्म के प्रति सोंच या नजरिए का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से किसी धर्म को अपनाने का । जन्मकुंडली से रूचि और स्तर के अनुरूप कैरियर के होने या न होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से कैरियर की शाखा या पद का । जन्मकुंडली से अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहने या न रहने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से लक्ष्य के स्तर का। जन्मकुंडली से अपने खर्च के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से खर्च कर पाने की मात्रा का। जन्मकुंडली से बाहरी स्थान में सफलता मिलने या न मिलने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से बाहरी स्थान में जा पाने या न जा पाने का।

जन्मकुंडली से भविष्य के छोटे से छोटे समयांतराल के बारे में सांकेतिक ही सही ,जानकारी प्राप्त की जा सकती है , किन्तु कर्मकुंडली में भविष्य बिल्कुल अनिश्चित होता है , कहा जाए कि सामने अंधेरा सा छाया होता है , तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जन्मकुंडली देखकर हम ज्योतिषी जन्मकुंडली पर आधारित प्रश्नों के सांकेतिक ही सही , पर भूत , वर्तमान और भविष्य के हर प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं , कर्मकुंडली पर आधारित प्रश्न पूछकर एक ज्योतिषी की योग्यता या ज्योतिष-शास्त्र पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित नहीं है।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

मेरी नजर में पूर्वी भारत का ब्‍लागर मीट कार्यक्रम

फरवरी का मध्‍य मेरे लिए काफी व्‍यस्‍तता भरा रहा। 12 को एक विवाह , 15 को एक रिशेप्‍सन , 17 को फिर से एक विवाह और 20 को एक पारिवारिक कार्यक्रम और इनमें से कोई भी बोकारो के अंदर नहीं। सभी कार्यक्रमों के लिए आते जाते कम से कम 100 किमी से लेकर 300 किमी तक की दूरी तय करना आवश्‍यक , जाहिर है कोई और मौका होता , तो मैं 20 फरवरी तक थककर चूर हो गई होती। पर 22 फरवरी को पूर्वी भारत के ब्‍लागर मीट के कार्यक्रम में जाने के उत्‍साह के कारण मैं बिल्‍कुल तरोताजा महसूस कर रही थी। बाकी सारे कार्यक्रमों के बारे में तो सब कुछ निश्चित सा था , किसमें कौन कौन से लोग मिलेंगे , क्‍या क्‍या होगा , पर इस कार्यक्रम के बारे में सिर्फ और सिर्फ उत्‍सुकता ही थी। चूकि मैं , पारूल जी और मीत जी एक साथ ही रांची जा रहे थे , इसलिए माना जाए कि रांची जाने के हमारे सफर में ही ब्‍लागर मीट आरंभ हो चुका था । एक ही शहर में होने के बावजूद मै पारूल जी से पहली बार मिल रही थी तो फिर मीत जी से पहले न मिल पाने का क्‍या मलाल होता ? वैसे मैं उनलोगों के लिए अधिक अपरिचित थी , क्‍योकि उन्‍होने सिर्फ मेरा लेखन पढा था , जबकि मै तो उनके लेखन के साथ ही साथ आवाज से भी परिचित थी। रास्‍ते के तीन घंटों में ही हमलोग एक दूसरे से काफी परिचित हो चुके थे। वैसे मीत जी की तबियत कुछ खराब थी , इसके बावजूद रांची ब्‍लागर मीट में उनका उपस्थित होना ब्‍लाग जगत के प्रति उनकी निष्‍ठा को दर्शाता है।


रांची के कश्‍यप मेमोरियल हास्पिटल के उस हाल में शायद बाहरी लोगों में सबसे पहले मैं ही पहुंची। झारखंड के अतिरिक्‍त बनारस से अभिषेक मिश्रा और दिल्‍ली से शैलेश जी भी पहुंचे। शैलेश जी के प्रस्‍ताव , घन्‍नू झारखंडी जी की मेहनत और कश्‍यप मेमोरियल हास्पिटल की डाक्‍टर भारती कश्‍यप जी के द्वारा वहां हमारे लिए जरूरी हर प्रकार की व्‍यवस्‍था की गयी थी। वहां घन्‍नू झारखंडी हमलोगों का इंतजार ही कर रहे थे। रांची हल्‍ला के सारे सदस्‍य , मनीष जी और प्रभात गोपाल जी को भी स्‍थानीय होने के नाते वहां मौजूद होना ही था। धीरे धीरे अन्‍य ब्‍लागर्स भी पहुंचते गए । इस कार्यक्रम को बहुत ही सफल माना जा सकता है , सब एक दूसरे से मिले , सबने अपने अपने अनुभव बांटे , पूरे कार्यक्रम का विवरण देनेवाली राजीव जी कीरपटके साथ ही साथ प्रभात रंजन जी कीरपटतो आपलोगों को मिल ही चुकी है। धन्‍नू झारखंडी ने कार्यक्रम का संचालन किया । हम ब्‍लागरों के साथ ही साथ पत्रकार जगत के लोगों ने भी ब्‍लागिंग के बारे में वक्‍तब्‍य दिया। साथ ही पारूल जी , श्‍यामल सुमन जी और मीत जी के द्वारा गाने और गजल का भी दौर चला। चित्रों के लिए आप यहांजाएं। खाने के वक्‍त हमलोगों को एक दूसरे से बातचीत करने का मौका मिला। सभी ब्‍लागरों के आलेखों को पढकर और उनके पिक्‍चर को देखकर मैने उनके बारे में जितनी कल्‍पना कर रखी थी , उससे कहीं बढकर सामनेवालों को पाया। धनबाद से आयी लवली जी तो कार्यक्रम समाप्‍त होने के तुरंत बाद ही निकल चुकी थी। खाने के बाद भी कार्यक्रम एक घंटे चला।


कार्यक्रम के बाद रांची के सारे ब्‍लागर भाइयों से विदाई लेकर ( रांची के मनीष जी हमारे साथ रहे) बोकारो से आयी मैं और पारूलजी , कलकत्‍ता से आए मीत जी और मिश्राजी , जमशेदपुर से आयी रंजना जी , श्‍यामल सुमन जी और दिल्‍ली से आए शैलेश जी ......इतने लोगों ने बचे दो घंटे साथ व्‍यतीत करने का निर्णय लिया । इसके लिए हमलोग कावेरी रेस्‍टोरेंट में चाय पीने चले गए ,इस मध्‍य हमारी सारी बातें ब्‍लागिंग से ही जुडी रहीं। देखते ही देखते दो घंटे व्‍यतीत हुए और फिर भारी मन से विदा लेकर अपने अपने रास्‍ते चल पडने का वक्‍त आ ही गया। आते वक्‍त पारूल जी की रिकार्ड की गयी मीठी आवाज को सुनते हुए हमलोग बोकारो पहुंचे। यह दिन शायद हम सबों के लिए यादगार रहेगा।


किन्‍तु सिर्फ हमारी कोशिश से हिन्‍दी ब्‍लागिंग का कितना भला हो पाएगा , यह सोंचनेवाली बात हो जाती है , जबतक सामान्‍य जनता , सरकार , मीडिया और अन्‍य लोग इसे गंभीरतापूर्वक न लें। इतनी अच्‍छी व्‍यवस्‍था और हमारे द्वारा इस कार्यक्रम का इतना प्रचार प्रसार किए जाने के बाद भी कुछ नियमित ब्‍लागर ही वहां तक पहुंचे थे , जबकि शुरूआती दौर के और अनियमित बहुत सारे हिन्‍दी ब्‍लागर इस क्षेत्र में रहते हैं। कार्यक्रम के तुरंत बाद रास्‍ते में ही मुझे एक फोन मिला कि हिन्‍दी के साइट खोलने पर उनके कम्‍प्‍यूटर में हिन्‍दी नहीं दिखाई पड रही है , आखिर हिन्‍दुस्‍तान में बेचे जानेवाले सभी कम्‍प्‍यूटरों में डिफाल्‍ट में ही हिन्‍दी की सेटिंग क्‍यो नहीं बनी होती ? जब वे हिन्‍दी में पढ नहीं पा रहे तो हिन्‍दी में लिख किस तरह पाएंगे , यह सोंचनेवाली बात है। अभी तो शायद ‘ब्‍लागर’शब्‍द को जानने में ही अभी भारतवर्ष के लोगों को काफी समय लग जाएगा , जैसा कि कावेरी रेस्‍टोरेंट में ब्‍लागिंग से जुडी बातें करते वक्‍त किसी ने परिहास किया कि बगल के टेबल पर बैठे लोग हमें इस दुनिया की अलग प्रजाति समझ रहे हैं या फिर बार बार सबबके मुंह से उडनतश्‍तरी सुनकर दूसरे ग्रह से आई प्रजाति ?