शनिवार, 18 अप्रैल 2009

आसमान में बृहस्‍पति और चंद्र के संयोग से एक अनोखा दृश्‍य बनेगा

अभी अभी अपना ईमेल खोलने पर आशीष महर्षि जी का एक मेल मिला, कि उनके द्वारा दैनिक भास्‍कर के ब्‍लागर्स पार्क में इस बार 'ब्‍लाग की तीन देवियां' नाम से चर्चा की गयी है , सौभाग्‍य मेरा कि उसमें  जी और मीनाक्षी जी के साथ मेरा नाम भी शामिल है। इसमें मेरे चिट्ठे की वैज्ञानिकता की भी चर्चा है। आप भी नजर डाले , ये रहा लिंक। अनिता कुमार जी और मीनाक्षी जी को बधाई तथा आशीष महर्षि जी को धन्‍यवाद। अब बढते हैं ज्‍योतिषीय चर्चा की ओर।

20 अप्रैल 2009 को सूर्योदय के लगभग चार घंटे पहले चंद्रोदय होगा और उसी के साथ होगा हमारे सौरमंडल के विशालकाय ग्रह बृहस्‍पति का भी उदय। इस खास दृश्‍य का आनंद आप 4-5 बजे रात्रि में ले सकते हैं। उस दिन सुबह सुबह पूर्वी दिशा में पूर्वी क्षितिज पर 30 डिग्री उपर आधे से कुछ छोटा चांद और उसके साथ पीली आभा बिखेरते बृहस्‍पति को देखा जा सकता है। बृहस्‍पति अभी पृथ्‍वी से नजदीक आने की दिशा में प्रवृत्‍त है , इस कारण इसका प्रभाव आनेवाले दिनों में पृथ्‍वी के जड चेतन पर अधिक पडनेवाला है।


’गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार पृथ्‍वी से निकटतर होती बृहस्‍पति की इस स्थिति में प्रतिदिन उसकी गत्‍यात्‍मक शक्ति की कमी और स्‍थैतिक शक्ति की बढोत्‍तरी होती जा रही है। इस कारण अच्‍छे या बुरे किसी भी रूप में पृथ्‍वी के जड चेतनों पर इसका प्रभाव बढता चला जाता है और इसकी शुरूआत आज से ही होनी चाहिए। वैसी समस्‍याएं या कार्यक्रम, जो कुछ दिनों हल्‍के फुल्‍के नजर आ रहे थे, वे आज ही गंभीर हो जाएंगे।


वैसे तो दुनिया भर के 20 प्रतिशत से अधिक लोग बृहस्‍पति के कारण 18 और 19 अप्रैल को विशेष प्रकार के कार्यक्रम से अपने को संयुक्‍त पाएंगे , भले ही किसी के लिए यह अच्‍छी हो और किसी के लिए बुरी। यह कार्यक्रम दिन ब दिन गंभीर होता हुआ कुछ लोगों को खुशी और कुछ को कष्‍ट देता हुआ 16 मई के आसपास अपने निर्णायक मोड पर पहुंच जाएगा। वैसे इन संदर्भों की उलझन और इसमें शारीरिक , आर्थिक या मानसिक तौर पर व्‍यस्‍तता किसी न किसी प्रकार 16 जून तक बनीं रहेगी।


बृहस्‍पति की इस खास स्थिति से जो लोग अच्‍छे रूप में प्रभावित होंगे , वे निम्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवाले लोग होंगे .... सितम्‍बर 1945 से फरवरी 1946, जुलाई 1946 से सितम्‍बर 1946, सितम्‍बर 1957 से फरवरी 1958, जुलाई 1958 , अगस्‍त 1958, अगस्‍त 1969 से फरवरी 1970 , जुलाई 1970 , अगस्‍त 1970, नवम्‍बर 1980 से जनवरी 1981, जुलाई 1981 से नवम्‍बर 1981, नवम्‍बर 1992 से जनवरी 1993, जून 1993 से नवम्‍बर 1993 ,
उपरोक्‍त समयांतराल में जन्‍म लेनेवाले लोगों के अलावा कन्‍या राशिवालों पर भी इसका प्रभाव अच्‍छा देखा जा सकता है।


बृहस्‍पति की इस खास स्थिति से जो लोग बुरे रूप में प्रभावित होंगे , वे निम्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवाले लोग होंगे .... नवम्‍बर 1931 से मई 1932, दिसम्‍बर 1943 से मई 1944, दिसम्‍बर 1955 से मई 1956, अक्‍तूबर 1966 से दिसम्‍बर 1966, नवम्‍बर 1978 से जनवरी 1979,नवम्‍बर 1990 से अप्रैल 1991,नवम्‍बर 2002 से अप्रैल 2003,
उपरोक्‍त समयांतराल में जन्‍म लेनेवाले लोगों के अलावा कर्क राशिवालों पर भी इसका प्रभाव बुरा देखा जा सकता है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

जड चेतन को प्रभावित करने की मुख्‍य वजह ग्रह की गति ही है

कल के आलेखमें यह स्‍पष्‍ट किया गया था कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी करने के लिए ग्रहों की गति पर ही आधारित है। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है। पृथ्‍वी के जड चेतन या अन्‍य प्रकार की घटनाओं के खास व्‍यवहार का कारण ग्रहगति की ये विभिन्‍नता ही है। 40 वर्षों तक विभिन्‍न ग्रहों की विभिन्‍न गतियों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ निम्‍न निष्‍कर्ष पर पहुंचा है ....


1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह जब अतिशीघ्री होते हैं तो उन्‍हें अत्‍यधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये अनायास सुख और सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग निश्चिंत या लापरवाह स्‍वभाव के हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह अतिशीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल निश्चिंति भरा होता है।


2. शीघ्री गति ... ग्रह जब शीघ्री होते हैं तो उन्‍हें भी गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये थोडी मेहनत से अधिक सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग कम मेहनत हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह शीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल भी अच्‍छा ही होता है।


3. सामान्‍य गति ... ग्रह जब सामान्‍य होते हैं तो उन्‍हें सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये महत्‍वपूर्ण ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग समन्‍वयवादी दृष्टिकोण के हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह सामान्‍य हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल महत्‍वपूर्ण होता है।


4. मंद गति ... ग्रह जब मंदगति के होते हैं तो उन्‍हें कुछ कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये बहुत मेहनती ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोगों का किसी भी क्षेत्र में बहुत अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण होता है। लोगों के जो ग्रह मंद गतिशील हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल बहुत ही दवाबपूर्ण होता है।


5. वक्री गति .... ग्रह जब वक्री गति में होते हैं तो उन्‍हें कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये कुछ कठिनाई और असफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग थोडे चिडचिडे और निराश हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह वक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल कठिनाई भरा होता है।


6. अतिवक्री गति ... ग्रह जब अतिवक्री होते हैं तो उन्‍हें बहुत कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये बहुत अधिक कठिनाई और तनाव देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग किंकर्तब्‍यविमूढ और अवसाद ग्रस्‍त हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह अतिवक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल पराधीन और लाचार होता है।


यदि गत्‍यात्‍मक शक्ति की दृष्टि से यानि सुख के नजर से देखा जाए तो अतिशीघ्री ग्रह को सर्वाधिक मजबूत और अतिवक्री ग्रह को सर्वाधिक कमजोर माना जा सकता है , पर स्‍थैतिक शक्ति की दृष्टि से यानि कार्यक्षमता और महत्‍व की नजर से देखा जाए तो सामान्‍य और मंद ग्रह को सर्वाधिक मजबूत माना जा सकता है , क्‍योकि अधिकांश ग्रहों के शीघ्री या अतिशीघ्री होने के समय का माहौल खुशनुमा होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर खुशनुमा माहौल प्राप्‍त करते हैं। इसी तरह अधिकांश ग्रहों के वक्री या अतिवक्री होने के समय का माहौल कष्‍टदायक होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर कष्‍टप्रद माहौल प्राप्‍त करते हैं। इन दोनो के ही विपरीत , अधिकांश ग्रहों के सामान्‍य या मंद होने के समय का माहौल महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण माहौल प्राप्‍त करते हैं।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

सिर्फ नाम से ही गत्‍यात्‍मक नहीं है ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ सिर्फ नाम से ही गत्‍यात्‍मक नहीं है , इसका नामकरण ऐसा किया गया है क्‍योंकि इसके द्वारा भविष्‍यवाणी करने का मुख्‍य आधार ग्रहों की गति ही है। सौरमंडल में भले ही सूर्य स्थिर हो और पृथ्‍वी उसकी परिक्रमा करती हो , पर फलित ज्‍योतिष पृथ्‍वी को स्थिर मानकर उसके सापेक्ष ग्रहों की स्थिति का अध्‍ययन करता है। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है। यूं तो गणित ज्‍योतिष के सूर्य सिद्धांत में ग्रहों की इन गतियों की विभिन्‍नता की चर्चा हुई है , पर इसके अनुसार फलित पर प्रभाव पडने की चर्चा कहीं नहीं हुई। फलित पर ग्रहों की विभिन्‍न ग्रहों की गतियों का भिन्‍न भिन्‍न तरह के प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष द्वारा’ ग्रह गति का निम्‍न प्रकार से वर्गीकरण किया गया है ....

1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह वास्‍तविक तौर पर पृथ्‍वी से अधिक दूरी पर तथा सूर्य से कम की कोणात्‍मक दूरी पर हो तो ग्रह अतिशीघ्री स्थिति में होते हैं। बुध सूर्य से 0 डिग्री से 9 डिग्री की कोणिक दूरी पर तथा 2 डिग्री प्रतिदिन की गति में हो , शुक्र सूर्य से 0 डिग्री से 15 डिग्री की कोणिक दूरी पर तथा प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो तो अतिशीघ्री अवस्‍था में होते हें। मंगल , बृहस्‍पति और शनि की कोणात्‍मक दूरी सूर्य से 0 डिग्री से 30 डिग्री के मध्‍य हो तो अतिशीघ्री होते हैं।

2. शीघ्री गति ... अतिशीघ्री की तुलना में जब ग्रहों की कोणात्‍मक दूरी सूर्य से और इनकी गति सामान्‍य से कुछ अधिक हो , तो ग्रह शीघ्री कहे जाते हैं। बुध सूर्य से 9 डिग्री से 24 डिग्री की दूरी पर तथा 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो , शुक्र 15 डिग्री से 40 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर और 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो तो शीघ्री अवस्‍था का होता है। मंगल , बृहस्‍पति और शनि की दूरी सूर्य से 30 डिग्री से 75 डिग्री के मध्‍य हो तो ये शीघ्री अवस्‍था के होते हें।

3. सामान्‍य गति ... इस समय ग्रह पृथ्‍वी से औसत दूरी पर होते हैं । सूर्य से बुध की कोणात्‍मक दूरी लगभग 27 डिग्री और शुक्र की सूर्य से कोणात्‍मक दूरी 45 डिग्री होती है , जबकि मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 90 डिग्री की दूरी पर सामान्‍य गति में होते हैं।


4. मंदगति ... विभिन्‍न ग्रह वक्री होने के पूर्व और मार्गी होने से पश्‍चात् इस दशा से गुजरते हैं। बुध 10.12 दिन पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने से 10;12 दिन पश्‍चात तक मंद गति में होता है। शुक्र वक्री होने से डेढ महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से डेढ महाने बाद तक मंद गति में होता है। बृहस्‍पति वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है। मंगल वक्री होने से दो महीने पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से दो महीने बाद तक मंद गति में होता है। शनि वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है।


5. वक्री गति .... पृथ्‍वी से सापेक्षिक गति कम होने से ग्रह वक्री गति में देखे जाते हैं। इस समय पृथ्‍वी से ग्रहों की वास्‍तविक दूरी बहुत कम होने लगती है। बुध सूर्य से 18 कोणात्‍मक डिग्री की दूरी पर और शुक्र सूर्य से लगभग 30 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर स्थित हो तो वे वक्री होते हें। मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 120 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर वक्री स्थिति में आते हैं।

6. अतिवक्री गति ... इस समय ग्रहों की वास्‍तविक दूरी पृथ्‍वी से निकटतम होती है। वक्री स्थिति में सूर्य से 0 से 9 डिग्री के मध्‍य बुध और वक्री स्थिति में सूर्य से 0 डिग्री से 15 डिग्री के मध्‍य शुक्र हो तो ऐसी स्थिति बनती है। मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 150 डिग्री से 180 डिग्री की दूरी पर अतिवक्री अवस्‍था में होते हैं।

ग्रहों की इन भिन्‍न भिन्‍न गति के कारण उनकी गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का आकलन और उसके जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव की चर्चा अगले पोस्‍ट में की जाएगी।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

राहू और केतु का पृथ्‍वी के जड चेतन पर कोई प्रभाव नहीं पडता

शीर्षक देखकर आप सब तो चौंक ही गए होंगे , क्‍योंकि जब भी किसी की कुंडली में बुरे ग्रहों के प्रभाव की चर्चा होती है तो मंगल और शनि के साथ ही साथ राहू और केतु का नाम भी आना स्‍वाभाविक होता है। यह अचरज की ही बात है कि मंगल और शनि जैसे भीमकाय ग्रहों और राहू केतु जैसे अस्त्तिवहीन ग्रहों के प्रभाव को परंपरागत ज्‍योतिष एक ही रूप में कैसे देखता आया है ? इस विराट ब्रह्मांड में पृथ्‍वी को स्थिर रखने पर सूर्य का बन रहा काल्‍पनिक पथ और सूर्य की परिक्रमा करता चंद्रमा का पथ दोनो ही राहू और केतु नाम के इन दो संपात विंदूओं पर एक दूसरे को काटते हैं । गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की माने तो सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के दिन सूर्य , पृथ्‍वी और चंद्रमा के साथ ही साथ ये दोनो विंदू भी एक ही सीध में आ जाते हैं। हो सकता है , जब यह खोज नहीं हुई हो कि एक पिंड की छाया दूसरे पर पडने से सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण होता है , तब सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण में इन दोनो संपात विंदुओं की ही भूमिका को मान लिया गया हो और इन्‍हें इतना महत्‍वपूर्ण दर्जा दे दिया गया हो।

पर भौतिक विज्ञान में विद्युत चुंबकीय या गुरूत्‍वाकर्षण या फिर कोई और शक्ति क्‍यों न हो , किसी की भी उत्‍पत्ति पदार्थ के बिना संभव नहीं है और हमलोग ग्रह की जिस भी उर्जा से प्रभावित हों , राहू और केतु उनमें से किसी का भी उत्‍सर्जन नहीं कर पाते , इसलिए राहू और केतु से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। अपने 40 वर्षीय अध्‍ययन मनन में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने सूर्य , चंद्रमा और अन्‍य ग्रहों की भिन्‍न भिन्‍न स्थिति के अनुसार उनकी शक्ति को पृथ्‍वी के जड चेतन पर महसूस किया है , पर राहू और केतु की विभिन्‍न स्थिति से जातक पर कोई प्रभाव नहीं देखा , इसलिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में इसकी चर्चा नहीं की गयी है। राहू और केतु को छोडकर इनकी जगह यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो के आंशिक प्रभाव को देखते हुए इसे अवश्‍य शामिल किया गया है। इस प्रकार गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के अनुसार हमें प्रभावित करनेवाले ग्रहों की कुल संख्‍या नौ की जगह दस हो गयी है , जो इस प्रकार हैं ...... चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून एवं प्‍लूटो।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जानकार को ‘समय विशेषज्ञ’ कहा जा सकता है

कल के पोस्‍ट पर टिप्‍पणियों के रूप में आप सभी पाठकों का साथ और आपके बहुमूल्‍य विचार मिले , उसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया । एक व्‍यर्थ के बाद विवाद में मेरा और आप सबों का बहुमूल्‍य समय नष्‍ट हुआ , पर एक बात साफ होकर अवश्‍य आई कि मैं सबों के पोस्‍ट पर अपनी टिप्‍पणियां देना जारी रखूं , चाहे वो छोटी हो या बडी , क्‍योंकि टिप्‍पणियां लेखकों को प्रोत्‍साहित करती हैं। अब बढते हैं , ज्‍योतिषीय मामलों की चर्चा लेकर।

यदि संभावनावाद की मानें , तो किसी भी आधार पर किए गए किसी भी भविष्‍यवाणी के सही या गलत होने की संभावना 50-50 प्रतिशत हो सकती है। इस कारण किसी भी विधा को लेकर की गयी भविष्‍यवाणियां कम से कम आधे मामलों में तो सही हो ही जाया करती हैं। इसलिए गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ऐसी भविष्‍यवाणियों को अधिक महत्‍व नहीं देता। किसी व्‍यक्ति की कुंडली , हथेली या मस्‍तक की रेखा या अंगूठे के अनुसार किसी के लिए बहुत धनवान होने की भविष्‍यवाणी करना उतना महत्‍वपूर्ण नहीं , जितना महत्‍वपूर्ण इस बात को बताना कि वह अपनी उम्र के किस पडाव पर धनवान बनेगा। यदि भविष्‍यवाणी की कोई विधा समययुक्‍त भविष्‍यवाणी का दावा करे , तो हमें उस विधा को विज्ञान मानना ही पडेगा।


गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की लोकप्रियता का सबसे बडा कारण इसकी भविष्‍यवाणियों का समययुक्‍त होना है। ज्‍योतिष की इस नई शाखा ने ‘परंपरागत ज्‍योतिष’ की व्‍यर्थ की लंबी चौडी गणनाओं में अपना समय जाया न करते हुए भविष्‍यवाणियों के लिए ‘गोचर’ को अपना आधार बनाया है। किसी खास समय में आसमान में स्थित ग्रहों की वास्‍तविक स्थिति को ही ज्‍योतिष में ‘गोचर’ कहा जाता है। यदि संदर्भों को छोड दिया जाए , तो सिर्फ किसी व्‍यक्ति के जन्‍म तिथि के ग्रहों को देखकर उसके जीवन के अच्‍छे और बुरे समय की जानकारी वर्षों में , महीनों में और तिथियों तक में दी जा सकती है। इसके लिए 40 वर्षों तक आसमान में ग्रहों की खास खास स्थिति को प्रत्‍यक्ष तौर पर जातको के सापेक्ष देखा जाता रहा है । गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के आधार पर जो भविष्‍यवाणियां की जाती हों , वो भले ही सांकेतिक हों , पर उसमें समय का उल्‍लेख निश्चित तौर पर होता है। इस कारण गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष को जाननेवालों को ‘समय विशेषज्ञ’ कहा जा सकता है। पर ‘अच्‍छा’ या ‘बुरा’ किस संदर्भ में होगा , इसे जानने के लिए हमें जन्‍मसमय की आवश्‍यकता पडती है , ताकि जन्‍मकुंडली बनाकर ग्रहों के जातक पर पडनेवाले प्रभाव को और स्‍पष्‍ट किया जा सके।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

एक सीमा होती है भई ... आखिर कितना बर्दाश्‍त करूं ????????

कल मुझे फिर से एक ई-पत्र मिला -----------

‘’ संगीता जी,
मैं हूं कपिलदेव। साहित्य में थोड़ी रूचि है। कुछ लिखता भी रहता हं। सिर्फ ब्लाग पर नहीं। पत्र-पत्रिकाओं में भी। किताब भी प्रकाशित है। आप ने ब्लाग पर मेरी प्रोफाइल देखी ही होगी। ब्लाग मेरा असली माध्यम नहीं। मनोरंजन का एक पड़ाव है। लिखे पर प्रतिक्रिया कौन नहीं चाहेगा। मगर प्रतिक्रिया वही, जिसे पढ़ कर लगे कि किसी सहृदय-सचेत और साहित्य-विवेक सम्पन्न पाठक ने टप्पणी की है। टिप्पणी-लेखक ने जो कहा है वह हमारे काम का हो सकता है। विचारणीय। मेरे लिखे पर आप की यह दूसरी प्रतिक्रिया है। पहले जैसी ही-‘‘वाह! बहुत अच्छा !!’’वाले अंदाज में! क्या मतलब है इसका? क्या कहना चाहती हैं आप ?


आप ज्योतिर्विद हैं। ब्लागों को पर घूमते घामते यत्र तत्र ऐसी प्रतिक्रियाएं दर्ज करते रहने का मतलब मैं समझ सकता हूं। आ जिस व्यवसाय में हैं, और इस व्यवसाय नें हाईटेक माध्यमों को जिस खूबसूरती से अपना माघ्यम बनाया है, उस लिहाज से विज्ञापन का यह बुरा भी नहीं है। वुद्धिजीवी समाज में प्रवेश का सीधा और कारगर तरीका। मगर मुझे नहीं लगता कि साहित्यकारों का समाज इतना पुराणमुखी और मूर्ख होगा कि त्योतिष के झमेले में फंसेगा। दुनिया बहुत बड़ी है। दुख भी बहुत है दुनिया में। एक ऐसा समाज, जो अपनी व्यस्थागत असंगतियों के कारण श्रम का उचित मूल्य देने पाने में नाकाम हाता है, उसमें संयोगों और अनदेखे अनजाने रास्तों से धन कमाने की संभावना तलाशने की प्रवृत्ति फलती फूलती है। ज्योतिष ऐसे ही समाजो में अपना जाल फैलाता है। वैश्वीकरण नें धन कमाने के तमाम शार्ट-कट्स पैदा किए हैं। सट्टा और शेयर मारकेट तथा अन्य तरीकों से धनी होने की संभावनाओं से भरे वातावरण की रचना की है। लोभ और लालच को नए सिरे से बढ़ावा मिल रहा है। यह पूरा का पूरा वातावरण भाग्यवाद और ज्योतिष के लिए बाजार तैयार करता है। आप कितनी समझदार कि मेहनत का रास्ता छोड़ लोगों का भाग्य बांचने का रास्ता अपना लिया है। आप जो कर रही हैं, करें। लेकिन,कृप्या वाह वाह वाली दो शब्दीय टिप्पणी के बहाने से हमें अपने ज्योंतिष के भाग्यवादी जंजाल में फंसाने का प्रयास न करें। आप को कविता कितनी समझ में आती होगी,इसका अनुमान करना कतई कठिन नहीं।


कपिलदेव’’



पत्र को पढने के बाद मैने उन्‍हे इतना ही जवाब दिया ‘’काश !!आपने मेरे ब्‍लाग को अच्‍छी तरह पढा होता !!’’ क्‍योंकि मेरे पाठक कहा करते हें कि लोगों के कहे का मैं बिल्‍कुल बुरा न मानूं , चुप बैठ जाउं , पर आखिर कबतक ? मैं समझ नहीं पा रही कि मेरी गलती क्‍या है ? सिर्फ यही कि मैं ज्‍योतिष जैसे विवादास्‍पद विषय की गलतफहमी को दूर करने का बीडा उठाया है ? क्‍या लीक से हटकर काम करना एक गुनाह है ? तनाव बढता जा रहा था , अपने को पुन: सहज बनाने के लिए मुझे कुछ लिखना आवश्‍यक था , जो मैने अपने इस ब्‍लाग पर लिख ही डाला, अब यह गलत है या सही, मैं नहीं कह सकती।


‘’किसी भी विषय या विधा पर लिखूं , पर कपिलदेव जीकी तरह लिखने में रूचि मेरी भी है , सिर्फ ब्‍लाग पर ही नहीं , पत्र पत्रिकाओं में मैं भी लिखा करती हूं। पुस्‍तक मेरी भी प्रकाशित हो चुकी है , मेरी पुस्‍तक की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दो वर्षों के अंदर इसका दूसरा संस्‍करण प्रकाशित करवाना पडा। पर कपिलदेव जी की तरह ब्‍लाग मेरे लिए मनोरंजन का पडाव नहीं , मै इसे समाज से धार्मिक और ज्‍योतिषीय भ्रांतियों को दूर करने के अपने लक्ष्‍य के लिए बहुत बडा मंच मानती आयी हूं । कपिलदेव जी की तरह ही लिखे पर प्रतिक्रिया की आवश्‍यकता मुझे भी होती है , पर उनकी धारणा के विपरीत मैं मानती हूं कि प्रतिक्रिया देने का सबका अपना अपना अंदाज होता है। साहित्‍य शिल्‍पी पर मेरी दो कहानियां प्रकाशित हुई हैं। जहां साहित्‍य के जानकार ने इसके शिल्‍प की कमजोरियों पर प्रतिक्रिया दी , वही अन्‍य पाठको ने इसकी विषयवस्‍तु पर और अन्‍य ने रोचकता पर। आवश्‍यक नहीं कि सभी पाठक साहित्‍य की गहरी समझ ही रखें।


मैं ज्‍योतिर्विद हूं , यह तो उन्‍होने मेरे प्रोफाइल में देख लिया , पर मैं इस व्‍यवसाय में हूं , यह कैसे जान गए , मैने तो सिर्फ अपनी रूचि और अध्‍ययन मनन का ही जिक्र किया था। वे समझते हैं कि मैने अपने विज्ञापन के लिए उन जैसे साहित्‍यकारों की पोस्‍ट पर टिप्‍पणियां करती हूं , हो सकता है सही हो , आखिर अपने नाम का प्रचार प्रसार कौन नहीं चाहता ? मैं अवश्‍य चाहूंगी कि मैं जिन ब्‍लोगों पर जा रही हूं , उन ब्‍लोगों के संचालक भी मेरे चिट्ठे पर आएं ताकि मैं जीनवभर के ज्‍योतिषीय अनुभवों को उनसे साझा कर सकूं , पर वे मानते हैं कि साहित्‍यकारों का समाज इतना पुराणमुखी और मूर्ख नहीं है तो इस ज्ञान को न प्राप्‍त करने का नुकसान उन्‍हें ही होगा , मुझे कोई नुकसान नहीं हो रहा।


जहां तक धन कमाने का सवाल है , नवम्‍बर के पहले सप्‍ताह से ही शेयर बाजार की साप्‍ताहिक स्थिति के बारे में मेरी भविष्‍यवाणियों का कालम 90 प्रतिशत की सत्‍यता के साथ मोलतोल डाट इन में प्रकाशित होता आ रहा है , ऐसी हालत में धन कमाना हमारे लिए बहुत मुश्किल नहीं। पर बचपन से ही पापाजी के समक्ष बडी बडी गाडियों में आते हुए लोगों को इस कदर परेशान देखा है कि यह बात साफ हो गयी है कि धन को सिर्फ साधन होना चाहिए साध्‍य नहीं और इस मामले में खुशकिस्‍मत हूं कि जरूरत भर धन मेरे पास मौजूद है।


मेरे ख्‍याल से ब्‍लाग लिखने , सबका ब्‍लाग पढने और सबमें टिप्‍पणी कर प्रसिद्ध होने का रास्‍ता उतना आसान भी नहीं , जितना कपिलदेव जी समझते हैं। इस रास्‍ते से प्रसिद्ध होने के लिए प्रतिदिन सात आठ घंटे देने के बावजूद मुझे कम से कम छह वर्ष इंतजार करना पडेगा , जबकि इससे और छोटे बहुत से रास्‍ते हैं , जिनपर चलकर बहुत मजबूत हुआ जा सकता है , पर मेरे बचपन के संस्‍कार इसकी इजाजत नहीं देते। खैर अब तो उन्‍हें अपने ब्‍लाग में मेरे द्वारा दी जानेवाली दो शब्‍दीय टिप्‍पणी ‘वाह !! बहुत अच्‍छा !!’ वाले अंदाज में नहीं मिलेगी , कोई और ब्‍लागर ऐसी टिप्‍पणियां न चाहें , तो मुझे सूचित करें , मैं उनके ब्‍लाग में भी टिप्‍पणियां करना छोड दूंगी।


मेरे पिताजी का बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व था , अब तो दार्शनिक हो गए हैं। गणित और विज्ञान में रूचि के कारण 1963 में बी एस सी कर रहे थे , पर उस समय भी वे कविताएं लिखा करते थे। फिर अपने साहित्‍य प्रेम के कारण उन्‍होने इंटर और बी ए का हिन्‍दी का पेपर क्ल्यिर कर फिर हिन्‍दी में एम ए किया। उनकी लिखी कविताएं अभी भी गांव में सुरक्षित ही होंगी , कभी मौका मिला तो नेट पर अवश्‍य प्रकाशित करूंगी। विज्ञान और गणित में मेरी रूचि के बावजूद विज्ञान में अपनी पढाई कायम न रख पाने से मेरे समक्ष आनर्स के लिए कला के किसी विषय को चुनने की बाध्‍यता आई तो अर्थशास्‍त्र के दो पेपर में गणित को देखकर इसे चुना , पर जब अतिरिक्‍त विषय की बारी आयी तो कला के किसी विषय को अपने लिए रूचिकर न समझते हुए मैने साहित्‍य यानि हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनो को ही लेना उचित समझा। इतने साहित्यिक पारिवारिक माहौल मिलने और स्‍नातक स्‍तर तक हिन्‍दी की पढाई करने के बावजूद यदि मुझे कपिलदेव जी की कविता का भाव तक समझ में नहीं आ रहा होगा , जैसा कि वो समझते हैं , तो उन्‍हें अपने लिखें का दंभ नही करना चाहिए, क्‍योंकि भले ही हिन्‍दी में स्‍नातकोत्‍तर के विद्यार्थी या शोध कार्य में लगे छात्र उनकी रचना का उपयोग कर लें , पर जहां तक मैं समझती हूं , यह हमारे समाज के लिए तो कम से कम किसी काम का नहीं।‘’