गुरुवार, 28 मई 2009

अंतिम चरण में ही है अब शनि महाराज .... 6 जून तक अधिक प्रभावी बने रहेंगे

13 दिसम्‍बर 2008 को शनि से संबंधितएक पोस्‍टमें मैने जनवरी से जून तक उसकी खास क्रियाशीलता की वजह से विभिन्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवाले लोगों पर इसके विशेष प्रभाव को बतलाते हुए एक पोस्‍ट लिखा था। लोगों पर चाहे उसका सकारात्‍मक प्रभाव पड रहा हो या नकारात्‍मक , अब यह अंतिम चरण में है और 6 जून के बाद ही इसका प्रभाव काफी कम दिखाई देगा।

जिनपर शनि ग्रह का अच्‍छा प्रभाव पड रहा था , उनके लिए जनवरी से ही किसी खास कार्यक्रम में सफलता प्राप्‍त करने का माहौल बन गया होगा , 17 मई के बाद से वे पुन: इसी कार्यक्रम में व्‍यस्‍त हैं , 30 मई से 6 जून तक का समय उनके लिए खास निर्णायक होगा। जैसा कि उक्‍त पोस्‍ट में मै बतला ही चुकी हूं , निम्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवालों पर इसका अच्‍छा प्रभाव पड रहा था ....

1. वे वृद्ध ,जिनका जन्म 1924 , 1925 के अक्तूबर या नवम्बर में , 1926 , 1927 , 1928 के मई या जून में , 1929 , 1930 के जून या जुलाई में , 1931 , 1932 , 1933 के जुलाई या अगस्त में , 1934 , 1935 के अगसत या सितम्बर में हुआ हो।
2. जिनका जन्म मई 1937 से मार्च 1940 , मार्च 1967 से अप्रैल 1969 , अप्रैल 1996 से फरवरी 1999 के मध्य हुआ हो।
3. जिनका जन्म मेष राशि के अंतर्गत हुआ हो।

इसके अलावे जिन लोगों पर इसका बुरा प्रभाव पड रहा है , वे भी जनवरी से ही किसी खास कार्यक्रम के कारण अनिश्चितता के माहौल में होंगे , 17 मई के बाद उनके सम्‍मुख एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल तैयार हो गया है , 30 मई से 6 जून तक का समय उनके लिए खास बुरा होगा। ये निम्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवालों पर इसका बुरा प्रभाव पड रहा है ...

1. वे वृद्ध ,जिनका जन्म 1924 और 1925 में अप्रैल या मई में , 1926 , 1927 और 1928 में मई या जून में , 1929 और 1930 में जून या जुलाई में , 1931 , 1932 और 1933 में जुलाई या अगस्त में , 1934 और 1935 में अगस्त या सितम्बर में हुआ हो।
2. जिनका जन्म फरवरी 1932 से फरवरी 1935 , जनवरी 1962 से नवम्बर 1964 के मध्य या फरवरी 1991 से जनवरी 1994 के मध्य हुआ हो।
3. जिनका जन्म किसी भी वर्ष कुंभ राशि के अंतर्गत हुआ हो।

लोगों पर शनि के प्रभाव का यह अंतिम चरण है और पाठकों के लिए यह एक खुशखबरी ही है कि बहुत जल्‍द ही वे इसके प्रभाव से मुक्‍त होने जा रहे हैं।

सोमवार, 25 मई 2009

आखिर बृहस्‍पति के प्रभाव से पंजाब में भडक गयी न आग ???????

13 मई को अपने एक आलेखमें मैने 17 मई को बृहस्‍पति और चंद्र की खास स्थिति के फलस्‍वरूप एक महीने तक बृहस्‍पति के अधिक प्रभावी होने की चर्चा करते हुए लेख के आरंभ में लिखा था.....

"16 से 19 मई 2009 को बृहस्पति ग्रह की सूर्य , पथ्वी और चंद्र से एक खास स्थिति बनेगी। 17 और 18 मई को पूर्वी क्षितिज पर 1 बजे रात्रि के आसपास बृहस्‍पति और चंद्र का लगभग साथ साथ उदय होगा , इसे आसमान में भोर होने तक कभी भी देखा जा सकता है। जहां 3 बजे भोर तक इन्‍हें पूर्वी क्षितिज पर 30 डिग्री उपर देखा जा सकता है , वहीं 5 बजे सुबह 60 डिग्री उपर। वैसे तो इस प्रकार का संयोग हर महीने होता है , पर 'गत्यात्मक ज्योतिष' के हिसाब अर्द्धचंद्र के साथ बननेवाली बृहस्‍पति की यह युति खास है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार इस दिन से 19 जून 2009 तक जहां बृहस्पति ग्रह की गत्यात्मक उर्जा में कमी आएगी , वहीं इसकी स्थैतिक उर्जा में दिन प्रतिदिन वृद्धि होती चली जाएगी। 16 मई से 19 जून 2009 तक बृहस्पति ग्रह की यह स्थिति जनसामान्य के सम्मुख विभिन्न प्रकार के कार्य उपस्थित करेगी। "

पुन: आलेख के अंत को देखें .....

"इसके अलावे गुरू बृहस्‍पति धर्म और ज्ञान से भी जुडा है , इसलिए धार्मिक क्रियाकलाप भी इस एक महीनों में जमकर होते हैं। पर जैसा कि आज के युग में धर्म का रूप भी वीभत्‍स हो गया है , इसलिए युग के अनुरूप ही दो चार वर्षों से बृहस्‍पति चंद्र की इस युति के फलस्‍वरूप यत्र तत्र धार्मिक और सांप्रदायिक माहौल को भडकते हुए भी पाया गया है । आइए ,'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'के साथ गुरू बृहस्‍पति से प्रार्थना करें कि वे अपने शुभत्‍व को ही बनाए रखें और लोगों के समक्ष कल्‍याणकारी वातावरण ही बनाए रखें। "

और इसी मध्‍य हुए पंजाब का माहौल देखिए , इससे आगे कुछ कहकर मुझे झंझट नहीं बढाना , पर आपकी अवश्‍य सुनना चाहूंगी।

रविवार, 24 मई 2009

ज्‍योतिषीय ज्ञान से धनोपार्जन करना क्‍यों अनुचित है ??????

मेरे पिताजी संपन्‍न परिवार के लडके थे , रोजी रोटी की कोई समस्‍या नहीं थी , अपनी पहचान बनाने के लिए शायद ज्‍योतिष को ही चुन लिया था और इसमें गयी उत्‍सुकता के कारण उन्‍होने अपनी सरकारी नौकरी से त्‍याग पत्र भी दे दिया था। विवाह होना ही था , सो हुआ , धीरे धीरे परिवार भी बडा होने लगा , खैर पूंजी की मजबूती की बदौलत वे खेती बारी के अलावे साइड में कुछ व्‍यावसायिक उठापटक कर अपने खर्चे निकालते रहें। दिन रात ज्‍योतिषीय अध्‍ययन मनन , विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपर्कों के बढते जाने के कारण झारखंड के विभिन्‍न शहरों में अपने सर्किल के बन जाने के बावजूद अपने ज्‍योतिषीय सलाहों के बदले उन्‍हें कुछ ‘लेना’ स्‍वीकार्य नहीं हुआ। जहां तक मुझे बचपन की बातें याद है , दूर दूर से अनजान लोग भी ज्‍योतिषीय सलाह लेने को आते , फी लेने का तो कोई सवाल ही न था , हमलोग चाय , नाश्‍ता के बाद ही उन्‍हें विदा करते थे।

1988 में मेरी शादी तक तो सब ठीक ठाक रहा ही , उसके बाद के दो तीन वर्ष भी सामान्‍य खर्चो निकाल पाने में विशेष दिक्‍कत न हुई , पर दूसरी बहन की शादी के लिए घर में मुद्रा की कमी से उनपर पारिवारिक दवाब पडना शुरू हुआ। तब उन्‍होने अपने ज्‍योतिषीय क्रियाकलापों को छोडकर कुछ दूसरा काम कर विवाह के लिए धन इकट्ठा करना चाहा। पर उनके धनबाद के अभिन्‍न मित्रों , खासकर ‘धनबाद जिला चैम्‍बर्स आफ कामर्स एंड इंडस्‍ट्रीज’ के अध्‍यक्ष श्री बी एन सिंह जी को यह बात बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं लगी कि इतने ज्‍योतिषीय अनुभव रखने के बाद वे अपनी आर्थिक जरूरत के लिए कहीं और भटकें। उन्‍होने ही स्‍पेशल बुकलेट्स छपवाकर अपने पूरे सर्किल के लोगों और उनके परिवारों की जन्‍मकुंडलियां बनाने का काम पापाजी को सौंपा और फी के नाम पर 500 रू प्रति कुंडली तय किया। यह 1991 की बात है , जन्‍म विवरण के अनुसार कुंडली बनाने , ग्राफ खींचने और उसके अनुसार भविष्‍यवाणियां करने के क्रम में उस बुकलेट्स के सभी खानों को भरने में उन्‍हें छह से सात घंटे लग जाते थे , पापाजी की मेहनत को देखते हुए 1994 में ही यह फी बढाकर 1000 रू कर दी गयी। आज यह देखकर बी एन सिंह जी को ताज्‍जुब होता है कि 1991 से 1996 के मध्‍य महथाजी के द्वारा बनायी गयी जिन जन्‍मकुंडलियों में जिस तरह का ग्राफ और जिस तरह की जीवनयात्रा लिखी गयी थी , आज 12 से 15 वर्षों के बाद 80 प्रतिशत से अधिक लोगों के साथ बिल्‍कुल वैसी ही परिस्थितियां हैं।

पर उनका मन बंधे बंधाए कामों में नहीं लग पाया , 1996 में सबसे छोटी बहन की शादी के बाद आर्थिक आवश्‍यकता के समाप्‍त होते ही उन्‍होने यह काम बंद कर दिया , पर सलाह के बदले छोटी मोटी फी मिलनी शुरू हुई , जो अभी तक जारी ही है। 1999 में वे अपनी लिखी पुस्‍तकों को प्रकाशित कराने और अपने शोध को पहचान दिलाने दिल्‍ली चले गए , पर सोंचना जितना आसान था , वह न हो पाया। बैंक अकाउंट में रखे पैसे कितने दिन चलते ? वहां से लौटने की भी इच्‍छा न थी , इस कारण तुरंत वहां विज्ञापन देना शुरू किया और 60 वर्ष की उम्र के बाद ज्‍योतिषीय परामर्श के द्वारा वहां का किराया और रहने का खर्चा निकालने लगे। कहीं भी विज्ञापन का हमारा फार्मूला ‘NO SATISFACTION , NO FEE’ का होता है , इसलिए नई जगह में भी लोग हमपर अविश्‍वास नहीं कर पाते । सिर्फ फी ही लेते हैं हमलोग , क्‍योंकि हमलोग न तो रत्‍न धारण पर विश्‍वास करते हैं और न ही पूजा पाठ पर कि उस बहाने कुछ लिया जाए । पर कुछ ही दिनों में मेरे एक भाई का तबादला दिल्‍ली हुआ , फिर परिवार के सभी लोग वहीं पहुंच गए , रहने के लिए एक छोटा सा मकान भी बना लिया । 2004 से ही बेटों के द्वारा घर संभाले जाते ही वे फिर धनोपार्जन छोडकर अध्‍ययन मनन में लग गए। वैसे उनके पास कुछ लोग अभी भी आते रहते है , पर उनका ध्‍यान कभी भी कमाई की ओर नहीं होता।

इस तरह मेरे पिताजी ने 1991 से 1996 और 1999 से 2003 तक अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्‍योतिष का अध्‍ययन मनन छोडकर ज्‍योतिष को प्रोफेशन के तौर पर अपनाया। आजतक यही कहा जाता आ रहा है कि ज्‍योतिष दैवी‍ विद्या है , इसका ज्ञान सबों को नहीं मिल पाता , ईश्‍वर के आशीर्वाद से ही इस ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है , इसलिए इस ज्ञान को मानव समाज की सेवा और उत्‍थान में लगाया जाना चाहिए , न कि धनोपार्जन में। आखिर ये सब भ्रांतियां है या हकीकत ? पिताजी के जीवन में मैने देखा कि जब जब आर्थिक जरूरतें आयी , उन्‍होने ज्‍योतिष के द्वारा हल कर लिया। क्‍या आप पाठकों को भी यह गलत लगता है ? यह कहां का न्‍याय है कि हम दिन रात ज्‍योतिष में माथापच्‍ची करें और पैसे की आवश्‍यकता हो तो किसी और क्षेत्र में जाएं ? आखिर हर क्षेत्र के विशेषज्ञों को धनोपार्जन की आजादी है तो ज्‍योतिषियों को क्‍यों नहीं ? हां , लोगों को गुमराह करते हुए पैसे कमाना सबके लिए गलत हो सकता है , चाहे वह डाक्‍टर , इंजीनियर , वकील , ज्‍योतिषी या व्‍यवसायी जो भी हों।