शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

क्‍या अब भी आप इसे मात्र संयोग ही कहेंगे ??

आज ही भावना जी का एक पोस्‍टपढा , जिससे महसूस हुआ कि उन्‍हें जीवन में हर 12– 12 वर्षके अंतराल में एक खास तरह की घटना यानि पैर की चोट से उन्‍हें संयुक्‍त होना पडा है। जब वे छह वर्ष की थी , जब वह अठारह वर्ष की थी और जब आज वे तीस वर्ष की हैं , बिल्‍कुल एक तरह की घटना से उन्‍हें रूबरू होना पड रहा है। इस खास संयोग पर उनका ध्‍यान जाना स्‍वाभाविक है क्‍योंकि उन्‍हे नहीं लग रहा कि तीन बार संयोग यूं ही उपस्थित हो सकता है। वे मानने को मजबूर हैं कि किसी योग के फलस्‍वरूप ही इस प्रकार की घटना हुई है , जिसे एक ज्‍योतिषी या अंकविज्ञान के ज्ञाता बता सकते हैं । हर पाठक इसे भावना जी का अंधविश्‍वास ही कहेंगे , पर मैं नहीं कह सकती । सांख्यिकीविद भी कभी कभी अपने आंकडों के आधार पर कुछ समयांतरालपर एक जैसी घटना होने की बात करते हैं। पर इसका ग्रह से संबंध हो सकता है , इसपर उन्‍होने कोई छानबीन ही नहीं की तो कैसे पता चल सकता है ? पर तीन बार एक प्रकार की घटना से हमें गुजरना पडे और उसमें किसी रहस्‍य के होने की बात होकर इसे अंधविश्‍वास कह दें , तो इसका अर्थ यह है किहम सत्‍य से आंख मिलाने की हिम्‍मतनहीं कर रहे हैं।


अब मेरे एक आलेखको पढे , वैसे बृहस्‍पति के इस खास ग्रह स्थिति की चर्चा मैने एक नहीं , दो दो आलेखों में की है , जिसका लिंक भी आपको इसी आलेख में मिल जाएगा। बृहस्‍पति इस वर्ष एक खास स्थिति से गुजरनेवाला है , इस स्थिति का अच्‍छा और बुरा प्रभावजिनलोगों पर पडेगा , उनका जन्‍मवि‍वरण भी मैने आलेख में दे दिया है। जिनपर बुरा प्रभाव पडेगा , उस जन्‍मविवरण पर गौर कीजिए , सारे लोग 6 , 18 , 30 , 42 , 54 , 66 और 78 वर्ष की उम्र केहैं। यानि आज न सिर्फ 30 वर्ष की भावना जी इस प्रकार के कष्‍ट से गुजर रही हैं , यत्र तत्र उन्‍हीं के समान योग का 6 वर्ष का बच्‍चा , 18 वर्ष का किशोर , 42 और 54 वर्ष के बुजुर्ग और 66 और 78 वर्ष के वृद्ध भी झेल रहे होंगे। इसी प्रकार 12 वर्ष या 24 वर्ष पहले बृहस्‍पति की इसी स्थिति में जब भावना जी बच्‍ची रही होंगी , उस समय भी विभिन्‍न आयुवाले इस कष्‍ट को झेल रहे होंगे।

अब प्रश्‍न यह भी उठता है कि 6 , 18 , 30 , 42 , 54 , 66 और 78 वर्ष की उम्र के सभी लोगयानि मेरे द्वारा दिए गए जन्‍मविवरण में जन्‍म लेनेवालों में से सबों को ये कष्‍ट क्‍यूं नहीं आया ? इसका जवाब यह है कि इस पूरे अंतराल में विभिन्‍न कुंडलियों में अलग अलग भावों का स्‍वामी बृहस्‍पति अलग स्थिति में हो सकता है। इसलिए आवश्‍यक नहीं कि सबों को शारीरिक कष्‍ट ही हो , प्रतिफलन काल एक होने के बावजूदसुख या दुख के संदर्भ भिन्‍न भिन्‍नहो सकते हैं। वैसे शारीरिक या आर्थिक मामला हमें जितना प्रभावित करता है उतना अन्‍य नहीं , पर इसके बावजूद कुछ न कुछ समस्‍याएं आती हैं , जिसपरभावना जी की तरह सबका ध्‍यान नहीं जाता।मान लीजिए आपका  किसी दोस्‍त के साथ झगडा हुआ हो या किसी अन्‍य मामलों के कारण मानसिक तनाव रहा हो , या फिर किसी प्रकार की संपत्ति की समस्‍या या अपना या अपने संतान में से किसी का बुरा परीक्षा परिणाम । यदि आप ढूंढें तो इन 6 , 18 , 30 , 42 , 54 , 66 और 78 वर्ष की उम्र में आपको अपने जीवन में भी कुछ न कुछ समानता अवश्‍य मिलेगी।

बुधवार, 2 सितंबर 2009

कुछ निश्चित होने के बाद भी कुछ और तो हमारे हाथों में रह ही जाता है !!

पिछली पोस्‍ट पर मिली टिप्‍पणियों को देखते हुए महसूस हुआ कि अभी भी भृगुसंहिता से संबंधित संदर्भों में आगे बढने के लिए कुछ बातें स्‍पष्‍ट करना आवश्‍यक है। सबसे पहले सिद्धार्थ जोशी जी की टिप्‍पणी पर गौर करें ....

अच्‍छा लॉजिक है लेकिन इसमें कुछ कमी दिखाई देती है। पहली तो यही कि पेड़ पौधे गति नहीं कर सकते। और मनुष्‍य कर्म करके प्रकृति की उन बाधाओं को पार पा जाता है जिन्‍हें खुले में पेड़ पौधों को अपनी जड़ अवस्‍था में ही सहना पड़ता है।
ऐसे में किसी का भाग्‍य कर्म से कितना प्रभावित होता है
और कर्म भाग्‍य से कितना प्रभावित होता है
दोनों गणनाएं करना क्‍या टेढी खीर नहीं है। हो सकता है दस पेड़ों में से हरेक का भाग्‍य स्‍पष्‍ट बताया जा सके लेकिन दस बच्‍चों का भाग्‍य कैसे बताएंगे। और हाल में पैदा हुए फराह खान के तीन बच्‍चों का ? :)

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ मानता है कि पेड पौधे गति नहीं कर सकते और मनुष्‍य गति कर सकता है , यह इन दोनो का स्‍वभाव है , अपने जड से सारी शक्ति लेते हुए अचल रहकर भी पेड विकास का क्रम बनाए होता है , जिसे प्राप्‍त करने के लिए मनुष्‍य को चलना फिरना आवश्‍यक है। इसके साथ ही प्रकृति ने इसी हिसाब से सहनशक्ति की भिन्‍नता भी तो विभिन्‍न जीवों को प्रदान की है। वहां पर मनुष्‍य को सारे जीवों से अलग माना जा सकता है । पर मैने पहले ही लिखा कि इस दृष्टि से एक समान होते हुए भी सारे मनुष्‍य अलग अलग प्रकार के बीज हैं और तद्नुसार ही जीवन में अलग अलग गुणों और विशेषताओं के साथ सफलता या असफलता प्राप्‍त करते हैं।

अब सवाल है दस पेड़ों में से हरेक का भाग्‍य स्‍पष्‍ट बताने में सरलता की , जबकि दस बच्‍चों का भाग्‍य बताने में कठिनता की , वह दिक्‍कत इसलिए आती है , क्‍यूंकि बीजों की भविष्‍यवाणी करते समय एक किसान सिर्फ उसके गुणात्‍मक पहलू और प्रतिफलन कालको बतलाने की कोशिश करते हैं , जबकि बच्‍चे के भविष्‍य को बतलाने में हम ज्‍योतिषी परिमाणात्‍मक स्‍तर तकपहुंच जाते हैं। यदि किसान अपने को विद्वान समझते हुए बीजों को देखकर भी परिमाणात्‍मक (कितना) की चर्चा करने लग जाएं , तो उस भविष्‍यवाणी में भूल होना निश्चित है , क्‍यूंकि विकास को निश्चित बतलाने में सिर्फ बीज ही नहीं उसका देख रेख भी मायने रखता है। एक बीज की तरह ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ बच्‍चे के गुणात्‍मक पहलू और उसके प्रतिफलन कालकी ही भविष्‍यवाणी करना उचित मानता है। फराह खान के तीनो बच्‍चों ने यदि एक ही लग्‍न में जन्‍म लिया होगा , तो उनमें एक जैसी प्रवृत्ति दिखाई पडेंगी , पर यदि उन्‍होने अलग अलग लग्‍न में जन्‍म लिया हो , तो अलग अलग होनी निश्चित है , पर लक्ष्‍य के बारे में आप पक्‍का दावा नहीं कर सकते , यह व्‍यक्ति के अपने हाथ में भी हो सकता है।
इसी संदर्भ में एक दूसरी टिप्‍पणी स्‍वदेश जैन जी की मेरे ईमेल तक पहुंची है ....
आपने लिखा कि "इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है।" इसका मतलब यह क्यों ना मान लिया जाय कि जो कर्म हम कर है वह भी पूर्वनिर्धारित ही हुए ना, यदि यह सोच सही है तब पाप करना या पुण्य अर्जित करना अपने हाथ मे नही है ना।


आपके उत्तर का इन्‍तजार रहेगा कृपया मार्गदर्शन कीजिये !

जब किसी बच्‍चे के जन्‍म के समय के ग्रहों के आधार पर बननेवाली जन्‍मकुंडली के आधार पर हमलोग बच्‍चे की जीवनभर के शारीरिक , मानसिक और अन्‍य प्रकार के सुखों , दुखों की सटीक चर्चा करने का दावा कर रहे हैं , तो यह तो निश्चित है कि मनुष्‍य की प्रकृति , सोंच , पवृत्तियां और उसकी व्‍यक्तिगत परिस्थितियां पूर्वनिर्धारित मानी जा सकती है , पर कर्म करने से पहले वह अपने आसपास की दुनिया यानि सामाजिक , राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय माहौल से प्रभावित होता है। यानि माहौल अच्‍छा मिले तो वे बुरी प्रवृत्तियां समाप्‍त होने की और अच्‍छी प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावना रहती है , जबकि माहौल गडबड हो तो इसके विपरीत होता है। इसलिए बहुत कुछ निश्चित होने के बाद भी बहुत कुछ और तो हमारे हाथों में रह ही जाता है।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

जब सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या योगदान रहा ??

मैने कल भृगुसंहिता के बारे में एक आलेख पोस्‍ट किया था , इसकी दूसरी कडी मैं आज पोस्‍ट करनेवाली थी , पर पहले पहली कडी के पाठकों की जिज्ञासा को शांत करना आवश्‍यक है। क्षितिज जी के अनुसार उस पोस्‍ट में जानकारी तो अच्‍छी थी , लेकिन मेरा आलेख उन्‍हें तकनीकी अधिक लगा। उनका मानना है कि अगर कुछ उदाहरणों के साथ मैं इसे सरल रुप में लिखती तो शायद आम लोग भी इसका लाभ उठा पाते , पर मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई कठिन बात मैने लिखा है , आप जब भी नए विषय को पढेंगे , आपको पुराने विषयों की अपेक्षा अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण की जरूरत होती है। हमें ज्‍योतिष के हिसाब से कुछ शब्‍दों को प्रयोग करना होता है , आप हमारेपुराने आलेखमें इन शब्‍दों ( राशि , लग्‍न आदि ) के बारे में जान सकते हैं।

श्यामल सुमन जी ने भृगु संहिता का नाम भी सुना है और किताब भी देखने का अवसर मिला, लेकिन वे पढ नहीं सके , क्‍यूंकि वह पुस्‍तक संस्‍कृत में थी और उन्‍हें संस्कृत भाषा की उतनी जानकारी नहीं है। उन्‍हें जानकारी दे दूं कि विभिन्‍न प्रकाशकों ने कई लेखकों के हिन्‍दी की भृगुसंहिता का प्रकाशन भी किया है। पर उसे समझने के लिए ज्‍योतिष की थोडी जानकारी आवश्‍यक है। उडनतश्‍तरी जी और डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं पंजाब के किसी गांव में या पूरी या कई गांवों में टुकडो टुकडों में ओरिजनल भृगु संहिता रखी है। सुना बस है कि लोग वहाँ अपना भाग्य पढ़वाने जाते हैं। सुनने में तो हमें भी अवश्‍य आया है , पर जबतक दावों की पुष्टि नहीं हो जाती , वास्‍तव में ओरिजिनल भृगुसंहिता के बारे में कह पाना बहुत ही मुश्किल है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं कि श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी को पढ़ा था कि भृगु संहिता से लोग भूतकाल तो सही सही बता पा रहे थे , पर भविष्य के बारे में उतने सही नहीं थे। पर मेरे विचार से भृगुसंहिता में व्‍यक्ति की चारित्रिक विशेषताएं और भाग्‍य की ओर से मिलनेवाले सुख दुख का ही वर्णन है , समय की इसमें कोई चर्चा नहीं होती । ज्‍योतिषियों के बारे में नहीं , सिर्फ तांत्रिको के बारे में सुना है कि वे भूत की जानकारी सही सही दे पाते हैं , भविष्‍य की नहीं। हो सकता है , वे तांत्रिक हों और भृगुसंहिता के आधार पर भविष्‍य पढने का झूठा दावा कर रहे हों। डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं कि उत्तर में जैसे भृगु संहिता का नाम है वैसे ही दक्षिण में नाडी ज्योतिष का । नाडी ज्‍योतिष के साथ ही साथ सुधीर कुमार जी रावण-संहिता, लाल किताब और नीलकंठी पुस्तकों/विद्याओं का भी भविष्यवाणियों के लिए उपयोग की चर्चा करते हैं , उनकी चर्चा बाद में कभी की जाएगी।

सबसे मुख्‍य टिप्‍पणी आयी प्रवीण शाह जी की , जिन्‍होने कहा कि विश्वास तो नहीं होता इस तरह की संहिताओं में क्योंकि जब हर काल में जन्म लेने वालों का भविष्य पहले ही से लिखा है, जब सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या योगदान रहा? बिल्‍कुल सही कहना है आपका , मुझे खुद भी विश्‍वास नहीं था , पर यह अविश्‍वास वहीं से शुरू होता है , जहां हमलोग अधिक विश्‍वास कर लेते हैं , यदि विश्‍वास एक सीमा तक किया जाए तो अविश्‍वास की कोई गुजाइश नहीं होती।

यदि आपके पास अलग अलग दस बीस प्रकार के बीज हों और आप उन्‍हे न पहचानते हों , तो आप अनिश्चितता की स्थिति में ही उन बीजों को जमीन में बो देंगे , उसे सींचकर और अन्‍य देखभाल कर उसे पौधे बनने देंगे , उसके बाद उन बीजों की गतिविधियों को गौर करेंगे , उनका कौन सा पार्ट किस काम में लाया जा सकता है , उसका प्रयोग कर देखेंगे , पर एक किसान किसी बीज को देखते ही आपको उसका पूरा भविष्‍य बतला देगा। आप उसे बो दें , कितने दिन में उसका अंकुरण निकलेगा , कितने दिन में वह पेड , पौधा या लता बनेगा , कितने दिनों में वह फल देने लायक होगा , उसके विभिन्‍न अंगों यानि जड , तना , फल , फूल और पत्‍तों में से किस किस को किस तरह उपयोग में लाया जा सकता है। इसी प्रकार हम सारे मनुष्‍य देखने में एक समान होते हुए भी अलग अलग प्रकार के बीज हैं , मनुष्‍य की कुंडली के ग्रहों को देखकर हम उसकी प्रकृति के बारे में , उसके विकास के बारे में वैसी ही भविष्‍यवाणी कर पाते हैं ।

पर जिस तरह एक बीज के विकास में देखरेख की भूमिका अहम् होती है , उसी प्रकार एक मनुष्‍य के विकास में भी माहौल बहुत बडा अंतर दे सकता है। एक किसान ने हर प्रकार के बीज का पूरा भविष्‍य आपको दिखा दिया , बीजों का जितना अधिक देखभाल किया जाए , किसान की भविष्‍यवाणी उतनी ही सटीक होगी। पर उसे बोया ही नहीं जाए या बोने के बाद देखभाल नहीं की जाए , तो क्‍या होगा ? उसका नष्‍ट होना तो निश्चित है , पर इससे एक किसान ने बीज के बारे में जो भविष्‍यवाणी की थी , वह गलत तो नहीं होगी न। इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है। मनुष्‍य के भाग्‍य को लंबाई मान लिया जाए और कर्म को चौडाई , तो किसी भूखंड के क्षेत्रफल की तरह ही इन दोनो का गुणनफल ही किसी व्‍यक्ति की उपलब्धि होगी। इसलिए मेहनत से इंकार तो किया ही नहीं जा सकता , पर भविष्‍य की जानकारी से हम सही दिशा में मेहनत करने को प्रवृत्‍त अवश्‍य होते हैं।