शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

दीपावली की रात घर में पकवान और मिष्‍टान्‍न न रखें .... घर में दरिद्दर वास करता है ??

प्राचीन काल से ही अपने धन-संपत्ति , गुण-ज्ञान और बुद्धि-विवेक के बेहतर उपयोग के कारण कुछ चुने हुए लोगों के पास ही संसाधनों की उपस्थिति को स्‍वीकार करना हमारी विवशता रही है। लेकिन सामाजिक तौर पर बेहतर व्‍यवस्‍था उसे कही जा सकती है , जो कई प्रकार के बहानों से इन साधन संपन्‍न लोगों के पास से साधनों को साधनहीनों के पास पहुंचा दे। इससे जहां एक ओर निर्बलों को सहारा मिलता है , तो दूसरी ओर मानसिक श्रम करनेवाले या कला के लिए समर्पित लोगों को भी रोजी रोटी की समस्‍या से निजात मिलती है , जो भविष्‍य में उनके विकास के लिए आवश्‍यक है।

समाज में विभिन्‍न प्रकार के रीति रिवाज या कर्मकांड इसी प्रकार का प्रयास माना जा सकता है। विभिन्‍न प्रकार के त्‍यौहारों को मनाने के क्रम में हमें समाज के हर स्‍तर और हर प्रकार के काम करनेवाले लोगों के सहयोग की जरूरत पड जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी उनका ऐसा महत्‍व है कि उनके बिना हमारा कोई यज्ञ संपन्‍न हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल में बडे बडे गृहस्‍थों के घरों में जमा अनाज का समाज के हर वर्ग के लोगों का हिस्‍सा होता था , जो बिना किसी हिसाब किताब के उनके द्वारा किए गए सलाना मेहनत के एवज में उन्‍हें दिए जाने निश्चित थे।

दीपावली तो लक्ष्‍मी जी जैसी समृद्ध देवी के पूजन का त्‍यौहार है। भला उनकी पूजा में कैसी कंजूसी ? हमारे समाज में दीपावली के दिन नाना प्रकार के पकवान बनाने , फलों मिठाइयों के भोग लगाने , खाने पीने और खुशियां मनाने की परंपरा रही है। समृद्धों के लिए यह जितनी ही खुशी लानेवाला त्‍यौहार है , असमर्थों के लिए उतना ही कष्‍टकर। दीए तो किसी प्रकार जला ही लें , अपने सामर्थ्‍यानुसार सामग्री जुटाकर पूजा पाठ कर वह प्रसाद भले ही ग्रहण कर लें , पर नाना भोग जुटा पाना उनके लिए संभव नहीं। दूसरी ओर समर्थों के घर इतना पकवान बचा है कि बासी होने के बाद उसे बंटवाना पडेगा।

बासी होने के बाद क्‍यूं , दीपावली के त्‍यौहार के दिन ही इस अंतर को पाटने के लिए हम आप शायद कुछ व्‍यवस्‍था नहीं कर सकते हैं , पर हमारे दार्शनिक चिंतक पूर्वजों ने व्‍यवस्‍था कर ली थी। हमारे क्षेत्र में यह मिथक है कि दीपावली की रात्रि 12 बजे के बाद दरिद्दर घूमा करता है और जिसके यहां पकवान बचे हों , उसके यहां वास कर जाता है। इस डर से लोग जल्‍दी जल्‍दी खुद रात्रि का भोजन निपटाकर बचा सारा खाना और मिष्‍टान्‍न गरीबों के महल्‍ले में भेज देते हैं। भले ही यह मिथक एक अंधविश्‍वास है , पर इसके सकारात्‍मक प्रभाव को देखकर इसे गलत तो नहीं माना जा सकता। हमारे अधकचरे ज्ञान से , जो सामाजिक व्‍यवस्‍था और पर्यावरण का नुकसान कर रहा है , ऐसा अंधविश्‍वास लाखगुणा अच्‍छा है। सभी पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !!

दीपावली की रात घर में पकवान और मिष्‍टान्‍न न रखें .... घर में दरिद्दर वास करता है ??

प्राचीन काल से ही अपने धन-संपत्ति , गुण-ज्ञान और बुद्धि-विवेक के बेहतर उपयोग के कारण कुछ चुने हुए लोगों के पास ही संसाधनों की उपस्थिति को स्‍वीकार करना हमारी विवशता रही है। लेकिन सामाजिक तौर पर बेहतर व्‍यवस्‍था उसे कही जा सकती है , जो कई प्रकार के बहानों से इन साधन संपन्‍न लोगों के पास से साधनों को साधनहीनों के पास पहुंचा दे। इससे जहां एक ओर निर्बलों को सहारा मिलता है , तो दूसरी ओर मानसिक श्रम करनेवाले या कला के लिए समर्पित लोगों को भी रोजी रोटी की समस्‍या से निजात मिलती है , जो भविष्‍य में उनके विकास के लिए आवश्‍यक है।

समाज में विभिन्‍न प्रकार के रीति रिवाज या कर्मकांड इसी प्रकार का प्रयास माना जा सकता है। विभिन्‍न प्रकार के त्‍यौहारों को मनाने के क्रम में हमें समाज के हर स्‍तर और हर प्रकार के काम करनेवाले लोगों के सहयोग की जरूरत पड जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी उनका ऐसा महत्‍व है कि उनके बिना हमारा कोई यज्ञ संपन्‍न हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल में बडे बडे गृहस्‍थों के घरों में जमा अनाज का समाज के हर वर्ग के लोगों का हिस्‍सा होता था , जो बिना किसी हिसाब किताब के उनके द्वारा किए गए सलाना मेहनत के एवज में उन्‍हें दिए जाने निश्चित थे।

दीपावली तो लक्ष्‍मी जी जैसी समृद्ध देवी के पूजन का त्‍यौहार है। भला उनकी पूजा में कैसी कंजूसी ? हमारे समाज में दीपावली के दिन नाना प्रकार के पकवान बनाने , फलों मिठाइयों के भोग लगाने , खाने पीने और खुशियां मनाने की परंपरा रही है। समृद्धों के लिए यह जितनी ही खुशी लानेवाला त्‍यौहार है , असमर्थों के लिए उतना ही कष्‍टकर। दीए तो किसी प्रकार जला ही लें , अपने सामर्थ्‍यानुसार सामग्री जुटाकर पूजा पाठ कर वह प्रसाद भले ही ग्रहण कर लें , पर नाना भोग जुटा पाना उनके लिए संभव नहीं। दूसरी ओर समर्थों के घर इतना पकवान बचा है कि बासी होने के बाद उसे बंटवाना पडेगा।

बासी होने के बाद क्‍यूं , दीपावली के त्‍यौहार के दिन ही इस अंतर को पाटने के लिए हम आप शायद कुछ व्‍यवस्‍था नहीं कर सकते हैं , पर हमारे दार्शनिक चिंतक पूर्वजों ने व्‍यवस्‍था कर ली थी। हमारे क्षेत्र में यह मिथक है कि दीपावली की रात्रि 12 बजे के बाद दरिद्दर घूमा करता है और जिसके यहां पकवान बचे हों , उसके यहां वास कर जाता है। इस डर से लोग जल्‍दी जल्‍दी खुद रात्रि का भोजन निपटाकर बचा सारा खाना और मिष्‍टान्‍न गरीबों के महल्‍ले में भेज देते हैं। भले ही यह मिथक एक अंधविश्‍वास है , पर इसके सकारात्‍मक प्रभाव को देखकर इसे गलत तो नहीं माना जा सकता। हमारे अधकचरे ज्ञान से , जो सामाजिक व्‍यवस्‍था और पर्यावरण का नुकसान कर रहा है , ऐसा अंधविश्‍वास लाखगुणा अच्‍छा है। सभी पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !!

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

मंगल ग्रह के बारे में जानकारी की यह चौथी कडी

पिछले चार कडियों एक,दोऔर तीनमें मैने आपलोगों को मंगल के बारे में ज्‍योतिष से संबंधित गत्‍यात्‍मक जानकारी देने की कोशिश की है। जैसा कि पिछली कडी में मैने वादा किया था , इस कडी में यह बताना चाहूंगी कि एक ज्‍योतिषी किसी की कुंडली देखकर किस प्रकार जानकारी प्राप्‍त करे कि संबंधित व्‍यक्ति का मंगल कमजोर है या मजबूत ?
इसके लिए एक ज्‍योतिषी को कुंडली में सूर्य की स्थिति पर गौर करना चाहिए , यदि मंगल सूर्य के साथ हो , या ठीक अगल बगल के राशि में हो तो इसका अर्थ यह है कि सूर्य और मंगल की कोणात्‍मक दूरी 60 डिग्री से अधिक की नहीं है। इस स्थिति में मंगल गत्‍यात्‍मक दृष्टि से मजबूत पर स्‍थैतिक दृष्टि से कमजोर होता है और इस कारण जातक युवावस्‍था में खासकर 24 से 30 वर्ष की उम्र में बढते क्रम में मंगल से संबंधित भावों कोई खास स्‍तर नहीं , पर इन संदर्भों में सुख सफलता प्राप्‍त करता है।

यदि मंगल सूर्य से त्रिकोण में स्थित हो तो इसका अर्थ यह है कि मंगल की दूरी सूर्य से 90 डिग्री या 270 डिग्री से बढकर 120 डिग्री या 300 डिग्री के आसपास की है , इस स्थिति में मंगल की गत्‍यात्‍मक शक्ति तो कम होगी , पर यह स्‍थैतिक उर्जा से युक्‍त होगा। इस कारण जातक युवावस्‍था में खासकर 24 से 30 वर्ष की उम्र में बढते क्रम में बडी जबाबदेही से युक्‍त होता है , मंगल से संबंधित भावों का स्‍तर और मान सम्‍मान प्राप्‍त करेगा।

यदि मंगल सूर्य से ठीक सामने की या उसके अगल बगल की राशि में स्थित हो तो इसका अर्थ यह है कि मंगल की दूरी सूर्य से 150 डिग्री से 180 डिग्री या 330 डिग्री से 360 डिग्री के आसपास की है , इस स्थिति में मंगल न तो गत्‍यात्‍मक और न ही स्‍थैतिक उर्जा संपन्‍न होता है। इस कारण जातक युवावस्‍था में खासकर 24 से 30 वर्ष की उम्र में बढते क्रम में निराशायुक्‍त वातावरण प्राप्‍त करता है , मंगल से संबंधित भावों की कठिनाइयों के कारण उसका जीवन कष्‍टकर हो जाता है।

अगली कडी में इस बात की चर्चा की जाएगी कि जो पाठक ज्‍योतिषी नहीं हैं , वे अपने जन्‍मकाल के मंगल की शक्ति और युवावस्‍था में खासकर 24 से 30 वर्ष की उम्र में अपनी स्थिति के बारे में किस तरह जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं ?





मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

आकाश में मंगल की विभिन्‍न स्थिति का पृथ्‍वी पर अच्‍छा और बुरा प्रभाव ??

पिछले दिनों मंगल से संबंधित मेरे आलेखों को पढने के बाद कई पाठकों के मन में जन्‍मकुंडली में मंगल के कमजोर और मजबूत होने के बारे में जानने की जिज्ञासा जगी। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' जन्‍मकुंडली के हिसाब से नहीं , आसमान में‍ स्थिति के हिसाब से किसी ग्रह के कमजोर और मजबूत होने का आकलन करता है। इसलिए किसी भी जन्‍मतिथि से ही यह निश्चित किया जा सकता है कि संबंधित व्‍यक्ति का कोई ग्रह कमजोर है या मजबूत। उसके बाद जन्‍मसमय के आधार पर बनी जन्‍मकुंडली देखकर तो सिर्फ संदर्भ बताए जा सकते हैं कि उक्‍त ग्रह किन किन संदर्भों के सुख का लाभ या नुकसान करने वाला है।

यदि मंगल के लिए देखा जाए तो मैने डेढ वर्ष पहले ही आसमान में मंगल की स्थिति को समझाते हुए उसकी शक्ति से संबंधित उन सूत्रों की चर्चाकी थी , जो शोध-पत्र मेरे पिता विद्यासागर महथाजी के द्वारा नई दिल्ली में पूसा गेट के समीप राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला सभागार में 19 से 21 फरवरी 2004 को आयोजित किए गए तृतीय अखिल भारतीय विज्ञान सम्मेलन में भेजा गया था, इस सामग्री को संक्षिप्त रूप में सेमिनार के जर्नल में भी प्रकाशित भी किया गया था। इसे समझने में आप सब पाठकगणों को कुछ असुविधा अवश्य होगी, पर मेरा अनुरोध है कि आप इसे समझने की कोशिश अवश्य करें।


 
इस चित्र में आप देख रहे होंगे कि मंगल अपने ही पथ पर घूमते घूमते कभी पृथ्‍वी से बिल्‍कुल निकट , तो कभी काफी दूर चला जाता है। जब यह दूर चला जाता है , तो 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से सर्वाधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न होता है , जब सामान्‍य दूरी पर स्थिति होता है , तो यह सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न होता है , जबकि यह पृथ्‍वी से बहुत निकट आ जाता है , तो इसकी गत्‍यात्‍मक शक्ति काफी कम हो जाती है।

मंगल जब अधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न हो , तो उस समय जन्‍म लेनेवाले व्‍यक्ति युवावस्‍था में सहज सुखद वातावरण प्राप्‍त करते हैं , मनमौजी ढंग से जीवनयापन कर पाने में परिस्थितियां मददगार होती हैं। मंगल सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न हो , तो उस समय जन्‍म लेनेवाले व्‍यक्ति युवावस्‍था में बहुत महत्‍वाकांक्षी होने से नाम यश प्राप्‍त करने के लिए काफी मेहनत भी करते हैं । पर इसके विपरीत, मंगल में गत्‍यात्‍मक शक्ति बहुत कम हो या न हो , तो उस समय जन्‍म लेनेवाले जातक युवावस्‍था में बहुत ही कष्‍टप्रद वातावरण प्राप्‍त करते हैं , जिसके कारण पराधीन और लाचार रहते हैं। 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र तक मंगल का अच्‍छा या बुरा प्रभाव बढते क्रम में होता है।

अगली कडी में ज्‍योतिषी भाइयों के लिए मंगल की शक्ति को देखने का तरीका तो बताया जाएगा ही , साथ ही जनसामान्‍य को भी मंगल की शक्ति से जुडे अच्‍छे बुरे समयांतराल से परिचित करवाया जाएगा।





सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

11-12 अक्‍तूबर के मंगल चंद्र युति का युवा वर्ग पर प्रभाव ??

मंगल से संबंधित कल के आलेखको पढने के बाद पाठकों के मन में कई प्रकार की जिज्ञासा बनी , जिसका समाधान अगली कडियों में की जाएगी। मंगल किन स्थितियों में कमजोर और किन स्थितियों में मजबूत होता है , इसकी ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ बिल्‍कुल स्‍पष्‍टत: चर्चा करता है। अगली कडियों में न सिर्फ जन्‍मकुंडलियों में ही इसके कमजोर और मजबूत होने की चर्चा की जाएगी , वरन् बहुत सारे ऐसी जन्‍म तिथियों का भी उल्‍लेख किया जाएगा , जहां मंगल कमजोर थे और जातक ने 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र तक बढते क्रम में किसी संदर्भ में परेशानी पायी।


लेकिन आज का आलेख आज के ही मुख्‍य बात पर है , वह यह कि अभी यानि 12 अक्‍तूबर 2009 को 5:30 सुबह खास शक्ति वाले मंगल की अष्‍टमी के आसपास की शक्ति वाले चंद्र के साथ युति बन रही है। मंगल और चंद्र की इस स्थिति का उदय कल ही भारत के विभिन्‍न भागों में 11 बजे रात्रि के बाद हो चुका है और आज भोर में जबतक सूर्य का प्रकाश आसमान में फैल कर इन्‍हें धुंधला न कर दे , इसे मध्‍य आकाश में बिल्‍कुल साथ साथ देखा जा सकता है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की दृष्टि से ऐसा योग मंगल को महत्‍वपूर्ण बनाता है , जिसके कारण इन दो दिनों में लोग , खासकर युवा वर्ग विशेष प्रकार की उपलब्धियों और कार्यक्रमों से संयुक्‍त होते हैं।

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार आनेवाले नौ महीने यानि जून जुलाई 2010 तक मंगल ग्रह की स्‍थैतिक शक्ति प्रचुर मात्रा में होगी और यह स्थिति सुखद होगी। चूंकि कल के आलेख में ही समझाया गया कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने मंगल को युवा वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करते पाया है , और अधिकांश लोगों के मंगल मजबूत ही होते हैं । इस कारण इस समय अधिकांश युवा वर्ग अपनी महत्‍वाकांक्षा या सुख की पूर्ति के लिए विशेष तरह के कार्यक्रम में संयुक्‍त रह सकते हैं। 11-12 अक्‍तूबर को शुरू होनेवाली कोई खुशखबरी इस महीने के अंत तक निर्णायक मोड पर पहुंच सकती है यानि कल आज में भनक लगनेवाली भी किसी बात का महीने के अंत अंत तक कार्यक्रम पक्‍का हो जाएगा।

वैसे जिनका जन्‍मकालीन मंगल कमजोर हो , उनके लिए यह मंगल चंद्र की यह ग्रह स्थिति उन्‍हें दुखद या तनावपूर्ण कार्यक्रमों से संयुक्‍त करेगा , वैसे ही कुछ लोगों में से निम्‍न लोग भी हैं , जिन्‍होने इस समयांतराल में जन्‍म लिया है ....

2 फरवरी से 23 मार्च 1980,
9 मार्च से 28 अप्रैल 1982,
22 अप्रैल से 6 जून 1984।

उपरोक्‍त सभी लोग कुछ दिनों से किसी न किसी प्रकार की दिक्‍कतों से ही जूझ रहे हैं , ये इस माह में यदि कोई कार्यक्रम प्राप्‍त भी करते हें , तो वे उनके तनाव और परेशानी को बढाने वाला ही होगा। इसलिए ऐसे लोगों को पुराने वातावरण में ही रहने की सलाह दी जाती है , जबतक कि कोई ठोस जगह न दिखाई पडे। इसके अलावे विभिन्‍न उम्रवाले बहुत सारे लोग भी मंगल की इस खास स्थिति के दुष्‍प्रभाव का कष्‍ट झेलेंगे !