शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

कल के क्रिकेट मैच में भारतीय टीम से कितनी उम्‍मीद रखी जाए ??

क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा टीम की तैयारी और क्रिकेट के पीच को ध्यान में रखते हुए भी समय-समय पर क्रिकेट मैच के बारे में भविष्यवाणियॉ की जाती हैं , परंतु संभावना और सत्यता में तालमेल का प्रतिशत बहुत कम ही देखा गया है। संभावनावाद की दृष्टि से बिना किसी आधार के भी किसी एक घटना में हार और जीत में से एक परिणाम को चुनने की भविष्यवाणी में सही और गलत की संभावना 50-50 प्रतिशत होती है। लेकिन जब घटनाओं की संख्‍या बढायी जाती है , तो कोई आधार न होने की सूरत में संभावनाओं की सत्‍यता का प्रतिशत घटता चला जाता है। किन्तु किसी आधार को लेकर घटनाओं की संख्‍या के बढने के बाद भी भविष्यवाणी की सत्यता को 50 प्रतिशत से बढ़ाते हुए 60-70-80-90 प्रतिशत तक भी ले जाया जा सके , तो उस आधार को प्रमाण मिलने में बाधा नहीं आनी चाहिए। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के द्वारा भी ग्रहों की स्थिति के आधार पर क्रिकेट मैच की जीत और हार के बारे में भविष्‍यवाणियों की सटीकता को बनाए रखने का प्रयत्‍न किया जाता रहा है।

आस्‍ट्रेलिया की टीम सात एकदिवसीय मैचों की शृंखला को खेलने भारत पहुंच गयी है। 25 अक्‍तूबर से ही खेल शुरू हो जाएंगे। ग्रहीय आधार पर किसी भी मैच के बारे में भविष्यवाणी कर पाने में कुछ समस्याएं तो अवश्य आती हैं , क्योंकि जहॉ एक ओर दोनो टीम के सभी सदस्यों का जन्म-विवरण हमारे पास मौजूद नहीं होता , वहीं दूसरी ओर जिस शहर में मैच हो रहा है , वहॉ के आक्षांस और देशांतर रेखाओं से ग्रहों के तालमेल में भी कठिनाई आतीं हैं। फिर भी कुछ वर्षों से हमारे द्वारा क्रिकेट मैच से संबंधित जो शोध किए गए है , उसके आधार पर क्रिकेट मैच के दिन की ग्रहीय स्थिति का उस दिन के क्रिकेट पर पड़नेवाले प्रभाव का विश्लेषण किया जाएगा। इस बार की ग्रहस्थिति भारतीय टीम के बिल्‍कुल भी अनुकूल नहीं है।

25 अक्‍तूबर को बडोदरा के रिलायंस स्‍टेडियम में होने वाले शृंखला के पहले मैच के दिन ही ग्रहों की स्थिति भारतीय क्रिकेट टीम के पक्ष में नहीं दिख रही है। इसलिए 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से जो बडी संभावना बन रही है , उसके अनुसार शुरूआती दिन ही भारत को झटका देनेवाला होगा। वैसे इस दिन बिल्‍कुल शुरूआत का समय यानि 3 बजे के बाद के दो घंटे भारत के पक्ष में दिखते हैं , इसे इस नजर से ही देखा जा सकता है कि इस दो घंटे मे टीम को अच्‍छे खेलने का भ्रम बना रहेगा। क्‍यूंकि इसके बाद फिर अनुकूल ग्रहीय स्थिति पूरे मैच के दौरान नहीं बनेगी और 8 बजे के बाद ही ऐसी प्रतिकूल ग्रहस्थिति बन जाएगी कि मैच समाप्‍त होने की समय सीमा के दो घंटे पहले से ही हार निश्चित दिखाई पडने लगेगी।

चूंकि हम भारतीय हैं , इसलिए यदि अपने इस प्रतिकूल ग्रहस्थिति को भी सकारात्‍मक रूप से देखें, तो बिल्‍कुल शुरूआत का समय यानि 3 बजे के बाद के जो दो घंटे भारत के पक्ष में दिखते हैं , उस समय बल्‍लेबाजी या गेंदबाजी , जिसका भी मौका मिले , यदि भारत बहुत अच्‍छा खेल ले और अपनी स्थिति को काफी मजबूत बना ले , तो जीत की संभावना बन सकती है , लेकिन इसके लिए 8 बजे से 10 बजे रात्रि तक की प्रतिकूल ग्रहीय स्थिति में बिल्‍कुल रक्षात्‍मक खेलते हुए आगे बढना होगा और 10 बजे के बाद अपनी जीत पक्‍की करने की दिशा में कदम बढाने पडेंगे। वैसे इसकी संभावना बहुत ही कम दिखाई पडती है, पर इसके लिए भी हम सब प्रार्थना करें , तो इसमें हर्ज ही क्‍या है ?

अपडेट ... मुझे इस लिंकमें 14:30 IST से मैच के शुरू होने की गलत सूचना मिली थी , क्‍यूंकि मैच 09:00AM से ही शुरू हो चुका है , इसलिए इस आलेख में लिखी गयी बातों को सटीक न माना जाए । समय में परिवर्तन होने के कारण इस मैच की हार जीत को एक अलग कोण से देखना पडेगा।

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में मेरी पहली पोस्‍ट के चार वर्ष पूरे हुए .. ये रही वो पहली पोस्‍ट !!

चार वर्ष पहले जब हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में गिने चुने लोग ही थे , उस समय यहां मैं कैसे हो सकती थी। सचमुच आप सभी पाठकों को यह जानकर ताज्‍जुब होगा , पर यह बिल्‍कुल सत्‍य है कि हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में मैने ब्‍लाग स्‍पाट पर अपनी पहली प्रोफाइल2005 के अक्‍तूबर में बनायी थी और उसी वक्‍त अपना ब्‍लाग बनाकर अपनी पहली पोस्‍टकृतिदेव10 फाण्‍ट में लिखकर ही 20 अक्‍तूबर 2005 को पोस्‍ट कर दिया था। फिर काफी दिनों तक मैं न तो यूनिकोड में लिखने के बारे में नहीं समझ सकी थी , और न ही चिट्ठा संकलकों के बारे में जानकारी थी , इसलिए पोस्‍ट करना बंद कर दिया था। यहां तक कि उस प्रोफाइल का पासवर्ड भी भूल गयी। दो वर्ष बाद ही सितम्‍बर 2007 में मैने वर्डप्रेस पर अपना ब्‍लाग बनाया था और नियमित तौर पर लिखने लगी थी । फिर एक वर्ष बाद अगस्‍त 2008 से मैने ब्‍लागस्‍पाट पर लिखना शुरू किया। ये रहा मेरे सबसे पुराने 20 अक्‍तूबर 2005 को पोस्‍ट किए गए पोस्‍ट का स्‍नैप शाट. , जो संयोग से मुझे ठीक 4 वर्ष बाद 21 अक्‍तूबर 2009 को गूगल सर्च के दौरान मिला ......


इस पोस्‍ट को रजनीश मांगला जी के फाण्‍‍ट कन्‍वर्टरके द्वारा यूनिकोड में बदलकर यहां पोस्‍ट कर रही हूं , आप भी एक नजर डालें , मैने अपनी पहली पोस्‍ट में क्‍या लिखा था ?

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष : एक परिचय

भारत के बहुत सारे लोगों को शायद इस बात का ज्ञान भी न हो कि विगत कुछ वर्षों में उनके अपने देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है, जिसके द्वारा वैज्ञानिक ढंग से की जानेवाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु बुfद्धजीवी वर्ग के मध्य चर्चा का विषय बनीं हुई है। इस 'गत्यात्मक ज्योतिष' के विकास की चर्चा के आरंभ में ही इसका प्रतिपादन करनेवाले वैज्ञानिक ज्योतिषी श्री विद्यासागर महथा का परिचय आवश्यक होगा ,जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही गत्यात्मक ज्योतिष के जन्म का कारण बना।

 महथाजी का जन्म 15 जुलाई 1939 को झारखंड के बोकारो जिले में स्थित पेटरवार ग्राम में हुआ। एक प्रतिभावान विद्यार्थी कें रुप में मशहूर महथाजी रॉची कॉलेज ,रॉची में बी एससी करते हुए अपने एस्‍ट्रानामी पेपर के ग्रह नक्षत्रों में इतने रम गए कि ग्रह-नक्षत्रों की चाल और उनका पृथ्वी के जड़-चेतन पर पड़नेवाले प्रभाव को जानने की उत्सुकता ही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गयी। उनके मन को न कोई नौकरी ही भाई और न ही कोई व्यवसाय। इन्‍होने प्रकृति की गोद में बसे अपने पैतृक गॉव में रहकर ही प्रकृति के रहस्यों को ही समझने का निश्‍चय किया।

ग्रह नक्षत्रों की ओर गई उनकी उत्सुकता ने उन्हें ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन को प्रेरित किया। गणित विषय की कुशाग्रता और साहित्य पर मजबूत पकड़ के कारण तात्कालीन ज्योतिषीय पत्रिकाओं में इनके लेखों ने धूम मचायी। 1975 में उन्हीं लेखों के आधार पर `ज्योतिष-मार्तण्ड´ द्वारा अखिल भारतीय ज्योतिष लेख प्रतियोगिता में इन्हें प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। उसके बाद तो ज्योतिष-वाचस्पति ,ज्योतिष-रतन,ज्योतिष-मनीषी जैसी उपाधियों से अलंकृत किए जाने का सिलसिला ही चल पड़ा।1997 में भी नाभा में आयोजित सम्मेलन में देश-विदेश के ज्योतिषियों के मध्य इन्हें स्वर्ण-पदक से अलंकृत किया गया।


विभिन्न ज्योतिषियों की भविष्‍यवाणी में एकरुपता के अभाव के कारणों को ढूंढते हुए इन्‍हें ज्‍योतिष की दो कमजोरियों का अहसास हुआ...

ज्‍योतिष की पहली कमजोरी ग्रहों की शक्तियानि ग्रह कमजोर हैं या मजबूत , को समझने की थी , क्‍यूंकि इसमें सूत्रों की अधिकता भ्रमोत्‍पादक थी।अपने अध्ययन में इन्‍हें ग्रहों की विभिन्‍न प्रकार की शक्तियों का ज्ञान हुआ जो इस प्रकार हैं .... अतिशीघ्री , 2.शीघ्री , 3. सामान्य , 4. मंद , 5.वक्र , 6.अतिवक्र।
इन्होनें पाया कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय अतिशीघ्री या शीघ्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित अनायास सफलता जातक को जीवन में प्रदान करते हैं। जन्म के समय के सामान्य और मंद ग्रह अपने-अपने भावों से संबंधित स्तर जातक को देते हैं। इसके विपरीत वक्री या अतिवक्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित निराशाजनक वातावरण जातक को प्रदान करते हैं। 1981 में सूर्य और पृथ्वी से किसी ग्रह की कोणिक दूरी से उस ग्रह की गत्यात्मक शक्ति को प्रतिशत में निकाल पाने के सूत्र मिल जाने के बाद उन्होने परंपरागत ज्योतिष को एक कमजोरी से छुटकारा दिलाया।

फलित ज्योतिष की दूसरी कमजोरीदशाकाल-निर्धारण यानि घटना कब घटेगी , से संबंधित थी। दशाकाल-निर्धारण की पारंपरिक पद्धतियॉ त्रुटिपूर्ण थी। अपने अध्ययनक्रम में उन्होने पाया कि ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में विर्णत ग्रहों की अवस्था के अनुसार ही मानव-जीवन पर उसका प्रभाव 12-12 वर्षों तक पड़ता है। जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक चंद्रमा ,12 से 24 वर्ष की उम्र तक बुध ,24 से 36 वर्ष क उम्र तक मंगल ,36 से 48 वर्ष की उम्र तक शुक्र ,48 से 60 वर्ष की उम्र तक सूर्य ,60 से 72 वर्ष की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वर्ष की उम्र तक शनि,84 से 96 वर्ष की उम्र क यूरेनस ,96 से 108 वर्ष क उम्र तक नेपच्यून तथा 108 से 120 वर्ष की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव मनुष्‍य पड़ता है। विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही `गत्यात्‍मक दशा पद्धति' की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं।

उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्‍यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। `गत्यात्मक दशा पद्धति´ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ। भविष्‍यवाणियॉ सटीक होती चली गयी और जातक में समाहित विभिन्न संदर्भों की उर्जा और उसके प्रतिफलन काल का अंदाजा लगाना संभव दिखाई पड़ने लगा।

गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार जन्मकुंडली में किसी भाव में किसी ग्रह की उपस्थिति महत्वपूर्ण नहीं होती , महत्वपूर्ण होती है उसकी गत्यात्मक शक्ति , जिसकी जानकारी के बिना भविष्‍यवाणी करने में संदेह बना रहता है। गोचर फल की गणना में भी ग्रहो की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति की जानकारी आवश्यक है। इस जानकारी पश्चात् तिथियुक्त भविश्यवाणियॉ काफी आत्मविश्वास के साथ कर पाने के लिए `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया ।

गत्यात्मक दशा पद्धति' एवं 'गत्यात्मक गोचर प्रणाली' के विकास के साथ ही ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन गया है , जिसके आधार पर सारे प्रश्नों के उत्तर 'हॉ' या 'नहीं' में दिए जा सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिश की जानकारी के पश्चात् समाज में फैली धार्मिक एवं ज्योतिषीय भ्रांतियॉ दूर की जा सकती है ,साथ ही लोगों को अपने ग्रहों और समय से ताल-मेल बिठाते हुए उचित निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। आनेवाले गत्यात्मक युग में निश्चय ही गत्यात्मक ज्योतिष ज्योतिष के महत्व को सिद्ध करने में कारगर होगा ,ऐसा मेरा विश्वास है और कामना भी। लेकिन सरकारी,अर्द्धसरकारी और गैरसरकारी संगठनों के ज्योतिष के प्रति उपेक्षित रवैये तथा उनसे प्राप्त हो सकनेवाली सहयोग की कमी के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कुछ समय लगेगा , इसमें संदेह नहीं है।




मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

बहुत महत्‍वपूर्ण आलेख है ये ... क्‍या आपने या आपके किसी अपने ने इन समयांतरालों में जन्‍म लिया है ??

मंगल से संबंधित अपने पिछले आलेखमें इस चित्रके माध्‍यम से हमने समझाया था कि आकाश में मंगल अपने ही पथ पर घूमते घूमते कभी पृथ्‍वी से बिल्‍कुल निकट , तो कभी काफी दूर चला जाता है। जब यह दूर चला जाता है , तो 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से सर्वाधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न होता है , जब सामान्‍य दूरी पर स्थिति होता है , तो यह सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न होता है , जबकि यह पृथ्‍वी से बहुत निकट आ जाता है , तो इसकी गत्‍यात्‍मक शक्ति काफी कम हो जाती है। इस आधार पर एक खगोलशास्‍त्री आसमान में मंगल की इस स्थिति के बारे में गत्‍यात्‍मक रूप से कमजोर और मजबूत होने की समझ रख सकते हैं , पिछली कडीमें मैने जन्‍मकुंडली के माध्‍यम से भी एक ज्‍योतिषी को गत्‍यात्‍मक तौर पर मंगल के कमजोर या मजबूत होने के बारे में जानकारी दी थी , पर आमजनों के लिए मंगल के बारे में इस कडी में ही लिख पा रही हूं।

अधिकांश लोगों पर मंगल ग्रह का अच्‍छा प्रभाव ही दिखाई पडता है , इसी कारण युवावस्‍था में शक्ति साहस की प्रचुरता होती है और बहुत कम लोग समस्‍याओं से जूझते हैं। यह बात अवश्‍य है कि अपने अपने स्‍तर के अनुरूप अपने और परिवार की रोजी रोटी की व्‍यवस्‍था करने में कोई बहुत आसानी से सफल हो जाता है , तो किसी को थोडी मशक्‍कत भी करनी पडती है। पर इस कडी में मुख्‍य रूप से 24 से 36 वर्ष की उम्रवाले उन लोगों की चर्चा कर रही हूं , जिनके जन्‍म के समय मंगल ग्रह पृथ्‍वी के बिल्‍कुल निकट था और इस कारण मंगल ग्रह के बुरे प्रभाव से हर ओर से असफल अपने शरीरिक , बौद्धिक और आर्थिक स्‍तर के अनुरूप जीवनयापन कर पाने में असमर्थ ये लोग पराधीनता के वातावरण में रहकर अपनी शक्ति और साहस का उपयोग नहीं कर पाते तथा तनावग्रस्‍त जीवन जीने को मजबूर  हैं।

इन दुर्भाग्‍यशाली युवाओं में सबसे वरिष्‍ठ 12 अक्‍तूबर से 12 नवम्‍बर 1973 के मध्‍य या इसके आसपास जन्‍म लेनेवाले माने जाएंगे , ये कमजोर मंगल की वजह से 1991 के बाद से ही हल्‍के रूप में अपने कार्यक्रमों में बाधा पाते रहे हैं। 1997 के बाद इनकी कठिनाइयां बढते क्रम में 2003 तक बनी रही , 2003 से बढते क्रम में थोडी राहत अवश्‍य महसूस कर रहे हैं , पर पूरा सुधार होने में अभी और एक वर्ष की देर हो सकती है।

इसके बाद के नंबर में 20 नवम्‍बर 1975 से 5 जनवरी 1976 तक या इसके आसपास जन्‍म लेनेवाले आएंगे , जिन्‍होने 1994 से ही छोटे और 2000 के बाद बडे रूप में समस्‍याओं से जूझते हुए 2006 तक काफी कठिनाई भरा समय गुजारने के बाद अभी थोडी राहत में दिख रहे हैं। मंगल के बुरे प्रभाव के समाप्‍त होने में इन्‍हें और तीन वर्षों का इंतजार करना पड सकता है।

इसके बाद 1 जनवरी से 15 फरवरी 1978 तक या इसके आसपास जन्‍मलेनेवाले आएंगे। इन्‍होने 1996 से हल्‍के रूप से और 2002 से गंभीर रूप से आनेवाली समस्‍याओं से जूझते हुए 2007 तक भयानक तनाव झेलते हुए अभी एक डेढ वर्षों से चैन की सांस ले पा रहे हैं , थोडी राहत के बावजूद उनकी कुछ समस्‍याएं 2013 तक चलती रहेंगी।

अभी सबसे कठिनाई वाली स्थिति से गुजर रहे युवाओं में वे आएंगे , जिन्‍होने 1 फरवरी से 20 मार्च 1980 तक या इसके आसपास जन्‍म लिया है। 1998 के बाद हल्‍के रूप में आरंभ हुई और 2004 के बाद गंभीर हुई परिस्थितियों से जूझते हुए किंकर्तब्‍यविमूढावस्‍था में ये अपने को बिल्‍कुल लाचार पा रहे हैं। आनेवाला एक वर्ष उनके जीवन का सर्वाधिक बुरा वर्ष माना जा सकता है।

इसके बाद नंबर आता है 7 मार्च से 30 अप्रैल 1982 के मध्‍य या इसके आसपास जन्‍म लेनेवालों का , जो अपनी परिस्थितियों को 2000 के बाद थोडी और 2006 के बाद अधिक गंभीर तो महसूस कर रहे हैं , पर संघर्ष का दौर जारी है। आनेवाले तीन वर्ष इनके लिए भी कठिनाई भरे रहेंगे। इसलिए इस समय जीवनशैली में किसी प्रकार का परिवर्तन करना उचित नहीं है।

मंगल के प्रभाव को महसूस करनेवाले युवकों में सबसे नए 22 अप्रैल से 5 जून 1984 तक या इसके आसपास जन्‍म लेनेवाले युवक होंगे। पिछले एक वर्ष से इनके सम्‍मुख प्रतिकूल परिस्थितियां तो दिखायी दे रही हैं , पर अक्‍तूबर से इतनी गंभीर हो जाएंगी , ऐसा तो इन्‍होने कभी सोंचा भी नहीं होगा। आनेवाले पांच वर्ष इनके लिए गंभीर रहेंगे , जिनसे जूझने के लिए हर प्रकार से सावधानी की आवश्‍यकता होगी।

भविष्‍यवाणियों का यूं सामान्‍यीकरण बहुत सारे ज्‍योतिष प्रेमियों को गलत लगता रहा है , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि प्रकृति के नियम बिल्‍कुल सामान्‍य ढंग से काम करते हैं , इन्‍हें समझने के लिए बेवजह जटिल बनाना उचित नहीं।

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

भूतों के भय से ही जुडा एक किस्‍सा और भी सुनिए !!

संभवत: यह घटना 1981 के आस पास की है। कलकत्‍ते में रहनेवाले हमारे एक दूर के रिश्‍तेदार पहली बार हमारे गांव के अपने एक नजदीकी रिश्‍तेदार के घर पर आए। पर वहां उनका मन नहीं लगता था , रिश्‍तेदार अपने व्‍यवसाय में व्‍यस्‍त रहते और उनकी पत्‍नी अपने छोटे छोटे बच्‍चों में।  वे वहां किससे और कितनी देर बातें करतें , उनके यहां जाने में जानबूझकर देर करते थे और हमारे यहां बैठकर बातें करते रहते थे । बडे गप्‍पी थे वो , अक्‍सर वे हमारे घर पहुंच जाते थे और घंटे दो घंटे गपशप करने के बाद खाना खाकर ही लौटते थे।

एक दिन शाम को पहुंचे , तो इधर उधर की बात होते होते भूत प्रेत पर जाकर रूक गयी , भूत प्रेत का नाम सुनते ही उन्‍होने अपनी शौर्यगाथाएं सुनानी शुरू की। फलाने जगह में भूत के भय से जाने से लोग डरते हैं , मैं वहां रातभर रहा , फलाने जगह पर ये किया , वो किया और हम सभी उनके हिम्‍मत के आगे नतमस्‍तक थे। मेरी मम्‍मी ने एक दो बार रात्रि के समय इस तरह की बातें न करने की याद भी दिलायी , पर वो नहीं माने ‘नहीं , चाचीजी , भूत प्रेत कुछ होता ही नहीं है , वैसे ही मन का वहम् है ये’ और न जाने कहां कहां के ऐसे वैसे किस्‍से सुनाते ही रहे।

उस दिन खाते पीते कुछ अधिक ही देर हो गयी थी , रात के ग्‍यारह बज गए थे , गांव में काफी सन्‍नाटा हो जाता है। उस घर के छत से आवाज दे देकर बच्‍चे बार बार बुला रहे थे । सामने के रास्‍ते से जाने से कई मोड पड जाने से उनका घर हमारे घर से कुछ दूर पड जाता था , पर खेत से होकर एक शार्टकट रास्‍ता था । हमलोग अक्‍सर उसी रास्‍ते से जाते आते थे , उन्‍होने भी उस दिन उसी रास्‍ते से जाने का निश्‍चय किया। पीछे के दरवाजे से उन्‍हें भेजकर हमलोग दरवाजा बंद करके अंदर अपने अपने कामों में लग गए। अचानक मेरी छोटी बहन के दिमाग में क्‍या आया , छत पर जाकर देखने लगी कि वे उनके घर पहुंचे या नहीं ? अंधेरा काफी था , मेरी बहन को कुछ भी दिखाई नहीं दिया , वह छत से लौटने वाली ही थी कि उसे महसूस हुआ कि कोई दौडकर हमारे बगान में आया और सामने नीम के पेड के नीचे छुप गया।

मेरी बहन ने पूछा ‘कौन है ?‘

उनकी आवाज आयी ‘मैं हूं’

‘आप चाचाजी के यहां गए नहीं ?’

‘खेत में कुएं के पास कोई बैठा हुआ है’

गांव में रात के अंधेरे में चोरों का ही आतंक रहता है , उनकी इस बात को सुनकर हमलोगों को चोर के होने का ही अंदेशा हुआ , जल्‍दी जल्‍दी पिछवाडे का दरवाजा खोला गया। पूछने पर उन्‍होने हमारे अंदेशे को गलत बताते हुए कहा कि वह आदमी नहीं , भूत प्रेत जैसा कुछ है , क्‍यूंकि कुएं के पास उसकी दो लाल लाल आंखे चमक रही हैं। तब जाकर हमलोगों को ध्‍यान आया कि कुएं के पास खेत में पानी पटानेवाला डीजल पंप रखा है और उसमें ही दो लाल बत्तियां जलती हैं। जब उन्‍हें यह बात बताया गया तो उन्‍होने एकदम से झेंपकर कहा ‘ओह ! हम तो उससे डर खा गए’ । बेचारे कर भी क्‍या सकते थे , इस डर खाने की कहानी ने तुरंत बखानी गई उनकी निडरता की कहानियों के पोल को खोल दिया था। फिर थोडी ही देर बाद वे चले गए , और हमारे घर के माहौल की तो पूछिए मत , हमलोगों को तो बस हंसने का एक बहाना मिल गया था।




भूतों के भय से ही जुडा एक किस्‍सा और भी सुनिए !!

संभवत: यह घटना 1981 के आस पास की है। कलकत्‍ते में रहनेवाले हमारे एक दूर के रिश्‍तेदार पहली बार हमारे गांव के अपने एक नजदीकी रिश्‍तेदार के घर पर आए। पर वहां उनका मन नहीं लगता था , रिश्‍तेदार अपने व्‍यवसाय में व्‍यस्‍त रहते और उनकी पत्‍नी अपने छोटे छोटे बच्‍चों में।  वे वहां किससे और कितनी देर बातें करतें , उनके यहां जाने में जानबूझकर देर करते थे और हमारे यहां बैठकर बातें करते रहते थे । बडे गप्‍पी थे वो , अक्‍सर वे हमारे घर पहुंच जाते थे और घंटे दो घंटे गपशप करने के बाद खाना खाकर ही लौटते थे।

एक दिन शाम को पहुंचे , तो इधर उधर की बात होते होते भूत प्रेत पर जाकर रूक गयी , भूत प्रेत का नाम सुनते ही उन्‍होने अपनी शौर्यगाथाएं सुनानी शुरू की। फलाने जगह में भूत के भय से जाने से लोग डरते हैं , मैं वहां रातभर रहा , फलाने जगह पर ये किया , वो किया और हम सभी उनके हिम्‍मत के आगे नतमस्‍तक थे। मेरी मम्‍मी ने एक दो बार रात्रि के समय इस तरह की बातें न करने की याद भी दिलायी , पर वो नहीं माने ‘नहीं , चाचीजी , भूत प्रेत कुछ होता ही नहीं है , वैसे ही मन का वहम् है ये’ और न जाने कहां कहां के ऐसे वैसे किस्‍से सुनाते ही रहे।

उस दिन खाते पीते कुछ अधिक ही देर हो गयी थी , रात के ग्‍यारह बज गए थे , गांव में काफी सन्‍नाटा हो जाता है। उस घर के छत से आवाज दे देकर बच्‍चे बार बार बुला रहे थे । सामने के रास्‍ते से जाने से कई मोड पड जाने से उनका घर हमारे घर से कुछ दूर पड जाता था , पर खेत से होकर एक शार्टकट रास्‍ता था । हमलोग अक्‍सर उसी रास्‍ते से जाते आते थे , उन्‍होने भी उस दिन उसी रास्‍ते से जाने का निश्‍चय किया। पीछे के दरवाजे से उन्‍हें भेजकर हमलोग दरवाजा बंद करके अंदर अपने अपने कामों में लग गए। अचानक मेरी छोटी बहन के दिमाग में क्‍या आया , छत पर जाकर देखने लगी कि वे उनके घर पहुंचे या नहीं ? अंधेरा काफी था , मेरी बहन को कुछ भी दिखाई नहीं दिया , वह छत से लौटने वाली ही थी कि उसे महसूस हुआ कि कोई दौडकर हमारे बगान में आया और सामने नीम के पेड के नीचे छुप गया।

मेरी बहन ने पूछा ‘कौन है ?‘

उनकी आवाज आयी ‘मैं हूं’

‘आप चाचाजी के यहां गए नहीं ?’

‘खेत में कुएं के पास कोई बैठा हुआ है’

गांव में रात के अंधेरे में चोरों का ही आतंक रहता है , उनकी इस बात को सुनकर हमलोगों को चोर के होने का ही अंदेशा हुआ , जल्‍दी जल्‍दी पिछवाडे का दरवाजा खोला गया। पूछने पर उन्‍होने हमारे अंदेशे को गलत बताते हुए कहा कि वह आदमी नहीं , भूत प्रेत जैसा कुछ है , क्‍यूंकि कुएं के पास उसकी दो लाल लाल आंखे चमक रही हैं। तब जाकर हमलोगों को ध्‍यान आया कि कुएं के पास खेत में पानी पटानेवाला डीजल पंप रखा है और उसमें ही दो लाल बत्तियां जलती हैं। जब उन्‍हें यह बात बताया गया तो उन्‍होने एकदम से झेंपकर कहा ‘ओह ! हम तो उससे डर खा गए’ । बेचारे कर भी क्‍या सकते थे , इस डर खाने की कहानी ने तुरंत बखानी गई उनकी निडरता की कहानियों के पोल को खोल दिया था। फिर थोडी ही देर बाद वे चले गए , और हमारे घर के माहौल की तो पूछिए मत , हमलोगों को तो बस हंसने का एक बहाना मिल गया था।