शनिवार, 6 मार्च 2010

हमारा गांव पेटरवार आर्सेलर-मित्‍तल को भी पसंद आया !!

रांची बोकारो मुख्‍य मार्ग पर बोकारो जिले में स्थित हमारा पैतृक गांव पेटरवार सिर्फ इस क्षेत्र के लोगों का ही नहीं ,दूर दराज के बहुत सारे लोगों का भी पसंदीदा रहा है। काफी दिनों से जहां मारवाडियों को व्‍यावसायिक दृष्टि से यह क्षेत्र पसंद आया है, वहीं हमारे गांव से रिटायरमेंट लेनेवाले अनेको सरकारी अधिकारी भी शांतिपूर्वक अवकाशप्राप्‍त जीवन जीने के लिए इसे चुना करते आए हैं। यही कारण है कि गांव फैलता जा रहा है और यहां के जमीन का भाव आसमान छूता जा रहा है। अब इसमें एक नया आयाम जुडनेवाला है , पेटरवार ब्‍लॉक का कुछ क्षेत्र आर्सेलर-मित्तल कम्पनी को 12 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का इस्पात संयंत्र लगाने के लिए पसंद आ गया है , ग्रामीणों में भी उन्‍हें सहयोग करने के लिए हरी झंडी दे दी है और वह दिन दूर नहीं, जब यहां कंपनी के द्वारा प्‍लांट का निर्माण कार्य भी शुरू हो जाए। विस्‍तार में यह खबर रांची एक्‍सप्रेस के सौजन्‍य से दी जा रही है ......




झारखंड प्रदेश का बोकारो जिला वास्तव में विकास की नयी बुलंदियों को ओर अग्रसर होता दिख रहा है। इस विकासयात्रा में जल्द ही एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। आर्सेलर-मित्तल कम्पनी जिले के पेटरवार और कसमार में 12 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का इस्पात संयंत्र लगाने जा रही है। इस प्लांट के निर्माण के साथ ही पेटरवार, कसमार और आसपास के क्षेत्रों की दशा-दिशा बदल जायेगी। एक ओर जहां क्षेत्र का चतुर्दिक विकास होगा, वहीं मजदूरों के पलायन पर काफी हद तक विराम लग जायेगा। वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रदेश सरकार के साथ हुए एक समझौते के तहत आर्सेलर-मित्तल पेटरवार व कसमार में उक्त परियोजना को मूर्त रूप देने जा रही है। इसके क्रियान्वित होने से पेटरवार एवं कसमार प्रखंड के लुकैया, कोजरम, जरुवाटांड़, पोड़दाग, हसलता, ओरमो, बेमरोटांड़, बेदोटांड़, फुटलाही व आसपास बसे गांवों की तस्वीर बदल जायेगी। ग्रामीण भी विकास की इस नयी आस से काफी उत्साहित है। मालूम हो कि आर्सेलर-मित्तल कम्पनी के महाप्रबंधक पीएस प्रसाद ने हाल ही में क्षेत्र के रैयतों के साथ वार्ता की थी, जिसमें उन्होंने रैयतों की शर्तों को मानते हुए प्लांट निर्माण हेतु तत्परता दिखायी थी। इसके अलावा कम्पनी के अधिकारीगण कई बार इलाके का दौरा कर चुके हैं और रैयतों के बीच विस्थापन नीति की पुस्तिका भी वितरित की जा चुकी है। रैयतों ने भी कम्पनी द्वारा जारी प्रपत्रों पर अपनी स्वीकृति कम्पनी को दे दी है। अब अगर बिना किसी अड़ंगे के यह परियोजना धरातल पर उतरती है, तो क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी सहित तमाम सुविधाओं की पूर्ण व्यवस्था होगी और विकास की गंगा बहती दिखेगी। क्षेत्र के कुछ रैयतों ने ‘रांची एक्सप्रेस’ से बातचीत के दौरान अपनी सहमति जतायी है। पेटरवार प्रखंड के जरुवाटांड़ निवासी एजाजुल हक, अजहर हुसैन, पेटरवार के पवन महथा, कसमार के बेमरोटांड़ निवासी मुकेश कुमार प्रसाद, लुकैया के हारुण रसीद, बरई ग्राम के महानंद महतो, फुटलाही ग्राम निवासी सदानंद महतो आदि ने खुले दिल से आर्सेलर-मित्तल की उक्त पहल का स्वागत किया है। रैयतों ने प्लांट निर्माण के बहुआयामी फायदों की चर्चा करते हुए कहा कि जैसे बोकारो स्टील प्लांट से वहां बसे आसपास के गांवों में विकास हुए, वैसे ही यहां की भी रौनक बदल जायेगी। क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं का विकास तो होगा ही, बेरोजगारी और मजदूरों के पलायन पर भी अंकुश लगेगा। रैयतों का स्पष्ट कहना है कि कम्पनी उन्हें विस्थापित बनाकर सुव्यवस्थित तरीके से बसाये, नियोजन दे और अन्य शर्तों का पालन करे, तो निश्चय ही वह संयंत्रनिर्माण में हरसम्भव सहयोग करेंगे। प्लांट लगने से रैयतों को जो क्षति होगी, उसकी समुचित भरपाई जरूरी है। यकीनन रैयतों और प्रबंधन के बीच का मामला किसी दलाली हस्तक्षेप के बिना ही अगर सुलझ जाता है, तो इस क्षेत्र को विकास के मुकाम पर ले जाने से कोई नहीं रोक सकता। प्लांट निर्माण से न केवल पेटरवार, कसमार व बोकारो जिले का, बल्कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फलक पर झारखंड का नाम गौरवान्वित होगा।

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

आज आप साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित मेरी नई कहानी 'कलियुग का पागल बाबा' पढें !!

आज मेरी एक कहानी 'कलियुग का पागल बाबा' साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित की गयी है। इस कहानी में एक ज्ञानी पुरूष को वर्तमान परिस्थितियों से जूझते हुए दिखाया गया है। इसको पढकर डॉ अरविंद मिश्रा जी ने मुझे मेल किया ....

आपकी कहनी साहित्य शिल्पी पर पढी -
मेरा कमेन्ट वहां पोस्ट नहीं हो पा रहा है -
बहुत  अच्छी कहानी !संगीता जी कहानी बहुत अच्छी लिख लेती हैं -यह तो उनके  खुद के व्यक्तित्व के द्वंद्व की कहानी है ! 
पेज का दाहिना हाशिया लेखके भाग पर आ गया है -उनसे बोले!


मैं उतना ज्ञानी कहां , इसपर मेरा जबाब था ....

धन्‍यवाद .. सैकडों वर्षों से कितने लोगों के व्‍यक्तित्‍व में यह
द्वन्‍द्व रहा होगा .. दो पीढियों से मैं अपने ही घर में देख रही हूं ..
और आगे भी चलता रहेगा शायद .. मैने ये कहानी तब लिखी थी .. जब ज्‍योतिष
में मेरा पदार्पण नहीं हुआ था .. पिताजी द्वारा कई प्रकार की चर्चा किए
जाने से दिमाग में ये बात आ गयी थी .. और ये कहानी बन पडी थी। बस
प्रकाशित करने से पहले इसका अंतिम वाक्‍य लिखकर कहानी को सकारात्‍मक मोड
दिया गया है !



इस कहानी के साथ ही साहित्‍य शिल्‍पी में मेरी सात कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं .....


कलियुग का पागल बाबा 
सिक्‍के का दूसरा पहलू 
दूसरी हार
थम गया तूफान 
मिथ्‍या भ्रम
पहला विरोध
एक झूठ 

ब्‍लॉग में से विजेट्स को हटाने का जो काम शुरू किया था , वो अभी भी जारी है। इसलिए कुछ अन्‍य महत्‍वपूर्ण आलेखों के लिंक्स इसी पोस्‍ट में डालकर इस पोस्‍ट का लिंक साइडबार में लगाने की इच्‍छा है , इसी क्रम में 'मां पर प्रकाशित मेरे दोनो आलेखों को देखें ....
 
दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां  
प्रकृति इन मांओं के साथ अन्‍याय क्‍यूं कर रही हैं 


'फलित ज्‍योतिष : सच या झूठ' में प्रकाशित मेरे आलेख....




क्‍या है गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष 

आज आप साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित मेरी नई कहानी 'कलियुग का पागल बाबा' पढें !!

आज मेरी एक कहानी 'कलियुग का पागल बाबा' साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित की गयी है। इस कहानी में एक ज्ञानी पुरूष को वर्तमान परिस्थितियों से जूझते हुए दिखाया गया है। इसको पढकर डॉ अरविंद मिश्रा जी ने मुझे मेल किया ....

आपकी कहनी साहित्य शिल्पी पर पढी -
मेरा कमेन्ट वहां पोस्ट नहीं हो पा रहा है -
बहुत  अच्छी कहानी !संगीता जी कहानी बहुत अच्छी लिख लेती हैं -यह तो उनके  खुद के व्यक्तित्व के द्वंद्व की कहानी है ! 
पेज का दाहिना हाशिया लेखके भाग पर आ गया है -उनसे बोले!


मैं उतना ज्ञानी कहां , इसपर मेरा जबाब था ....

धन्‍यवाद .. सैकडों वर्षों से कितने लोगों के व्‍यक्तित्‍व में यह
द्वन्‍द्व रहा होगा .. दो पीढियों से मैं अपने ही घर में देख रही हूं ..
और आगे भी चलता रहेगा शायद .. मैने ये कहानी तब लिखी थी .. जब ज्‍योतिष
में मेरा पदार्पण नहीं हुआ था .. पिताजी द्वारा कई प्रकार की चर्चा किए
जाने से दिमाग में ये बात आ गयी थी .. और ये कहानी बन पडी थी। बस
प्रकाशित करने से पहले इसका अंतिम वाक्‍य लिखकर कहानी को सकारात्‍मक मोड
दिया गया है !



इस कहानी के साथ ही साहित्‍य शिल्‍पी में मेरी सात कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं .....


कलियुग का पागल बाबा 
सिक्‍के का दूसरा पहलू 
दूसरी हार
थम गया तूफान 
मिथ्‍या भ्रम
पहला विरोध
एक झूठ 

ब्‍लॉग में से विजेट्स को हटाने का जो काम शुरू किया था , वो अभी भी जारी है। इसलिए कुछ अन्‍य महत्‍वपूर्ण आलेखों के लिंक्स इसी पोस्‍ट में डालकर इस पोस्‍ट का लिंक साइडबार में लगाने की इच्‍छा है , इसी क्रम में 'मां पर प्रकाशित मेरे दोनो आलेखों को देखें ....
 
दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां  
प्रकृति इन मांओं के साथ अन्‍याय क्‍यूं कर रही हैं 


'फलित ज्‍योतिष : सच या झूठ' में प्रकाशित मेरे आलेख....




क्‍या है गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष 

बुधवार, 3 मार्च 2010

गत्यात्मक ज्योतिष का संक्षिप्त परिचय और इसके जनक के बारे में जानकारी


                   भारत के बहुत सारे लोगों को शायद इस बात का ज्ञान भी न हो कि विगत कुछ वर्षों में उनके अपने देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है,जिसके द्वारा वैज्ञानिक ढंग से की जानेवाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का विषय बनी हुई है। सबसे पहले दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘बाबाजी’ के 1994-1995-1996 के विभिन्न अंकों में तथा ज्योतिष धाम के कई अंकों में गत्यात्मक ज्योतिष के ज्योतिष के बुद्धिजीवी पाठकवर्ग के सम्मुख मेरे द्वारा ही रखा गया था ।

                 जनसामान्य की जिज्ञासा को देखते हुए 1997 में दिल्ली के एक प्रकाशक ‘अजय बुक सर्विस’ के द्वारा मेरी पुस्तक ‘गत्यात्मक दशा पद्धति: ग्रहों का प्रभाव’ पहले परिचय के रुप में पाठकों को पेश की गयी। इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखते हुए रॉची कॉलेज के भूतपूर्व प्राचार्य डॉ विश्वंभर नाथ पांडेयजी ने ‘गत्यात्मक दशा पद्धति’ की प्रशंसा की और असके शीघ्र ही देश-विदेश में चर्चित होने कामना करते हुए हमें जो आशीर्वचन दिया था, वह इस पुस्तक के प्रथम और द्वितीय संस्करण के प्रकाशित होते ही पूर्ण होता दिखाई पड़ा। इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि शीघ्र ही 1999 में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करवाना पड़ा। पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् हर जगह ‘गत्यात्मक ज्योतिष चर्चा का विषय बना रहा । कादम्बिनी पत्रिका के नवम्बर 1999 के अंक में श्री महेन्द्र महर्षिजी के द्वारा इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया। जैन टी वी के प्रिया गोल्ड फ्यूचर प्रोग्राम में भी इस पद्धति की चर्चा-परिचर्चा  हुई। दिल्ली के बहुत से समाचार-पत्रों में इस पद्धति पर आधारित लेख प्रकाशित होते रहें।

                    गत्यात्मक ज्योतिष के विकास की चर्चा के आरंभ में ही इसका प्रतिपादन करनेवाले वैज्ञानिक ज्योतिषी श्री विद्यासागर महथा का परिचय आवश्यक होगा ,जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही गत्यात्मक ज्योतिष के जन्म का कारण बना। महथाजी का जन्म 15 जुलाई 1939 को झारखंड के बोकारो जिले में स्थित पेटरवार ग्राम में हुआ। एक प्रतिभावान विद्यार्थी कें रुप में मशहूर महथाजी रॉची कॉलेज ,रॉची में बी एससी करते हुए अपने एस्‍ट्रॉनामी पेपर के ग्रह नक्षत्रों में इतने रम गए कि ग्रह-नक्षत्रों की चाल और उनका पृथ्वी के जड़-चेतन पर पड़नेवाले प्रभाव को जानने की उत्सुकता ही  उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गयी। उनके मन को न कोई नौकरी ही भाई और न ही कोई व्यवसाय। इन्‍होने प्रकृति की गोद में बसे अपने पैतृक गॉव में रहकर ही प्रकृति के रहस्यों को ढूंढने का फैसला किया।


                   ग्रह नक्षत्रों की ओर गई उनकी उत्सुकता ने उन्हें ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन को प्रेरित किया। गणित विषय की कुशाग्रता और साहित्य पर मजबूत पकड़ के कारण तात्कालीन ज्योतिषीय पत्रिकाओं में इनके लेखों ने धूम मचायी। 1975 में उन्हीं लेखों के आधार पर ‘ज्योतिष-मार्तण्ड’ द्वारा अखिल भारतीय ज्योतिष लेख प्रतियोगिता में इन्हें प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। उसके बाद तो ज्योतिष-वाचस्पति ,ज्योतिष-रतन,ज्योतिष-मनीषी जैसी उपाधियों से अलंकृत किए जाने का सिलसिला ही चल पड़ा।1997 में भी नाभा में आयोजित सम्मेलन में देश-विदेश के ज्योतिषियों के मध्य इन्हें स्वर्ण-पदक से अलंकृत किया गया।

                   विभिन्न ज्योतिषियों की भविष्यवाणी में एकरुपता के अभाव के कारणों को ढूंढ़ने के क्रम में इनके वैज्ञानिक मस्तिष्क को ज्योतिष की कुछ कमजोरियॉ दृष्टिगत हुईं। फलित ज्योतिष की पहली कमजोरी ग्रहों के शक्ति-आकलन की थी।ग्रहों के शक्ति निर्धारण से संबंधित सूत्रों की अधिकता भ्रमोत्पादक थी,जिसके कारण ज्योतिषियों को एक निष्कर्ष में पहुंचने में बाधा उपस्थित होती थी। हजारो कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद इन्होने ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति को ढूंढ निकाला। ग्रह-गति छः प्रकार की होती है----
अतिशीघ्री , 2.शीघ्री , 3. सामान्य , 4. मंद , 5.वक्र , 6.अतिवक्र ।

                   अपने अध्ययन में इन्होनें पाया कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय अतिशीघ्री या शीघ्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित अनायास सफलता जातक को जीवन में प्रदान करते हैं। जन्म के समय के सामान्य और मंद ग्रह अपने-अपने भावों से संबंधित स्तर जातक को देते हैं। इसके विपरीत वक्री या अतिवक्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित निराशाजनक वातावरण जातक को प्रदान करते हैं। 1981 में सूर्य और पृथ्वी से किसी ग्रह की कोणिक दूरी से उस ग्रह की गत्यात्मक शक्ति को प्रतिशत में निकाल पाने के सूत्र मिल जाने के बाद उन्होने परंपरागत ज्योतिष को एक कमजोरी से छुटकारा दिलाया।

                   फलित ज्योतिष की दूसरी कमजोरी दशाकाल-निर्धारण से संबंधित थी। दशाकाल-निर्धारण की पारंपरिक पद्धतियॉ त्रुटिपूर्ण थी। अपने अध्ययनक्रम में उन्होने पाया कि ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्था के अनुसार ही मानव-जीवन पर उसका प्रभाव 12-12 वर्षों  तक पड़ता है। जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक चंद्रमा ,12 से 24 वर्ष की उम्र तक बुध ,24 से 36 वर्ष क उम्र तक मंगल ,36 से 48 वर्ष की उम्र तक शुक्र ,48 से 60 वर्ष की उम्र तक सूर्य ,60 से 72 वर्ष की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वर्ष की उम्र तक शनि,84 से 96 वर्ष की उम्र क यूरेनस ,96 से 108 वर्ष क उम्र तक नेपच्यून तथा 108 से 120 वर्ष की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव मनुष्य पड़ता है। विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं।

                   उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ। भविष्यवाणियॉ सटीक होती चली गयी और जातक में समाहित विभिन्न संदर्भों की उर्जा और उसके प्रतिफलन काल का अंदाजा लगाना संभव दिखाई पड़ने लगा।

                   गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार जन्मकुंडली में किसी भाव में किसी ग्रह की उपस्थिति  महत्वपूर्ण नहीं होती , महत्वपूर्ण होती है उसकी गत्यात्मक शक्ति , जिसकी जानकारी के बिना भविष्यवाणी करने में संदेह बना रहता है। गोचर फल की गणना में भी ग्रहो की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति की जानकारी आवश्यक है। इस जानकारी  पश्चात् तिथियुक्त भविष्यवाणियॉ काफी आत्मविश्वास के साथ कर पाने के लिए ‘गत्यात्मक गोचर प्रणाली’ का विकास किया गया ।

                   गत्यात्मक दशा पद्धति एवं गत्यात्मक गोचर प्रणाली के विकास के साथ ही ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन गया है , जिसके आधार पर सारे प्रश्नों के उत्तर हॉ या नहीं में दिए जा सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिष की जानकारी के पश्चात्  समाज में फैली धार्मिक एवं ज्योतिषीय भ्रांतियॉ दूर की जा सकती हैं ,साथ ही लोगों को अपने ग्रहों और समय से ताल-मेल बिठाते हुए उचित निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। यही नहीं,  बुरे ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए किए जाने वाले उपचार भी बिल्‍कुल वैज्ञानिक और परंपरागत ज्‍योतिष से बिल्‍कुल भिन्‍न है। आनेवाले गत्यात्मक युग में निश्चय ही गत्यात्मक ज्योतिष ज्योतिष के महत्व को सिद्ध करने में कारगर होगा ,ऐसा मेरा विश्वास है और कामना भी। लेकिन सरकारी,अर्द्धसरकारी और गैरसरकारी संगठनों के ज्योतिष के प्रति उपेक्षित रवैये तथा उनसे प्राप्त हो सकनेवाली सहयोग की कमी के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कुछ समय लगेगा , इसमें संदेह नहीं है।




रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली के ग्रह ब्‍लॉगरों पर उल्‍टा पुल्‍टा प्रभाव छोडेंगे ... बुरा न मानो होली है !!

होली का त्‍यौहार शक संवत के नए वर्ष के शुरू होने की खुशी में मनाया जाता है, इसलिए इस दिन के ग्रह नक्षत्रों का वर्षभर प्रभाव रहना स्‍वाभाविक है। इस वर्ष ग्रह नक्षत्र बिल्‍कुल उल्‍टी पुल्‍टी स्थिति में हैं , इसलिए सभी लोगों का यह वर्ष बिल्‍‍कुल विपरीत प्रभाव डालने वाला होगा।  ब्‍लॉगरों पर यह प्रभाव सर्वाधिक रहेगा , आइए देखते हैं , किन किन ब्‍लॉगरों पर इस ग्रह नक्षत्र की स्थिति का क्‍या प्रभाव पडेगा ......








महफूज अली जी ब्‍लॉग जगत में सबके प्‍यारे नहीं रहेंगे।




















हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडे सभी लेखकों और पाठकों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं !!