गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में आए चक्रवाती तूफान की भारी तबाही को मेरी भविष्‍यवाणी के साथ नहीं जोडा जा सकता !!

29 मार्च को गर्मी को बढते हुए देख्‍ा मैने 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के मौसम के सिद्धांतों के आधार पर आनेवाले मौसम का आकलन करते हुए अपने पोस्‍ट में लिखा था कि 29 मार्च से 6 अप्रैल तक पारा उत्‍तरोत्‍तर चढेगा पर 7 अप्रैल को खास ग्रह योग के कारण बारिश के आसार दिखते हैं , जिसके कारण तापमान में गिरावट आएगी । इस खास योग का प्रभाव 12 अप्रैल तक बना रहेगा। 6 मार्च तक तो पारा उत्‍तरोत्‍तर चढा , पर उसके बाद भी बारिश नहीं हुई , 12 अप्रैल तक चिलचिलाती गर्मी में ही लोगों ने काट दिए और उसके बाद 13 अप्रैल की शाम को पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में आए चक्रवाती तूफान ने भारी तबाही मचायी और मौसम विभाग का मानना है कि इसके असर से धीरे धीरे कई प्रदेशों में बारिश होने से गर्मी कम हो सकती है। मेरे कुछ पाठकों का मानना है कि मेरी भविष्‍यवाणी सच हुई है और मेरे आकलन में मात्र एक दिन की गडबडी आयी है , क्‍यूंकि मैने 12 अप्रैल तक तो ग्रह के प्रभावी रहने की बात कही ही थी। 


पर मैं ऐसा नहीं मानती , मेरी भविष्‍यवाणियां गोचर पर यानि ग्रहों के वर्तमान चाल पर आधारित होती है और यदि सावधानी से गणना किया जाए , तो उसमें घटी और पल का भी अंतर नहीं आना चाहिए। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से गणना करने पर बहुत दूर की घटनाओं में दो चार महीनों का , कुछ दूर की घटनाओं में दो चार दिनों का , हाल फिलहाल की घटनाओं में मात्र 24 घंटों का और प्रतिदिन की घटना में 15 से 20 मिनट का अंतर ही आना चाहिए। इस हिसाब से देखा जाए तो यह घटना नजदीक की थी और इस कारण इतनी देरी मेरी भविष्‍यवाणी के खांचे में फिट नहीं हो सकता। हां चूकि इतने बडे ब्रह्मांड में पृथ्‍वी एक विंदु से अधिक नहीं , इस कारण अभी तक आक्षांस और देशांतर रेखाओं के सही निर्धारण न हो पाने से ग्रहों के प्रभाव के क्षेत्र के बारे में गडबडी आती रही है , इसे मैं स्‍वीकार करती हूं। यदि दूसरे विकसित विज्ञानों से इसका तालमेल बन जाए तो ये परेशानी काफी जल्‍दी हल की जा सकती है।


इसके अलावे मौसम से संबंधित मेरी सारी भविष्‍यवाणियां शुभ ग्रहों को लेकर की जाती है। इसलिए इसका अधिकांशत: प्रभाव शुभ ही हुआ करता है। गर्मी के दिनों में खासकर मौसम को सामान्‍य करने में इसकी बडी भूमिका होती है , हालांकि जाडे में यह थोडा कष्‍टकर तो हो ही जाता है , बरसात के दिनों में भी यत्र तत्र बाढ आने की संभावना बनी रहती है , पर चूंकि मौसम के हिसाब से लोग इसके लिए तैयार रहते हैं , इसलिए अधिक कठिनाई नहीं होती है। पर पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में मंगलवार को आए चक्रवाती तूफान ने भारी तबाही मचायी है , यह मौसम को प्रभावित करने वाला ग्रहयोग नहीं है , यह तो प्राकृतिक आपदा लानेवाले योग के कारण हुआ है , जिसकी चर्चा मैं अपनी व्‍यस्‍तता के कारण न कर सकी थी। पर मेरे शुभ ग्रहों के योग ने बारिश नहीं करवायी तो इसका मुझे कुछ शक तो हो ही गया था। मैने 13 अप्रैल की शाम की पोस्‍ट में इसका जिक्र भी किया था। जब भी बारिश के योग में बारिश नहीं हुआ करती , मैं इस बात के लिए चिंतित रहा करती हूं। इस तरह स्‍वभाव की दृष्टि से भी पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में आए चक्रवाती तूफान की घटना को मेरी भविष्‍यवाणी के खांचे में फिट नहीं किया जा सकता। 

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

इतने बडे ज्‍योतिषीय योग में भी बारिश नहीं होने का कारण मैं बढते हुए प्राकृतिक असंतुलन को मानती हूं !!

कल के पोस्‍ट में अपनी बात पाठकों को शायद मैं नहीं समझा सकी थी , इसलिए आज इसे पोस्‍ट कर रही हूं । भारतवर्ष में अधिक गर्मी के दिनों में भी समय समय पर बारिश होती है , पर तबतक तापमान में कमी नहीं आती , जबतक बारिश का कोई बडा योग उपस्थित नहीं होता है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार भारतवर्ष में गर्मी के दिनों में सामान्‍यतया दो बार ग्रहों की ऐसी खास स्थितियां बनती हैं , जो मौसम को प्रभावित करती हैं। 7 से 12 अप्रैल तक मौसम को प्रभावित करनेवाले ऐसे ही ग्रहयोग को देखते हुए ही मैने भारतवर्ष के मैदानी भागों में बडे स्‍तर पर बारिश के योग और उसके कारण तापमान में कमी आने की भविष्‍यवाणी की थी। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार यह एक सटीक योग था , जो पूरे विश्‍व के अधिकांश देशों में यत्र तत्र बारिश करवाने में जबाबदेह था , जिसके कारण जिन देशों में बरसात का मौसम हो , वहां बाढ का आना , जिन देशों में ठंड का दिन हो , वहां ठंड का बढना और जिन देशों में गर्मी का दिन हो , वहां तापमान में कमी से राहत आनी थी। अब पूरे विश्‍व में बीते सप्‍ताह क्‍या स्थिति रही , वो तो पूरे विश्‍व के ब्‍लॉगर बंधु ही बता सकते हैं , लेकिन ठीक 6 अप्रैल से 12 अप्रैल तक ब्राजील में ऐतिहासिक बाढ की चर्चा समाचार पत्रों में अवश्‍य पढने को मिली। पर मैने भारत वर्ष के लिए जो भविष्‍यवाणी की , वह सही नहीं हुई। (मैं इसे स्‍वीकार कर रही हूं , यह न कहा जाए कि ज्‍योतिषी अपनी गल्‍ती नहीं स्‍वीकारते।)

मौसम को प्रभावित करनेवाले 40 वर्षों से जांचे गए इतने बडे ग्रह योग में भी भारतवर्ष के मैदानी भागों में बारिश नहीं होने का कारण मैं बढते हुए प्राकृतिक असंतुलन को मानती हूं , पिछले वर्ष भी ऐसे ग्रहयोग में कम वर्षा होते देख मैने इस बात की चर्चा की थी। यदि आप इसे जबर्दस्‍ती की दलील मान रहे हों , तो मान सकते हैं , पर मैं ग्रह को ही सबकुछ नहीं मानती, कर्मफल भी तो लोगों को मिलना है (कर्मफल पर मेरा ग्रहों से कम विश्‍वास नहीं)। और यदि मेरी यह दलील सही है कि सचमुच ऐसा कर्मफल से ही हुआ और पर्यावरण को पहुंचे नुकसान की वजह से बारिश नहीं हो रही , तो फिर तबतक बडे स्‍तर पर बारिश नहीं होनी चाहिए , जबतक ग्रहों का वैसा ही दूसरा योग न आ जाए। जैसा कि मैने 29 मार्च के पोस्‍ट में ही लिखा था कि ग्रहों की वैसी स्थिति तो 18 मई के आसपास ही पुन: आ सकती है, क्‍यूंकि इससे पहले 29 अप्रैल तक का ग्रहयोग तो विश्‍वभर में सिर्फ उन्‍हीं स्‍थानों में बारिश कर तनाव उपस्थित करानेवाला है , जहां बरसात का मौसम चल रहा हो या फिर ठंड , कम से कम राहतवाले स्‍थान पर तो यह आनेवाला नहीं, क्‍यंकि मैने अपने आलेख में लिखा था कि 29 अप्रैल तक भारत में गर्मी अपनी चरम सीमा पर रहेगी। जाहिर है , भारत में बारिश होगी भी तो इतनी कम कि गर्मी घटे नहीं , बढ ही जाए, लोगों का कष्‍ट कमें नहीं , बढे ही।

इस तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की प्रामाणिकता में तभी संदेह किया जाना चाहिए, जब 6 अप्रैल और 18 मई के अलावे भी किसी दिन बारिश होती है या फिर जब 18 मई के आसपास के सप्‍ताह में पुन: पूरे विश्‍व में अधिकांश जगहों पर मौसम खराब होते न देखा जाए, खासकर जहां बरसात का मौसम हो , वहां बाढ आने की स्थिति तक , जहां जाडे का मौसम हो , वहां बडी मात्रा में बर्फबारी तक तथा जहां भीषण गर्मी हो , वहां सुहावना मौसम लाने तक की स्थिति बननी चाहिए। मैं जब भी मौसम या शेयर बाजार से जुडी चर्चा करती हूं , तो वो एक खास ग्रहीय आधार को लेते हुए उसे तिथि के साथ संयुक्‍त करके करती हूं , ऐसा तुक्‍का नहीं लगाया जा सकता। पर मेरी सारी बातों को गौर करने के बजाय , समझने के बजाए कोई व्‍यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त हो प्रतिक्रियावादी बनकर 'ज्‍योतिष' को तुरंत अंधविश्‍वास कह दे , तो यह गलत हैं!

आई आई टी के प्रवेश परीक्षा का उदाहरण देते हुए मैं यह स्‍पष्‍ट करना चाह रही थी कि गल्‍ती विज्ञान के क्षेत्र में भी लोगों से होती है, ज्‍योतिष जैसे विषय को तो उपेक्षित ही छोडा गया हजारो वर्षों से , सो गल्‍ती होना स्‍वाभाविक है। जहां एक ओर पर्याप्‍त सुविधाओं के अभाव में ज्‍योति‍षियों के द्वारा भविष्‍यवाणी करने में गल्‍ती हो सकती है , वहीं जिनके लिए भविष्‍यवाणियां की जाएं , उनकी कार्यशैली का भी दोष भविष्‍यवाणी को गलत बनाने के लिए जबाबदेह होता है। व्‍यक्तिगत मामलों में भी मैं भी तो ग्रहयोग देखकर ही लोगों को सलाह दिया करती हूं , बुरा कुछ भी होना हो , वह प्रकृति की ओर से भले ही हो जाए , पर अच्‍छे फल प्राप्‍त करने के लिए 'उद्यमेन ही सिद्धंति कार्य:'।  इस प्रकार ग्रह और कर्म दोनो का महत्‍व हो जाता है।

जैसा कि पिछले आलेख में मैने बताया कि तीन चार दिनों तक डॉक्‍टर की दवा खाने के बाद तबियत ठीक न होने पर एक व्‍यक्ति झाडफूंक वाले के पास इसलिए जाता है क्‍यूंकि वह डॉक्‍टर को भगवान मानता है , झाडफूंक वाले को भगवान मानता है , यदि वह उसे सामान्‍य मनुष्‍य समझे , डॉक्‍टरी को पेशा समझे , तो अवश्‍य उसकी सारी बातों को तार्किक ढंग से सुनना चाहेगा। हम इस दृष्टि से देखते हैं तो हमें मालूम है कि डॉक्‍टर एक खास प्रक्रिया के अनुसार ही इलाज कर सकता है, इसलिए उसकी कमी बेशी को स्‍वीकार करते हैं। यही बात ज्‍योतिष के मामलों में भी आजतक होती आयी है। मैने इतने दिनों के अध्‍ययन में पाया है कि हमारी प्रवृत्ति और परिस्थितियां ग्रहों के द्वारा नियंत्रित होती हैं , पर सारे रहस्‍यों की जानकारी न होने से कभी कभार गल्‍ती तो होगी ही। यदि मुझे अध्‍ययेता समझे तो आप मेरी गल्‍ती को माफ कर सकते हैं , पर ज्‍योतिष को दैवी विषय बना दें , मुझे भगवान बना दे , तो  मेरी गल्‍ती नहीं माफ कर सकेंगे।

प्राचीन काल से अबतक ज्‍योतिष पर बिना किसी नियंत्रण के इतनी पुस्‍तके आती गयी , इसमें कौन से तत्‍व सही हैं और कौन से गलत , इसका आकलन भी कर पाना कठिन हैं। सबने अपने को ज्ञानी मानते हुए पुस्‍तके लिख दी है , इतने सारे नियमों को समझ पाना , सब नियमों का एक दूसरे से तालमेल बिठा पाना बहुत कठिन हो जाता है , यहां तक कि कंप्‍यूटर भी तालमेल नहीं बिठा पाता ,भविष्‍यवाणी करने में कठिनाई तो आएगी ही। पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इसे विज्ञान बनाने की बहुत कोशिश की है , आगे भी हमारी कोशिश ऐसे ही जारी रहेगी , पर पाठकों को पूर्वाग्रह से मुक्‍त होकर इसे पढना होगा। ज्‍योतिष को विकासशील से विकसित बनने में समय तो लगेगा , इससे भला कैसे इंकार किया जा सकता है।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे .. कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव भी होंगे .. आखिर क्‍यूं ??

इधर काफी व्‍यस्‍तता चल रही है , एक खास काम में मेरा ध्‍यान संकेन्‍द्रण बना हुआ है , ऐसे में लिख पाना तो संभव नहीं ,  इसके बावजूद ब्‍लॉग जगत से दूरी नहीं बन पाती। दो चार घंटों में एक बार एग्रीगेटरों को खोलकर अपने रूचि के विषयों पर निगाह डाल ही लेती हूं, ज्‍योतिष से संबंधित पोस्‍टों का तो मेरी निगाहों से बचना मुश्किल ही होता है। हिंदी ब्‍लॉग जगत में इधर तीन चार दिनों से ज्‍योतिष पर कुछ चर्चा हो रही है। जहां मेरी भविष्‍यवाणियों के सच होने से मेरे और ज्‍योतिष के शुभचिंतक इसके पक्ष में लिखने को मजबूर हो जाते हैं , ठीक उसी प्रकार मेरी भविष्‍यवाणियों के गलत होने पर मेरे और ज्‍योतिष के विरोधी ज्‍योतिष के विपक्ष में लिखना स्‍वाभाविक है। अभी अभी यानि पिछले सप्‍ताह बारिश से संबंधित मेरा आकलन गलत सिद्ध हुआ है। मैने 29 मार्च की अपनी पोस्‍ट में लिखा था कि 6 अप्रैल तक भयंकर गर्मी पडने के बाद 7 अप्रैल को चतुर्दिक बारिश होने का योग है। 6 अप्रैल तक गर्मी बढी , पर उसके बाद के सप्‍ताह में बारिश नहीं हुई , उक्‍त महाशय का पूछना स्‍वाभाविक है कि यदि ज्‍योतिष विज्ञान है तो यह आकलन गलत क्‍यूं सिद्ध हुआ ? 


पिछले वर्ष जब जून के अंत अंत तक गर्मी से हाहाकार मचा हुआ था , तो मैने 29 जून से 4 जुलाई तक बारिश होने का आकलन किया था। जो भी मेरे पुराने पाठक होंगे और जो ज्‍योतिष के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त न होंगे , उन्‍हे बिल्‍कुल याद होगा कि 29 जून को ही अचानक बादल उमडने घुमडने लगे थे और यत्र तत्र बारिश होने लगी थी और मुझे बधाई भी मिलने लगे थे , इसे पुरानी पोस्‍टों में देखा जा सकता है। हां , एक विरोधी पाठक ने मुझे अवश्‍य टिप्‍पणी की थी कि ग्रहों की वजह से बारिश नहीं हुई है , तापमान 42 या 43 डिग्री पर पहुंचने के बाद बारिश होनी ही थी। आज उक्‍त पाठक से मैं पूछना चाहती हूं कि पारे के 44 डिग्री तक पहुंचने के बाद भी आज तक बारिश क्‍यूं नहीं हो रही है ??


उक्‍त पोस्‍ट में मैने बारिश के योग होने के बावजूद लिख दिया था कि 29 जून के बाद देश के अधिकांश हिस्‍सों में किसानों के लिए सुखदायक स्थिति बन जानी चाहिए। बारिश का क्रम बढता हुआ 3-4 जुलाई तक काफी जोरदार रूप ले लेगा । और यदि ऐसा हुआ तो फिर जुलाई के तीसरे सप्‍ताह तक लगभग निरंतर बारिश होती रहेगी। और यदि मेरी यह भविष्‍यवाणी गलत हुई , जिसकी संभावना भी कुछ हद तक है , तो इस वर्ष स्थिति के भयंकर होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए सब मिलकर ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि 29 जून से 4 जुलाई तक जोर शोर की बारिश हो।


इस बात पर एक सज्‍जन ने टिप्‍पणी की कि मैं दोनो हाथ में लड्डू रखा करती हूं । इसपर मैने अलग से एक पोस्‍ट लिखकर समझाया था कि पिछली पोस्‍ट में यह लिखा जाना कि 29 जून से 5 जुलाई के मध्‍य बारिश का महत्‍वपूर्ण योग है , बारिश होनी चाहिए , पर फिर भी यदि बारिश्‍ा नहीं हो तो स्थिति भयावह होगी ही , यह कहना वैसे ही सही है , जैसे दो दिनों तक पैरासेटामोल और एंटीबायटिक खिलाने के बाद पूरी उम्‍मीद के बावजूद भी मरीज का बुखार न उतरे तो स्थिति की भयावहता को समझते हुए डाक्‍टर कई प्रकार के टेस्‍ट लिखते है। इसका यह मतलब नहीं कि पैरासेटामोल और एंटीबायटिक का कोई असर ही नहीं है।


पर लोगों के खुश होने के बावजूद पिछले वर्ष भी योग के हिसाब से बारिश नहीं होने से मैं परेशान थी और उसके बाद के एक पोस्‍ट 'चिंता की जाए या चिंतन किया जाए' में लिखा था कि‍ जहां तक हमारा मानना है , इतने बडे रूप में ग्रहों का प्रभाव पडने के पीछे मानवीय भूलों के फलरूवरूप पृथ्‍वी के स्‍वरूप में हुआ परिवर्तन ही है । आज पानी की कमी से सारे भारतवर्ष में हाहाकार मचा हुआ है , पीने के पानी की इतनी किल्‍लत हो गयी है , तो फसलों और सब्जियों के लिए पानी कहां से आए , इनकी कमी से कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है । यदि हम जल्‍द ही अपनी भूलों को सुधारने के लिए चिंतन नहीं करें , तो आनेवाले समय में प्रकृति की ओर से हमें इससे भी बडी सजा झेलने को मजबूर होना पडेगा।


पर सांकेतिक तौर पर इतनी भविष्‍यवाणियों के सही होने के बावजूद दुराग्रह रखनेवाले विरोधियों को ज्‍योतिष पर विश्‍वास दिलाना आसान नहीं। एक बीमार व्‍यक्ति डॉक्‍टर के पास गया , दो चार दिन या सप्‍ताह भर दवाइयां खायी , ठीक न होने पर ओझा के यहां झाडफूंक के लिए चल दिया। मैंने उसे मना किया , तो उसने कहा कि आज के डॉक्‍टर सिर्फ पैसे लूटने को ही हैं , बीमारी ठीक नहीं करते। कुछ ही दिनों में उसकी बीमारी ठीक भी हो गयी, आकर उसने मुझे रिपोर्ट दी कि झाडफूंक से वह ठीक हो गया है। मैंने उसे अज्ञानी और अंधविश्‍वासी कहकर समझाने की कोशिश की, तो मेरे समझाने पर उसने कहा कि यदि वह डॉक्‍टर है , तो उसकी दवा से मैं इतने दिनों में ठीक क्‍यूं नहीं हुआ ? मैं लाख समझाती रही कि एक डॉक्‍टर किसी खास प्रक्रिया के अनुसार ही इलाज करता है। तुम्‍हें वहां ठीक होने के लिए दुबारा और तिबारा भी जाना चाहिए था , लेकिन उसके कानों में जूं भी नहीं रेंगी , क्‍यूंकि वह अज्ञानी है। 


जब इतने दिनों से इतने प्रतिभाशालियों द्वारा रिसर्च  और हर देश की सरकार के अरबों रूपए खर्च किए जानेवाले एलोपैथी किसी अज्ञानी के लिए बेकार हो सकती है , तो फिर हजारो वर्षों से उपेक्षित ज्‍योतिष को न जाननेवाला इसे बेकार क्‍यूं नहीं कह सकता ? ज्‍योतिष के प्रति दुराग्रह का कारण भी लोगों की अज्ञानता है , सारी परेशानी की जड यही है कि ज्‍योतिषी को भगवान बना दिया जाना, उसकी भूल को स्‍वीकार न किया जाना। भविष्‍यवाणी सही हुई तो तुक्‍का बना देते हैं और गलत हुई तो शोर मचा देते हैं कि ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है , उसके सिवा कुछ भी नहीं। एक ही जन्‍मकुंडली के लिए विभिन्‍न ज्‍योतिषियों द्वारा की गयी भविष्‍यवाणियों की विविधता को ज्‍योतिष की अवैज्ञानिकता की सबसे बडी वजह मानी जाती है। माना जाता है कि विज्ञान में निष्‍कर्ष एक ही होता है।


परसों यानि 11 अप्रैल को आई आई टी की प्रवेश परीक्षा हुई , मात्र 5000 सीटों के लिए न जाने कितने किशारों ने इसकी परीक्षा दी। कल प्रश्‍न पत्र का सोल्‍यूशन भी इंटरनेट में आ गया है , सभी बच्‍चों ने अपने अपने जबाबों को चेक किया, सबको अलग अलग नंबर प्राप्‍त हो रहे हैं ,गणित , रसायन और भौतिकी तो ज्‍योतिष की तरह अंधविश्‍वास नहीं , यह पूर्ण रूप से विज्ञान साबित किया जा चुका विषय हैं , सभी प्रतिभाशाली बच्‍चों ने इस परीक्षा को पास करने के लिए कोचिंग की है , सबों ने पूरी तन्‍मयता से दो वर्षों तक प्रैक्टिस भी किया है , तो हर बच्‍चों के हर प्रश्‍न के जबाब तो एक जैसे होने चाहिए थे । पर जहां कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे , वहीं कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव भी होंगे , वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कोई व्‍यक्ति मुझे समझाएं , आखिर ऐसा क्‍यूं होता है ??


हां , और अंत में  कुलवंत हैप्‍पी जी द्वारा ली गयी मेरी इंटरव्‍यू पर भी एक निगाह डालें