बुधवार, 5 मई 2010

ज्योतिष: अद्वैत का विज्ञान (ओशो) ---- आपके लिए बहुत सारे लिंक

बहुत ही विवादास्‍पद विषय है ज्‍योतिष .. कुछ इसे विज्ञान मानते हैं .. तो कुछ धर्म से जोडकर देखते हैं .. कुछ अविकसित मानते हैं .. तो कुछ पूरा अंधविश्‍वास ही .. ओशों के शब्‍दों में जानिए .. आखिर क्‍या है ज्‍योतिष ??

ज्‍योतिष के बारे में लिखे गए ओशो के आलेख में से कुछ महत्‍वपूर्ण पंक्तियां ......

ऋग्वेद मेंपंचानबे हजार वर्ष पूर्व ग्रह-नक्षत्रों की जैसी स्थिति थीउसका उल्लेख है। इसी आधार पर लोकमान्य तिलक ने यह तय किया था कि ज्योतिष नब्बे हजार वर्ष से ज्यादा पुराने तो निश्चित ही होनेचाहिए। 

जीसस से छह हजार वर्ष पहले सुमेरियंस की यह धारणा कि पृथ्वी पर जो भी बीमारी पैदा होती हैजोभी महामारी पैदा होती हैवह सब नक्षत्रों से संबंधित है। अब तो इसके लिए वैज्ञानिक आधार मिल गएहैं।

जब कोई मनुष्य जन्म लेता है तब उस जन्म के क्षण में इन नक्षत्रों के बीच जो संगीत की व्यवस्था होती है वह उस मनुष्य के प्राथमिक, सरलतम, संवेदनशील चित्त पर अंकित हो जाती है। वही उसे जीवन भर स्वस्थ और अस्वस्थ करती है।

कास्मिक केमिस्ट्री कहती है कि पूरा ब्रह्मांड एक शरीर है। उसमें कोई भी चीज अलग-अलग नहीं है, सब संयुक्त है। इसलिए कोई तारा कितनी ही दूर क्यों न हो, वह भी जब बदलता है तो हमारे हृदय की गति को बदल जाता है।

ज्योतिष कोई नया विज्ञान नहीं है जिसे विकसित होना है, बल्कि कोई विज्ञान है जो पूरी तरह विकसित हुआ था और फिर जिस सभ्यता ने उसे विकसित किया वह खो गई। और सभ्यताएं रोज आती हैं और खो जाती हैं। फिर उनके द्वारा विकसित चीजें भी अपने मौलिक आधार खो देती हैं, सूत्र भूल जाते हैं, उनकी आधारशिलाएं खो जाती हैं।

हम जानते हैं कि चांद से समुद्र प्रभावित होता है। लेकिन हमें खयाल नहीं है कि समुद्र में पानी और नमक का जो अनुपात है वही आदमी के शरीर में पानी और नमक का अनुपात है--दि सेम प्रपोर्शन। और आदमी के शरीर में पैंसठ प्रतिशत पानी है; और नमक और पानी का वही अनुपात है जो अरब की खाड़ी में है। अगर समुद्र का पानी प्रभावित होता है चांद से तो आदमी के शरीर के भीतर का पानी क्यों प्रभावित नहीं होगा?

अमावस के दिन दुनिया में सबसे कम लोग पागल होते हैं, पूर्णिमा के दिन सर्वाधिक। चांद के बढ़ने के साथ अनुपात पागलों का बढ़ना शुरू होता है। पूर्णिमा के दिन पागलखानों में सर्वाधिक लोग प्रवेश करते हैं और अमावस के दिन पागलखानों से सर्वाधिक लोग बाहर जाते हैं। अब तो इसके स्टेटिसटिक्स उपलब्ध हैं।

पक्षी एक-डेढ़ महीने, दो महीने पहले पता करते हैं कि अब बर्फ कब गिरेगी। और हजारों प्रयोग करके देख लिया गया है कि जिस दिन पक्षी उड़ते हैं, हर पक्षी की जाति का निश्चित दिन है। हर वर्ष बदल जाता है वह निश्चित दिन, क्योंकि बर्फ का कोई ठिकाना नहीं है। लेकिन हर पक्षी का तय है कि वह बर्फ गिरने के एक महीने पहले उड़ेगा, तो हर वर्ष वह एक महीने पहले उड़ता है।

जापान में एक चिड़िया होती है जो भूकंप आने के चौबीस घंटे पहले गांव खाली कर देती है। साधारण गांव की चिड़िया है। उस गांव के लोग समझ जाते हैं कि भाग जाओ। चौबीस घंटे का वक्त है, वह चिड़िया हट 
गई है, गांव में दिखाई नहीं पड़ती। इस चिड़िया को कैसे पता चलता होगा?










मनुष्य अकेला प्राणी है जगत में जिसके पास बहुत सी चीजें हैं जो उसने बुद्धिमानी में खो दी हैं; और बहुत सी चीजें जो उसके पास नहीं थीं उसने बुद्धिमानी में उनको पैदा करके खतरा मोल ले लिया है। जो है उसे खो दिया है, जो नहीं है उसे बना लिया है।


असल में वही चीज अंधविश्वास मालूम पड़ने लगती है जिसके पीछे हम वैज्ञानिक कारण बताने में असमर्थ हो जाएं। वैसे ज्योतिष बहुत वैज्ञानिक है। ज्योतिष कहता यही है कि इस जगत में जो भी घटित होता है उसके कारण हैं। हमें ज्ञात न हों, यह हो सकता है।  आज तक आप जो हैं वह बीते हुए कल का जोड़ है। ज्योतिष बहुत वैज्ञानिक चिंतन है।

भविष्य एकदम अनिश्चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्चित है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्य में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे हैं। भविष्य का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते हैं कि निश्चित नहीं है। लेकिन भविष्य में दिखाई पड़ने लगे...और ज्योतिष भविष्य में देखने की प्रक्रिया है!










विज्ञान बहुत धीमी गति से चलता है। जब तक तथ्य पूरी तरह सिद्ध न हो जाएं तब तक इंच भी आगे सरकना उचित नहीं है। प्रोफेट्स, पैगंबर तो छलांगें भर लेते हैं। वे हजारों-लाखों साल बाद जो तय होगी, उसको कह देते हैं। विज्ञान तो एक-एक इंच सरकता है।

स्विस पैरासेलीसस नाम का एक चिकित्सकउसने एक बहुत अनूठी मान्यता स्थापित की। और वह मान्यता आज नहीं कल सारे मेडिकल साइंस को बदलने वाली सिद्ध होगी। अब तक उस मान्यता पर बहुत जोर नहीं दिया जा सकाक्योंकि ज्योतिष तिरस्कृत विषय है--सर्वाधिक पुरानालेकिनसर्वाधिक तिरस्कृतयद्यपि सर्वाधिक मान्य भी।

ज्‍योतिष पर ओशो के पूरे आलेख को आप यहां देख सकते हैं ..... 


पूरे महीने मैं बोकारो से बाहर हूं .. इस कारण एक महीने ब्‍लॉगिंग से दूर रह सकती हूं .. इतने दिनों मैं दिल्‍ली में रहूंगी .. 20 मई तक कुछ व्‍यस्‍त और 20 से 29 तक बिल्‍कुल फ्री .. तबतक के लिए ज्‍योतिष पर ओशो के विचार को जानने के लिए इतने लिंक दे दिया  .. मेरे भी कुछ महत्‍वपूर्ण पोस्‍टों के लिंक निम्‍न है .. कुल मिलाकर इन एक महीने में आप गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष को अच्‍छी तरह समझ सकते हैं .... 








टोर्च , घड़ी , कैलेंडर की तरह ही उपयोगी है गत्‍यात्‍मक ज्योतिष

उम्‍मीद है .. इन लिंको को पढते हुए पूरे महीने ज्‍योतिष से आपका संबंध बना रहेगा .. वैसे यदि मौका मिला तो मैं एक दो पोस्‍ट अवश्‍य करूंगी !!


इसके अलावा साहित्‍य शिल्‍पी में मेरी ग्‍यारह कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं .....

इसी क्रम में 'मां पर प्रकाशित मेरे दोनो आलेखों को देखें ....


'फलित ज्‍योतिष : सच या झूठ' में प्रकाशित मेरे आलेख....





हिंदी ब्‍लॉगिंग और गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के बारे में मेरे विचार .......


ब्‍लोगोत्‍सव में पढें मेरे विचार

हैप्‍पी अभिनंदन में देखें मेरे विचार 

मिसफिट में सुनें मेरे विचार 


मंगलवार, 4 मई 2010

क्‍या उनकी उमर थी हमें छोडकर जाने की .. पर अच्‍छे लोग तो यूं ही चले जाया करते हैं !!

दोपहर से कांप रहा है बदन .. न कुछ खाने की इच्‍छा है .. और न ही कुछ कर पाने की हिम्‍मत .. मन हल्‍का करने के लिए कभी भाई बहनों को फोन करती हूं .. और कभी दोस्‍तो को ..  फिर भी मन हल्‍का होने का नाम ही नहीं ले रहा .. इंटरनेट भी खोला  तो शब्‍द ही पढे नहीं जा रहे .. कीबोर्ड के शब्‍द भी उल्‍टे पुल्‍टे टाइप हो जा रहे हैं .. मन में तनाव हो तो इसे कई उपायों से दूर भी किया जा सकता है  .. पर मन पागल ही हो जाए तो कैसे ठीक किया जा सकता है ??

खबर ही तो पागल करने वाली सुन चुकी हूं .. कल रात 11 बजे रांची से बोकारो आते हुए इसी मुख्‍य सडक पर ही .. एक कार और ट्रक की भिडंत में मेरे पिताजी के काफी करीबी मित्र की बडी बहू और छोटा बेटा .. यानि घर के दो दो युवा एक साथ काल के गाल में समा गए .. लगभग 27 वर्ष की उम्र के छोटे बेटे का विवाह जून में होनेवाला था .. और मात्र 30 वर्ष की उम्र पार कर चुकी बहू के दो छोटे छोटे बच्‍चे थे ..  बच्‍चों का चेहरा बार बार मेरी आंखों के सामने आ रहा हैं .. और वे मुझसे अपना कसूर पूछ रहे हैं .. क्‍या जबाब दूं उन्‍हें ??

बोकारो में विकास हो रहा है .. कई प्‍लांट लग रहे हैं .. उसके लिए बडे बडे ट्रकों से सामान ढोए जा रहे हैं .. सुबह से रात्रि के 9 बजे तक ये ट्रक प्रतिबंधित किए गए हैं .. पर इसके बाद उन्‍हें सडक पर चलाने की छूट मिली हुई है .. इन ट्रकों की गति इतनी तेज है कि दूर से ही देखकर भय होता है .. इसी के कारण आज एक परिवार का जीवन ही समाप्‍त हो गया लगता है .. चाचाजी ,चाचीजी , उनके बडे पुत्र और उनके बच्‍चों को कहीं का नहीं छोडा इस ट्रक ने .. कैसे जी पाएंगे वे अपनी बची जिंदगी  ??

अब ईश्‍वर से प्रार्थना करने को बचा ही क्‍या है .. बस इस असीम दुख को सहने की उन्‍हें शक्ति दो .. अच्‍छे लोग तो यूं ही चले जाया करते हैं .. हमें यू ही दुख में छोडकर .. ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति दें .. बस यही प्रार्थना करती हूं .. क्‍या उनकी उमर थी हमें छोडकर जाने की  .. किस मुंह से श्रद्धांजलि दूं उनको ??

सोमवार, 3 मई 2010

एक बार बेईमानी करने से जीवनभर का लाभ समाप्‍त हो जाता है !!

कुछ जरूरी चीजों को लेने के लिए आज मैं बाजार निकली , मेरे पर्स में बिल्‍कुल पैसे नहीं थे , सो एटी एम की ओर बढी। काफी भीड की वजह से लगी लंबी लाइन में लगकर मैने ए टी एम से 5,000 रूपए निकाले , जिसमें एक एक हजार के चार नोट , 500 के एक नोट और सौ सौ के पांच नोट थे। एक दुकान में मैने दो सौ का सामान लिया , वहां 500 रूपए दिए , जिसमें से दुकानदार ने 300 रूपए लौटाए। एक और दुकान में मैने तीन सौ रूपए दिए। फिर एक दुकान में चार सौ का सामान लिया , मैने उसकी ओर हजार के नोट बढाए , उसने मुझे 100 रूपए लौटाए , काफी हडबडी में होने की वजह से उसे लेकर मैं सीधा आगे बढ गयी। मुझे लगा कि यहां भी मैने 500 के ही नोट दिए हैं। पर तीसरे दुकान में सामान लेने के वक्‍त मुझे याद आया कि मेरे पास तो 500 के एक ही नोट थे , फिर चेक किया तो पाया कि 1000 के नोटों में से एक कम है। मैं भागी हुई दुकान की ओर गयी , पर तबतक दुकान बंद करने का समय हो गया था। बाजार के बाकी काम निबटाकर मैं घर चली आयी , सारे सामानों के मूल्‍य को जोडा तो हिसाब में पूरे 500 रूपए कम थे ।

मैं शाम को फिर से बाजार गयी , वह दुकान खुली हुई थी। मैने जाकर दुकानदार को पूरी बात बतायी , पर वह मानने को तैयार ही नहीं हुआ कि मैने उसे 1,000 रूपए का नोट दिया है। मेरे पास बचे 1,000 रूपए के बाकी नोट एक ही सीरिज के थे , उन्‍हें दिखाकर मैने कहा कि वह चेक कर ले कि उसके बिक्री के पैसे में इस सीरिज के नोट हैं या नहीं ? पर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। याद उसे दिलाया जाता है , जो सच में कुछ भूल रहा हो। जो जानबूझकर भूलने का नाटक कर रहा हो , उसे तो कुछ कहा भी नहीं जा सकता। वह अंततक कहता रहा कि मैने उसे हजार के नोट न देकर 500 के नोट दिए हैं। पर मैं इस बात को नहीं मान सकी , क्‍यूंकि मेरे पास पांच सौ के दो नोट थे ही नहीं। पर यहां गल्‍ती मेरी ही थी , इसलिए मेरे अधिक कह पाने का कुछ सवाल ही नहीं था। मैं लौट आयी , रास्‍ते भर यही सोंचती रही कि 500 रूपए की बेईमानी कर वह मेरा भाग्‍य ता नहीं छीन सकता , पर उसने मेरे द्वारा होनेवाली अपने पूरे जीवन की कमाई का नुकसान अवश्‍य कर लिया है । क्‍या अब मैं उसकी दुकान पर जीवनभर जा सकूंगी ??

बैशाखनंदन सम्‍मान प्रतियोगिता में मेरा आलेख : ग्‍लोबल वार्मिंग से लाभ ही लाभ

आज सभी पत्र पत्रिकाओं में .. चर्चा परिचर्चाओं में ग्‍लोबल वार्मिंग का ही शोर है .. बताते हैं पृथ्‍वी गर्म होती जा रही है .. हानि ही हानि है इससे .. चिंता का विषय बना हुआ है ये मुद्दा आजकल .. वैज्ञानिकों के द्वारा वातावरण की वार्मिंग को कम किए जाने के लिए .. धरती को बचाने के लिए निरंतर बैठकें की जा रही हैं .. चिंतन किया जा रहा है .. मुझे बडा अजीब सा लग रहा है .. आखिर क्‍या हानि है .. इधर के वर्षों में सुबह से दिनभर के रूटीन को देखूं तो .. ग्‍लोबल वार्मिंग से मुझे तो सिर्फ बचत ही बचत .. लाभ ही लाभ नजर आ रहा है।

ग्‍लोबल वार्मिंग के फलस्‍वरूप ठंड सिकुडकर मात्र 20 या 25 दिनों का रह गया है .. किसी तरह काटा जा सकता है .. नहाने के लिए पानी गरम करने मेंहोनेवाली ईंधन की बचत .. रूम हीटर या ब्‍लॉवर की कोई आवश्‍यकता नहीं .. और न ही शरीर को गर्म बनाए रखने के लिए गर्म खानों पर माथापच्‍ची करने की आवश्‍यकता .. मेहनत भी कम .. जाडे के महीने में भी हर जगह बचत ही बचत .. इस समय कहीं आने जाने का झंझट छोड दो .. घर में पुराने कपडों में दुबककर पडे रहो .. ऊनी कपडे बनवाने , खरीदने की बचत .. रजाई , कंबल आदि बनवाने , खरीदने का झंझट कम .. इसमें लगनेवाले समय और पैसों की बचत ।

इसके विपरीत गर्मी के दिन फैलकर छह महीने के हो गए हैं .. इन छह महीनों में तो बचत तो तिगुनी , चौगुनी तक हो जाती है .. तापमान बढते हुए आज 48 डिग्री तक पहुंच चुका है .. ईंधन की कितनी कम जरूरत पडती है .. सबकुछ गरमागरम .. 45 डिग्री तक स्‍वयं गरम हुए पानी को .. दुध को गैस पर चढाया .. तुरंत उबल गए .. गरम पानी के कारण धोए गए चावल , दाल , सब्जियों तक का तापमान स्‍वयं ही 45 डिग्री तक .. इससे गैस की सबसे अधिक बचत होती है.. सुबह के बजाय दोपहर में खाना बनाया जाए .. तो थोडी मुश्किल तो अवश्‍य हो .. पर कम से कम एक सिलिंडर पंद्रह दिन और चल जाए।

जब ग्‍लोबल वार्मिंग न था तो पहले की गृहिणियों की परेशानी कितनी थी .. कपडे धोए तो सुखाने के लिए छत या आंगन में जाओं .. आज धोकर घर पे ही कहीं टांग दिए जाएं .. दो चार घंटों में कपडों को सुखना ही है .. फर्श पर पानी गिर जाए पोछने की कोई आवश्‍यकता नहीं.. यहां तक कि बिस्‍तर पर भी पानी गिर गया .. बाहर सूखने देने की कोई आवश्‍यकता नहीं .. तेज धूप की आंच वहां भी आ रही है .. बिस्‍तर को कुछ ही देर में सूख ही जाना है .. डब्‍बे में पडे सामानों के भी खराब होने का कोई झंझट नहीं .. किसी भी डब्‍बे का सामान इस भीषण गर्मी से नहीं बच सकता  .. पुरानी गृहिणियों की तुलना में हमारे सुखी होने का राज का कारण तो ग्‍लोबल वार्मिग ही है।

गर्मी बढ गयी है तो बिजली की उपभोग तो बढेगा ही .. अब बारंबार बिजली की कटौती .. भले ही झेलना कठिन हो .. पर बिल की बचत तो हो ही जाती है.. अत्‍यधिक गर्मी के कारण पानी की भी कमी हो गयी है .. भला मनमानी सप्‍लाई हो भी तो कैसे .. सुबह सुबह आ जाने वाला पानी अब कम से कम दो घंटे देर से
ही आएगा.. सबलोग ब्रश करने के इंतजार में बैठे रह जाते हैं .. अब ब्रश ही नहीं हुई .. तो चाय , नाश्‍ते सबमें कटौती होनी ही है .. सुबह सुबह कई कप चाय की ही बचत हो जाती है .. और अधिक देर से पानी आए .. तो नाश्‍ते की भी .. इस पानी के कारण स्‍नान में ही 12 बज जाए .. तो लोग एक ही बार खाना ही तो खाएंगे .. गर्मी अधिक रहे तो एक बार खा भी लिया .. तो इतनी गर्मी में पाचन संस्‍थान भी सही काम कहां कर पाएगा.. न खाना पचेगा और न भूख लगेगी .. रात्रि में भी नाम मात्र का खाना ..खाद्यान्‍न की बचत तो होनी ही है ..  इससे कितने भूखों को खाना मिल जाए ।

ग्‍लोबल वार्मिंग का ही असर है .. कि बाजार में सब्जियों की कमी हो जाती है .. भले ही बाजार जानेवाले मुंह लटाकाकर खाली झोला लिए वापस आते हों .. पर पॉकेट के पैसे अवश्‍य सुरक्षित बने रहते हैं .. घर में मौजूद दूध , दही , बेसन , दलहन और चने मटर आदि का उपयोग कर भी तो घर चलाया जा सकता है .. गृहिणी को भी आराम ही आराम .. हरी साग सब्जियां बीनने , छीलने, काटने में लगने वाले समय की पूरी बचत .. ऐसे में गृहिणियों के समय की जो बचत होगी .. उसमें वह अपनी रूचि का कोई काम कर सकती हैं .. इसी कारण तो महिला ब्‍लॉगर प्रतिदिन अपना ब्‍लॉग भी अपडेट कर लेती हैं ..  पर इतने तरह की बचत और लाभ के बावजूद भी वैज्ञानिक ग्‍लोबल वार्मिंग पर चिंतित होकर सेमिनार किए जा रहे हैं .. कहीं ग्‍लोबल वार्मिंग से पृथ्‍वी को  छुटकारा मिल जाए ..  तो महिलाओं की समस्‍याएं कितनी बढ जाएंगी ..।


(यह आलेख ताऊ डॉट कॉम पर प्रकाशित किया जा चुका है )

रविवार, 2 मई 2010

अब गर्मी से राहत की उम्‍मीद है !!

एक महीने पूर्व मौसम के बारे में लिखे गए मेरे आलेख के अनुसार भले ही 6 और 7 अप्रैल को बारिश के नहीं होने से वो सप्‍ताह मौसम के हिसाब से ठंडा नहीं हो सका था , पर उस आलेख में मैने लिखा था कि 29 अप्रैल तक गर्मी अपनी चरम सीमा पर होगी , पर उसके बाद क्रमश: सुधार आएगा। ग्रहों के प्रतिकूल होने से आराम प्रदान करने के लिए 29 अप्रैल तक बारिश न होने की संभावना भी मैने जतायी थी , जैसा देखने को अवश्‍य मिला , एक दो जगहों पर थोडी बहुत बारिश गर्मी को घटाने में नाकामयाब ही रही।




वैसे तो बारिश का बडा योग अब 18 मई के आसपास ही आएगा , पर 29 अप्रैल तक सचमुच बहुत खराब रहे मौसम को सुधारने के क्रम में चतुर्दिक बादल के बनने से तथा यत्र तत्र बारिश के छींटे पडने से दो तीन दिनों में काफी राहत आयी है , ग्रहों के मौसम पर पडने वाले प्रभाव की पुष्टि तो हो जाती है। सारे अखबार इस बात की गवाही दे रहे हैं कि दो तीन दिनो के अंदर तापमान में अच्‍छी खासी गिरावट आयी है। मुझे नहीं लगता कि आनेवाले मई और जून भी मार्च और अप्रैल की तरह गरम रहेगी , क्‍यूंकि बाद की तिथियों में समय समय पर बारिश के योग दिखते हैं। वैसे इस बात की चर्चा मैने उस आलेख में कर ही चुकी हूं , अब गर्मी के अधिक बढने की उम्‍मीद नहीं ।