शुक्रवार, 18 जून 2010

जन जन तक ज्‍योतिष के ज्ञान को पहुंचाने का प्रयास - 6

पिछले आलेख में चर्चा हुई थी कि किसी भी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर बालक के जन्‍म के पहर की जानकारी कैसे प्राप्‍त की जा सकती है। इसपर एक टिप्‍पणी मिली है कि इस विधि से हम सिर्फ लग्‍न कुंडली से ही जन्‍म के समय की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं , चंद्रकुंडली और सूर्य कुंडली के आधार पर समय की जानकारी नहीं प्राप्‍त कर सकते, बिल्‍कुल सही टिप्‍पणी है। दरअसल ज्‍योतिष में जब भी सिर्फ कुंडली की चर्चा की जाती है , तो वह जन्‍मकुंडली यानि लग्‍न कुंडली ही होती है। भविष्‍यवाणियों में सटीकता लाने के लिए चंद्रकुंडली , सर्यूकुंडली या अन्‍य अनेक प्रकार की कुंडली बनाए जाने की परंपरा शुरू हुई है। लेकिन गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की माने तो आज भी लग्‍नकुंडली ही किसी व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व का दर्पण है , जो उसके पूरे जीवन के विभिन्‍न संदर्भो के सुख दुख और जीवन भर की परिस्थितियों के उतार और चढाव की जानकारी दे सकता है, जिसपर चर्चा करने में अभी कुछ समय तो अवश्‍य लगेगा। भविष्‍यवाणी करने के लिए चंद्र कुंडली , सूर्यकुंडली या सूक्ष्‍मतर रूप से बनाए जाने वाले अन्‍य कुंडलियों का भी आंशिक प्रभाव माना ही जा सकता है।
वैसे चाहे लग्‍नकुंडली हो, चंद्र कुंडली हो, सूर्य कुंडली हो या अन्‍य कोई भी कुंडली , बालक के जन्‍म के समय आसमान में ग्रहों की जो स्थिति होती है , उसी को दर्शाया जाता है , सिफर् अलग अलग खाने को महत्‍व देने से ये कुंडलियां परिवर्तित हो जाती हैं। जिस खाने को महत्‍व दिया जाए , उसे सबसे ऊपर यानि मस्‍तक पर रख दिया जाता है। जब हम लग्‍न को महत्‍व देते हैं , लग्‍नवाले खाने को ऊपर रखते हैं , इससे लग्‍नकुंडली बन जाती है। जब हम चंद्र को महत्‍व देते हैं , चंद्र वाले खाने को ऊपर रखते हैं , चंद्रकुंडली बन जाती है। जब हम सूर्य को महत्‍व देते हैं , सूर्य वाले खाने को ऊपर रखते हैं , सूर्यकुंडली बन जाती है। इसी प्रकार अन्‍य ग्रहों को भी महत्‍व देते हुए आप अन्‍य प्रकार की कुंडली बना सकते हैं , पर उसमें अन्‍य ग्रहों की स्थिति में हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। नीचे एक जातक की तीनो कुंडलियां देखिए , प्रत्‍येक कुंडली में ग्रहों की स्थिति समान जगह पर है , सिर्फ उन्‍हें अपने तरीके से घुमा दिया गया है। ये है लग्‍नकुंडली ....

                                   
ये है चंद्रकुंडली ........

और ये है सूर्यकुंडली ....

                                      
जैसा कि पहले भी लिखा जा चुका है , सूर्य कुंडली या चंद्र कुंडली तो ढाई दिनों तक पूरे 24 घंटों तक जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के लिए एक ही बनेगी , सिर्फ लग्‍न कुंडली ही मात्र दो घंटे तक यानि पूर्वी क्षितिज में एक लग्‍न के उदय होने तक एक सी रहती है , इसलिए यही बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज की जानकारी दे पाती है , यही कारण है कि इसी कुंडली से बालक के जन्‍म के समय को जाना जा सकता है। 

गुरुवार, 17 जून 2010

जन जन तक ज्‍योतिष के ज्ञान को पहुंचाने का प्रयास - 5

ज्‍योतिष आम लोगों के लिए बिल्‍कुल नया विषय है और हममें से सभी लोगों के दिमाग में यह बात पहले से है कि यह बहुत ही जटिल विषय है , इसलिए ज्‍योतिष सीखा ही नहीं जा सकता। लेकिन बात ऐसी नहीं है , ज्‍योतिष के सारे नियम जटिल क्‍यूं कर होंगे , अब हमें जिस विषय का विशेषज्ञ बनना होता है , उसी में विशिष्‍टता हासिल करते हैं , पर बाकी विषयों की भी सामान्‍य जानकारी तो रखते ही हैं। ज्‍योतिष में भी सामान्‍य जानकारी रखना बहुत कठिन नहीं है , सिर्फ अपनी जिज्ञासाओं को हमारे सामने अवश्‍य रखें और इस ज्ञान को प्राप्‍त करने में आगे बढते जाएं। जैसा कि मैं पुराने लेखों में भी लिख चुकी हूं कि पृथ्‍वी की पश्चिम से पूर्व की ओर अपने अक्ष पर घूमने के कारण ही आसमान की एक चौडी पट्टी पूरब से पश्चिम की ओर जाती दिखती है और उसी पट्टी के 360 डिग्री के 12 भाग कर 12 राशियां निकाले गए हैं । इसी चौडी पट्टी में सभी ग्रह कभी थोडा उत्‍तर और कभी थोडा दक्षिण होते हुए उदित होते हैं और आगे बढते हुए अस्‍त भी हो जाते हैं। बालक के जन्‍म के समय इसी पट्टी में स्थित ग्रहों को उसी अनुसार रखते हुए उसकी जन्‍मकुंडली बनायी जाती है , जिसके बारे में मैने पुराने लेख में लिखा था।

एक सूर्य को ही लें , पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण सूर्य 24 घंटे में पृथ्‍वी का पूरा चक्‍कर लगाता दिखता है। जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखते हुए आप आकलन कर सकते हैं कि उक्‍त बच्‍चे का जन्‍म किस वक्‍त हुआ है । पिछले दिन दिए गए चार्ट में सूर्य लग्‍नराशि वाले खाने में था , जो पूरब की दिशा का द्योतक होता है। इसका अर्थ यह है कि बालक के जन्‍म के समय सूर्य पूरब दिशा में था , पूरब दिशा में सूर्य सवेरे होता है , इसलिए बालक का जन्‍म सवरे यानि सूर्योदय के आसपास हुआ है। अब कुंडली में यहां से सूर्य जैसे जैसे एक एक खाने सरकता जाएगा , जातक का जन्‍म समय में सूर्योदय से दो दो घंटे का अंतर होता जाएगा । मध्‍य आकाश वाली राशि पर सूर्य के होने का अर्थ है कि जातक का जन्‍म दोपहर के आसपास हुआ है। पुन: कुंडली में उससे आगे एक एक राशि में सूर्य के बढने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म दोपहर के दो घंटे बाद या चार घंटे बाद हुआ है। इसी प्रकार पश्चिमी क्षितिज की राशि में सूर्य के होने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म सूर्यास्‍त का है , जबकि विपरीत दिशा के आकाश की ओर सूर्य के होने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म मध्‍य रात्रि का है।

इस चित्र के माध्‍यम से अच्‍छी तरह समझाया गया है कि जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर आकलन किया जा सके कि उसका जन्‍म किस वक्‍त हुआ था।  ज्‍योतिषी भले ही पंचांगों को देखकर जन्‍मकुंडली बना लेते हो , यह सामान्‍य जानकारी उनमें से भी बहुतों को नहीं मालूम होती है। आनेवाले समय में किसी कुंडली के चक्र को देखकर ही आप बता सकते हैं कि जिसकी कुंडली है , उसका जन्‍म किस बेला में हुआ था। है न आम व्‍यक्ति के लिए बहुत रोचक जानकारी ??

बुधवार, 16 जून 2010

जन जन तक ज्‍योतिष के ज्ञान को ले जाने का प्रयास - 4

कल के आलेख से हमें जानकारी मिली कि आसमान के गोलाकार 360 डिग्री के 12 भाग कर 12 राशियां बना दी गयी है। अभी तक तो आपको इनके नाम भी याद हो गए होंगे। जन्‍मकुंडली में जिस खाने में 1 लिखा होता है , वह मेष राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है , जहां 2 लिखा होता है , वह वृष राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है , इसी प्रकार जिस खाने में 3 लिखा हो , वह मिथुन , जिस खाने में 4 लिखा हो , वह कर्क , जिस खाने में 5 लिखा हो , वो सिंह , जिस खाने में 6 लिखा हो , वो कन्‍या , जिस खाने में 7 लिखा हो , वह तुला , जिस खाने में 8 लिखा हो , वह वृश्चिक ,जहां 9 लिखा हो , वह धनु , जहां 10 लिखा हो , वह मकर , जहां 11 लिखा हो , वह कुंभ तथा जहां 12 लिखा हो , वह खाना मीन राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रह इन्‍हीं 12 राशियों में घडी के कांटो की दिश्‍श में घूमते हुए दिखाई देते हैं ।

चूंकि किसी व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली उसके जन्‍म के समय आसमान के बारहो राशियों और सभी ग्रहों की स्थिति को दिखलाती है , इसलिए उसमें बारहो राशियों और सारे ग्रहों का उल्‍लेख होगा ही। जन्‍मकुंडली में सभी ग्रहों को एक एक अक्षर में लिखा जाता है। सूर्य के लिए सू , चंद्रमा के लिए चं , बुध के लिए बु , मंगल के लिए मं , शुक्र के लिए शु , बृहस्‍पति के लिए बृ , शनि के लिए श , राहू के लिए रा और केतु के लिए के का प्रयोग किया जाता है। इसलिए जन्‍मकुंडली में बारह खाने के रूप में सभी राशियां तथा किसी न किसी राशि में संक्षिप्‍त रूप में नवों ग्रह दिखाई देंगे। जन्‍मकुंडली में  जिस राशि में सूर्य हो , वह व्‍यक्ति की सूर्य राशि तथा जिस राशि में चंद्र हो , वह व्‍यक्ति की चंद्र राशि होगी । किसी व्‍यक्ति के लग्‍नराशि को जानने के लिए कुंडली चक्र को सीधा रखकर उसके सबसे ऊपर मध्‍य खाने में लिखे अंक को देखना चाहिए।

संलग्‍न चित्र से यह स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि किसी की जन्‍मकुंडली में स्थित मध्‍य विंदू हमारी पृथ्‍वी होती है , सबसे ऊपर में मध्‍य का खाना बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज को दर्शाता है , इसलिए उसमें लिखे अंक वाली राशि ही बालक की लग्‍नराशि होती है। इसके अलावे सबसे नीचे का खाना बालक के जन्‍म के समय पश्चिमी क्षितिज को दर्शाता है । दायीं ओर का खाना जातक की ओर के मध्‍य आकाश तथा तथा बायीं ओर का खाना पृथ्‍वी के उल्‍टी ओर के मध्‍य आकाश को दर्शाता है। इसलिए जन्‍मकुंडली में सबसे ऊपर के मध्‍य वाले खाने में कोई ग्रह दिखाई दें , तो समझना चाहिए कि उस ग्रह का उदय भी बच्‍चे के जन्‍म के साथ ही हो रहा था। इसी प्रकार सबसे नीचे के खाने में कोई ग्रह हो , तो समझना चाहिए कि वह ग्रह बच्‍चे के जन्‍म के समय पश्चिमी क्षितिज पर चमकते हुए अस्‍त होने को था। इसी प्रकार अन्‍य खानों और उनमें स्थित राशियों का भी अर्थ लगाया जा सकता है।



अभी तक की ज्‍योतिषीय जानकारी के बाद पाठकों से यह अपेक्षा रखूंगी कि वो बताएं कि ऊपर दिए गए जन्‍मकुंडली के अनुसार जातक की लग्‍न राशि , सूर्य राशि या चंद्र राशि क्‍या होगी , उसके जन्‍म के समय कौन से ग्रह उदय हो रहे थे , कौन से अस्‍त हो रहे थे और कौन से ग्रह मध्‍य आकाश में चमक रहे थे।                      

मंगलवार, 15 जून 2010

खुशदीप सहगल जी का मक्‍खन .. आज मेरे ब्‍लॉग पे

मक्‍खन पहली बार शहर जा रहा था , मक्‍खनी को भय था कि वहां मक्‍खन बेवकूफ न बन जाए, क्‍यूंकि उसने सुना था कि वहां के लोग गांववालों को बहुत बेवकूफ बनाते हैं'
'शहर से लौटकर मक्‍खन ने बताया कि वो खामख्‍वाह ही उसे बेवकूफ समझ रही थी , उसने तो शहर वालों को ही बेवकूफ बना दिया है।
'वो , कैसे'
'मैं स्‍टेशन से उतरकर थोडी दूर ही गया होगा कि मुझे ऊंचे ऊंचे मकान दिखे। वहां जो सबसे ऊंची मकान थी , वो कितने मंजिले की होगी , इसका अनुमान करने में मैं असमर्थ था , सोंचा गिन ही लिया जाए।'
'मैं उसकी मंजिलें गिन ही रहा था , कि एक शहरी वहां आ पहुंचा , पूछा 'क्‍या कर रहे हो ?'
मैने बताया कि गिन रहा हूं कि यह मकान कितने मंजिले की हैं।
शहरी ने कहा, ' यहां तो मकान की मजिले गिनने पर 100 रूपए के हिसाब से बिल चुकाने पडतें हैं , तुमने अभी तक कितनी मंजिले गिनी है'
'मैने तो बीस मंजिले गिन ली हैं'
'तो तुम्‍हें दो हजार रूपए देने होंगे।'
मैने उसे दो हजार रूपए दे दिए।
'ओह , मेरे समझाने के बावजूद तुम बेवकूफ बन ही गए, हमारे दो हजार रूपए गए पानी में' मक्‍खनी चिल्‍लायी।
'तुम गलत समझ रही हो , मैं बेवकूफ नहीं बना, मैने उसे बेवकूफ बनाया , घर के दो हजार रूपए बचा लिए , मै तो उस समय तक 40 मंजिले गिन चुका था' मक्खन ने बताया।

सोमवार, 14 जून 2010

दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीतते थे .. सबकुछ लेकर भी लडकेवाले हार जाया करते थे !!

एक कथा  में कहा गया है कि पूरी धरती को जीतने वाला एक महत्‍वाकांक्षी राजा अधिक दिन तक खुश न रह सका , क्‍यूंकि वह चिंति‍त था कि आपनी बेटी की शादी कहां करे , क्‍यूंकि इस दुनिया का प्रत्‍येक व्‍यक्ति न सिर्फ अपनी बेटियों का विवाह अपने से योग्‍य लडका ढूंढकर किया करता है , वरन् अपने बेटों को खुद से बेहतर स्थिति में भी देखना चाहता है। यही कारण है कि समय के साथ बेटे बेटियों को अधिक गुणवान बनाने के लिए हर कार्य को करने और सीखने की जबाबदेही दी जाती थी , वहीं बेटियों के विवाह के लिए गुणवान लडके के लिए अधिक से अधिक खर्च करने , यहां तक कि दहेज देने की प्रथा भी चली। इस हिसाब से दहेज एक बेटी के पिता के लिए भार नही , वरन् खुशी देने वाली राशि मानी जा सकती थी। यह क्रम आज भी बदस्‍तूर जारी है।

इस सिलसिले में अपने गांव की उस समय की घटना का उल्‍लेख कर रही हूं , जब व्‍यवहारिक तौर पर मेरा ज्ञान न के बराबर था और पुस्‍तकों में पढे गए लेख या मुद्दे ही मस्तिष्‍क में भरे होते थे। तब मैं दहेज प्रथा को समाज के लिए एक कलंक के रूप में देखा करती थी। पर विवाह तय किए जाने के वक्‍त कन्‍या पक्ष को कभी परेशान नहीं देखा। अपने सब सुखों को छोडकर पाई पाई जोडकर जमा किए गए पैसों से कन्‍या के विवाह करने के बाद माता पिता को अधिकांशत: संतुष्‍ट ही देखा करती थी , जिसे मैं उनकी मजबूरी भी समझती थी। पर एक प्रसंग याद है , जब एक चालीस हजार रूपए में अपनी लडकी का विवाह तय करने के बाद मैने उसके माता पिता को बहुत ही खुश पाया। उनके खुश होने की वजह तो मुझे बाद में उनकी पापाजी से हुई बात चीत से मालूम हुई। उन्‍होने पापाजी को बताया कि जिस लडके से उन्‍होने विवाह तय किया है , उसके हिस्‍से आनेवाली जमीन का मूल्‍य चार लाख होगा। वे चालीस हजार खर्च करके चार लाख का फायदा ले रहे हैं , क्‍यूंकि समय के साथ तो सारी संपत्ति उसकी बेटी की ही होगी न। शायद इसी हिसाब के अनुसार लडके की जीवनभर की कमाई को देखते हुए आज भी दहेज की रकम तय की जाती है।

और लडके की मम्‍मी की बात सुनकर तो मैं चौंक ही गयी। जैसा कि हमारे समाज में किसी भी शुभ कार्य को करने के पहले और बाद में ईश्‍वर के साथ गुरूजन और बुजुर्गों के पैर छूने की प्रथा है , लडके की मां अपने बेटे के विवाह तय करने के बाद मेरे दादाजी और दादीजी के पैर छूने आयी। पैर छूने के क्रम में उन्‍होने बताया ... ' आज मैं लडके को हार गयी हूं।' यह सुनकर मैं तो घबडा गयी , परेशान थी कि ये हार गयी हैं तो इतनी खुश होकर लडकी की प्रशंसा क्‍यूं कर रही हैं , आधे घंटे तक मैं उनकी बात गौर से सुनती गयी कि इन्‍हे किस बात की हार मिली है , पर मेरे पल्‍ले कुछ भी न पडा। उनके जाने के बाद भी मैं अपनी भावनाओं को रोक न सकी और उनके हार की वजह पूछा , दादीजी ने जो बताया , वह और भी रोचक था , 'लडके का विवाह तय करने को इस क्षेत्र में हारना कहा जाता है' मेरे पूछने पर उन्‍होने स्‍पष्‍ट किया कि कन्‍या की सुंदरता , गुण , परिवार और साथ में दहेज की रकम मिलकर इन्‍हें हारने को मजबूर कर दिया। इस तरह दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीत और सबकुछ लेकर भी लडकेवाले हार जाया करते थे ।

रविवार, 13 जून 2010

जन जन तक ज्‍योतिष के ज्ञान को ले जाने का प्रयास - 3

आज एक बार फिर से शीर्षक में परिवर्तन करते हुए पिछली कडी को आगे बढा रही हूं। हमारा सामना अक्‍सर कुछ वैसे लोगों से होता है , जो ऐसे तो कभी ग्रहों या ज्‍योतिष पर विश्‍वास नहीं करते , पर जब कभी लंबे समय तक चलने वाली किसी विपत्ति में फंसते हैं , ज्‍योतिष पर अंधविश्‍वास ही करने लगते हैं। ऐसी हालत में उनकी परेशानियां दुगुनी तिगुणी बढने लगती है ,अपनी समस्‍याओं में त्‍वरित सुधार लाने के लिए वे उस समय हम जैसों की अच्‍छी सलाह भी नहीं मानते। ज्ञान हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन करती है , ज्‍योतिष को जानने के बाद आप स्‍वयं सही निर्णय ले सकते हैं। यही सोंचकर मै अधिक से अधिक लोगों को खेल खेल में ज्‍योतिष सीखलाने की बात सोंच रही हूं , आप सबों का सहयोग मुझे अवश्‍य सफलता देगा।


पिछले लेखमाला में हमने सीखा कि ज्‍योतिष में पृथ्‍वी के सापेक्ष पूरे भचक्र का अवलोकण किया जाता है , साथ ही सूर्य के उदाहरण से समझने में सफलता मिली कि विभिन्‍न पिंड पृथ्‍वी सापेक्ष अपनी स्थिति के अनुरूप ही पृथ्‍वी पर प्रभाव डालते हैं। पहले ही लेख में चर्चा की गयी है कि पृथ्‍वी को स्थिर मानकर पूरे आसमान के 360 डिग्री को 12 भागों में बांटने से 30 - 30 डिग्री की 12 राशियां बनती है। आमान के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक को मेष , 30 डिग्री से 60 डिग्री तक को वृष , 60 डिग्री से 90 डिग्री तक को मिथुन , 90 डिग्री से 120 डिग्री तक को कर्क , 120 डिग्री से 150 डिग्री तक को सिंह , 150 से 180 डिग्री तक को कन्‍या , 180 से 210 डिग्री तक को तुला , 210 से 240 डिग्री तक को वृश्चिक , 240 से 270 डिग्री तक को धनु , 270 डिग्री से 300 डिग्री तक को मकर , 300 से 330 डिग्री तक को कुंभ तथा 330 से 360 डिग्री तक को मीन कहा जाता है।
 
हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के 0 डिग्री एक आधार को लेकर निश्चित किया गया था , पर कुछ ज्‍योतिष विरोधी हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के अध्‍ययन के लिए किए गए इस विभाजन को भी अवास्‍तविक मानते हैं , पर मेरे अनुसार यह विभाजन ठीक उसी प्रकार किया गया है , जिस प्रकार पृथ्‍वी के अध्‍ययन के लिए हमने आक्षांस और देशांतर रेखाएं खींची हैं। जिस प्रकार भूमध्‍य रेखा से ही 0 डिग्री की गणना की जानी सटीक है तथा देशांतर रेखाओं  की शुरूआत और अंत दोनो ध्रुवों पर करना आवश्‍यक है , उसी प्रकार आसमान में किसी खास विंदू से 0 डिग्री शुरू कर चारो ओर घुमाते हुए 360 डिग्री तक पहुंचाया गया है , हालांकि यह विंदू भी ज्‍योतिष में विवादास्‍पद बना हुआ है , जिसका कोई औचित्‍य नहीं। पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण 24 घंटों में ये बारहों राशियां पूरब से उदित होती हुई पश्चिम में अस्‍त होती जाती है।
 
यूं तो ये बारहों राशियां और इनमें स्थित ग्रह हमारे लिए महत्‍वपूर्ण हैं , पर तीन राशियां सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण होती हैं। पहली, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय सूर्य होता है , वो उसकी सूर्य राशि कहलाती है। दूसरी, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय चंद्रमा होता है , वो उसकी चंद्र राशि कहलाती है। तीसरी, जिस राशि का उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता है, वह बालक की लग्‍न राशि कलाती है। एक महीने तक सूर्य एक ही राशि में होता है , इसलिए एक महीने के अंदर जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक सूर्य राशि में आ जाते हैं। ढाई दिनों तक चंद्रमा एक ही राशि में होता है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक ही चंद्र राशि में आते हैं। दो घंटे तक एक ही लग्‍न उदित होती रहती है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी बच्‍चे एक ही लग्‍न राशि में आ जाते हैं।