शनिवार, 7 अगस्त 2010

'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में स्थित 'पंच महापुरूष योग'

ज्‍योतिष शास्‍त्र की 'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में 'पंच महापुरूष योग' का वर्णन है , जिनके नाम रूचक , भद्र , हंस , मालब्‍य और शश हैं। इन पांचों में कोई एक योग होने पर भी जातक महापुरूष होता है एवं देश विदेश में कीर्ति लाभ कर पाता है। मंगल अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हों , तो रूचक योग , बुध अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में  अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो तो भद्र योग , बृहस्‍पति अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो हंस योग , शुक्र अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो मालब्‍य योग तथा शनि अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण या उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो जन्‍मकुंडली में शश योग बनता है।

'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में लिखा होता है कि रूचक योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति स्‍वयं राजा या सेना या मिलिटरी में उच्‍चाधिकारी , आर्थिक दृष्टि से पूर्ण संपन्‍न अपने देश की सभ्‍यता और संस्‍कृति के प्रति पूर्ण जागरूक उसके विकास के लिए काम करता है। भद्र योग में जन्‍म लेनेवाला मनुष्‍य सिंह के समान पराक्रमी , प्रभावोत्‍पादक , विलक्षण बुद्धि वाला होता है , यह जीवन में धीरे धीरे प्रगति करते हुए सर्वोच्‍च स्‍थान प्राप्‍त करता है। हंस योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति सुंदर व्‍यक्तित्‍व वाला मधुरभाषी होता है। यह सफल वकील या जज बनकर निष्‍पक्ष न्‍याय करता है। मालब्‍य योग वाला व्‍यक्ति मजबूत दिमाग रखनेवाला , सफल कवि , चित्रकार , कलाकार या नृत्‍यकार होते हैं और देश विदेश में ख्‍याति प्राप्‍त करते हैं। शश योग वाले व्‍यक्ति साधारण कुल में जन्‍म लेकर भी राजनीति विशारद होते हैं , वे गांव का मुखिया , नगरपालिकाध्‍यक्ष , या प्रसिद्ध नेता होते हैं। 

अब चूंकि पूरी दुनिया में कुछ खास अंतरालों में जन्‍म न लेकर हर वक्‍त बच्‍चे जन्‍म लेते ही रहते हैं  , इसलिए उनकी जन्‍मकुंडलियों में विभिन योगों का बनना सामान्‍य ढंग से होगा। यदि गणित के संभावनावाद के नियम के हिसाब से जन्‍मकुंडली में इन योगों की संभाब्‍यता पर ध्‍यान दें , तो हमें कुछ भी खास नहीं प्राप्‍त हो पाएगा, क्‍यूंकि ये पांचो ग्रह 12 में से दो राशियों में स्‍वक्षेत्री होंगे , इस कारण इनके अपने राशि में होने की संभावना  2/12 यानि 1/6 तथा उसके मूल त्रिकोण में होने की संभावना 3/12 यानि 1/4 । इसी प्रकार इनके उच्‍च राशि में होने की संभावना 1/12 तथा केन्‍द्र में स्थित होने की संभावना 4/12 यानि 1/3 होती है। इस तरह जन्‍मकुंडली में इन पांचों में से किसी भी एक योग के उपस्थित होने की संभावना (1/6*1/4)+(1/12*1/3) = (1/24+1/36)यानि 5/72 होगी। यानि 72 लोगों में से किसी एक कुंडली में इनमें से कोई योग देखा जा सकता है। पर इन पांचों में से किसी एक योग के होने की संभावना 5/72 * 5 यानि 25 /72 होगी। इसका अर्थ है कि 72 व्‍यक्तियों में से 25 व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली में इन पांचों में से कोई एक योग हो सकता है।

जब पांचों में से किसी एक योग के होने की संभावना इतनी सामान्‍य हो , वहां इस योग के फल से जातक के महापुरूष बनने की संभावना के बारे में सोचना भी गलत होगी। हालांकि पुस्‍तकों में यह भी लिखा है हक संबंधित ग्रह निर्मल , अवेध , अवक्री और 10 से 25 डिग्री के मध्‍य में होना चाहिए , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ग्रहों के मात्र स्‍वक्षेत्री होने , उच्‍च स्‍थान पर स्थित होने , केन्‍द्रगत होने या तिक्रोण में होने से इतने बडे फल प्राप्ति पर विश्‍वास नहीं रखता , जबतक कि ग्रह गत्‍यात्‍मक या स्‍थैतिक दृष्टि से काफी मजबूत न हों । इसलिए किसी प्रकार के ज्‍योतिषीय योग के अध्‍ययन से पहले यह ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की जानकारी आवश्‍यक समझता है। सिर्फ रटे रटाए विधि से की गयी भविष्‍यवाणी सटीक नहीं हो पाती , जबकि समय समय पर प्रायोगिक जांच से भविष्‍यवाणियों की सटीकता बढती है।

कुछ दिनों तक तो हमें चार सौ बीस में रहने को बाध्‍य होना पडा !!

पिछले इस और इस आलेख के माध्‍यम से क्रमश: आपको जानकारी हुई कि किन परिस्थितियों में हमने अपने बच्‍चों का बोकारो के स्‍कूल में एडमिशन कराया और हमें एक महीने तक चास में विपरीत परिस्थितियों में रहने को बाध्‍य होना पडा। घर लौटने पर गर्मी की छुट्टियों के 45 दिनों में से एक महीने हमने पूरी निश्चिंति से गुजारे , पर 31 वें दिन से पुन: तनाव ने घेरना शुरू कर दिया था , क्‍यूंकि कहीं भी बात बनती नहीं दिख रही थी। लेकिन उसके बाद काफी गंभीरता से पुन: मकान के लिए दौड धूप करने की शुरूआत की। पर देखते ही देखते 42वां दिन भी पहुंच गया और हमारी बात कहीं भी न बनी।

दो तीन दिन बाद स्‍कूल खुलने थे और इतनी जल्‍दी तो हम हार नहीं मान सकते थे , पर चास के गुजरात कॉलोनी जाने के लिए हम बिल्‍कुल तैयार न थे। ऐसी हालत में हमने मजबूरी में बी एस एल कॉलोनी में किसी मकान का जुगाड होने तक अपने बजट के बाहर कॉपरेटिव कॉलोनी में घर लेना चाहा, जहां बी एस एल की ओर से नियमित पानी और बिजली की सप्‍लाई की जाती है। पर यहां भी मकान खाली हो तब तो मिले।  घूमते घूमते सिर्फ एक जगह 'TO LET' का बोर्ड टंगा मिला , हमने उस फ्लैट की किसी खामी पर ध्‍यान न देते हुए हां कर दी। बिजली और पानी की सुविधा के बाद बाकी असुविधाएं गौण होती हैं, इसका हमें पता चल गया था। हां , 1998 में 2500 रूपए का किराया , पानी के लिए दो सौ रूपए और 4 रू प्रति यूनिट की दर से बिजली का भुगतान हमारे बजट से बाहर था और इसे लंबे समय तक चलाने के लिए कुछ अतिरिक्‍त आय की व्‍यवस्‍था करनी पडती। हमने अपने पुराने मकान मालिक को एक महीने रहने का तीन महीने का किराया सौंपा और वहां से सामान यहां ले आए।  

18 जून से हमलोगों ने उस फ्लैट में रहना और 20 जून से बच्‍चों ने स्‍कूल जाना शुरू कर दिया। दो कमरे बडे बडे थे , पर डाइनिंग रूम को सभी कमरो , रसोई और बाथरूम को जोडनेवाला गलियारा मात्र कहा जा सकता था। गंदगी हद से अधिक , खासकर किचन की खिडकियों का तो पूछे ही मत। नए किरायेदार के आने से पूर्व मकानमालिक दीवालों पर तो रंगरोगन करवाते हैं , पर खिडकियों को यूंही छोड देते हैं , जिसका फल हमें भुगतना पड रहा था। पूरे घर की साफ सफाई में हमें 10 दिन लग गए , इस बार हमलोग कुछ और सामान लेकर आए थे , घर धीरे धीरे व्‍यवस्थित होने लगा था। बाथरूम का पानी कभी कभी डाइनिंग में अवश्‍य चला जाता था , पर इसे अनदेखा करके हम चैन की सांस लेने लगे थे।

हमें बाद में मालूम हुआ कि यह फ्लैट मुझे इतनी जल्‍दी सामान्‍य परिस्थितियों में नहीं मिला था , वो इसलिए मिला था , क्‍यूंकि लोग इसमें रहना पसंद नहीं करते थे ,  इसका नंबर 420 जो था। मकानमालिक ने बाद में स्‍पष्‍ट किया कि प्‍लॉट एलॉट होने के वक्‍त भी कम प्‍वाइंट होने के बाद भी उन्‍हें यह प्‍लॉट आसानी से मिल गया था , क्‍यूंकि अधिक प्‍वाइंटवाले लोग प्‍लॉट नं 420 को लेकर अपनी छवि को खराब नहीं करना चाहते थे। भला हो उन कुछ नंबरों का , जिसे आमतौर पर लोग प्रयोग नहीं करना चाहते और वह नंबर मुसीबत में पडे लोगों की मदद कर देता है। ऐसी परिस्थिति में ही मुझे भी 420 में रहने का मौका मिल गया , पर मात्र 18 दिनों तक ही वहां रह पायी , आखिर क्‍या हुआ आगे ?? इसे जानने के लिए अगली कडी को पढना न भूलें।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

इतने निकट रहते हुए भी हमें मालूम न था .. बोकारो में मकान की इतनी किल्‍लत है !!

पिछले अंक में आपने पढा कि कितनी माथापच्‍ची के बाद हमने आखिरकार बच्‍चों का बोकारो में एडमिशन करवा ही लिया। 1998 के फरवरी के अंत में बच्‍चों के दाखिले से लेकर स्‍कूल के लिए अन्‍य आवश्‍यक सामानों की खरीदारी , जो आजकल आमतौर पर स्‍कूलों के द्वारा ही दी जाती है , सब हो गयी थी और 2 अप्रैल से क्‍लासेज शुरू होने थे , जिससे पहले हमें मार्च के अंत में बोकारो में किराये का मकान लेकर शिफ्ट कर जाना था। हमने अपने सारे परिचितों को बोकारो में एक किराए के मकान के लिए कह दिया था , पर पूरा बोकारो शहर SAIL के अंदर आता है , वहां उनके अपने कर्मचारियों के लिए क्‍वार्टर्स बने हैं , जिसमें वो रहते हैं। शहर के एक किनारे बी एस एल के द्वारा ही एकमात्र प्राइवेट कॉलोनी 'कॉपरेटिव कॉलोनी' बनायी गयी है , जिसमें बिजली और पानी की सप्‍लाई बी एस एल के द्वारा की जाती है , पर मांग की तुलना में मकान की कमी होने से ये भी सर्वसुलभ नहीं। बैंक , एल आई सी या अन्‍य छोटी बडी कंपनियों के कर्मचारी वहां रहा करते है। बडे बडे व्‍यवसायियों के रहने के लिए मार्केट कांप्‍लेक्‍स में उनके अपने मकान हैं।

यहां के छोटे व्‍यवसायी या बाहरी लोग विस्‍थापित चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को एलॉट किए गए छोटे छोटे क्‍वार्टर्स को किराये में ले लेते हैं , जरूरत हो तो उसी कैम्‍पस में एक दो कमरे बना लेते हैं , क्‍यूंकि ऐसे कर्मचारी अपने गांव में रहते हैं और उनके क्‍वार्टर्स खाली पडे होते हें। BSL के अनुसार यह गैरकानूनी तो है , पर आम जनों के लिए इसके सिवा कोई विकल्‍प नहीं। मुझे अकेले ही दोनो बच्‍चों को लेकर रहना था , इसलिए मैने वैसे ही किसी कर्मचारी की खोज आरंभ कर दी। जान पहचान के लोगों को फोन करने पर जबाब मिलता ... बोकारो में जीने खाने के लिए नौकरी मिल जाती है , विवाह करने के लिए छोकरी भी मिल जाती है , पर घर बसाने के लिए कोठरी क्‍या , झोपडी भी नहीं मिलती , सुनकर मन परेशान हो जाया करता था। देखते देखते मार्च का अंतिम सप्‍ताह आ गया , दो चार दिनों में क्‍लासेज शुरू होने थे और रहने के लिए मकान का अता पता भी नहीं था।  वास्‍तव में बोकारो के इर्द गिर्द के शहर या अन्‍य कॉलोनी में पानी की व्‍यवस्‍था मकानमालिकों को खुद करनी पडती है , जबकि बिजली के लिए वे राज्‍य सरकार पर निर्भर रहते हैं , दोनो असुविधाजनक है , किराएदार वहां रहना पसंद नहीं करते , इसलिए बोकारो के सभी सेक्‍टरों की मुख्‍य कॉलोनी पर पूरा दबाब बना होता है।

हारकर हमने बोकारो से बिल्‍कुल सटे शहर चास में डेरा लेने का निश्‍चय किया । बोकारो और चास के मध्‍य एक छोटी सी नदी बहती है और दोनो के मध्‍य दो चार सौ मीटर की एक पुल का ही फासला है। स्‍कूल की बस वहां तक आती थी , इसलिए अधिक चिंता नहीं थी , कुछ लोगों ने वहां के पीने के पानी की शिकायत कर हमें भयभीत जरूर कर दिया था। चास में डेरा मिलने में देर नहीं लगी और 1 अप्रैल को हमलोग कामचलाऊ सामान के साथ इसके गुजरात कॉलोनी के एक मकान में शिफ्ट कर गए। पता नहीं , किसने घर का नक्‍शा तैयार किया था , इस घर के एक कमरे में एक भी खिडकी नहीं थी , जबकि दूसरे में चारो ओर खिडकियां ही खिडकियां , वो भी बिना ग्रिल या रॉड की अनफिट दरवाजे वाली। कम सामान के कारण दो चार घंटे में ही घर व्‍यवस्थित हो गया , पर पहले ही दिन खाना खाने से भी पहले हुई बारिश ने न सिर्फ इस घर का पूरा पोल खोलकर रख दिया , वरन् हमें अप्रैलफूल भी बना दिया। थोडी ही देर में पूरा कमरा बारिश के पानी से भरा था और भीगने से बचाने के क्रम में सारा सामान कमरे के बीचोबीच। 'मैं इस घर में नहीं रह सकती , बरसात से पहले पहले दूसरा घर देखना होगा' मैने निश्‍चय कर लिया था , पर बाद में अन्‍य कठिनाइयों को देखते हुए महसूस हुआ कि इस कॉलोनी मे मकान बदलने से भी कोई फायदा नहीं होनेवाला।

दूसरे दिन से बच्‍चों ने स्‍कूल जाना शुरू कर दिया था , पर शाम को चार घंटे बिजली गुल , न तो होमवर्क करना संभव था और न ही खाना बनाना। कई दिन तो बच्‍चे बिना होमवर्क के भूखे सो गए , सुबह जल्‍दी उठाकर उन्‍हें होमवर्क कराने पडते। फिर मैने एक उपाय निकाला , उन्‍हे दिन में सुलाना बंद कर दिया , स्‍कूल से आने के बाद खिलाकर होमवर्क करवाती , शाम को फिर से नाश्‍ता और नींद आने के वक्‍त हॉर्लिक्‍स पिलाकर सुला देती , दूध तो तब लेना भी नहीं शुरू किया था।  पर समस्‍या एक नहीं थी , शाम बिजली के जाते ही जेनरेटरों की आवाज से जीना  मुश्किल लगने लगता। कुछ दिनों तक एक छोटा भाई मेरे साथ था ,  छोटी सी बालकनी में मुश्किल से दो कुर्सियां डालकर हम दोनो बैठे रहते , कुर्सियों के हत्‍थे पर थोडी देर बच्‍चे बैठते , फिर थककर सो जाते।10 बजे रात में लाइट आने से पहले तक हमलोग दोनो सोए बच्‍चों को पंखा झलते , लाइट आने के बाद खाना बनाते , तब खाते। अंधेरे , गर्मी और होहल्‍ले की वजह से मेरे सर मे दर्द रहने लगा था।

परेशान हो गए थे हमलोग इस रूटीन से , हमलोग समझ चुके थे कि चास में रहकर बच्‍चों को पढा पाना मुश्किल है , इसलिए प्रतिदिन बोकारो आकर अपने परिचितों के माध्‍यम से क्‍वार्टर्स के बारे में पता करते। इतने आसपास में बसे दो शहर और दोनो में इतना फर्क , हमें ऐसा महसूस होता , मानो दोनो शहरों के मध्‍य बहती नदी पर बना वह पुल स्‍वर्ग और नरक को जोडता हो। ऐसे ही तनावपूर्ण वातावरण में एक महीने व्‍यतीत हो गए और 4 मई का दिन आ गया , जहां से 45 दिनों की गर्मियों की छुट्टियां थी , हमलोग वापस अपने घर आ गए। हमें 45 दिन पुन: मकान ढूंढने के लिए मिल गए थे , जिससे काफी राहत हो गयी थी। तबतक हमने फर्नीचर भले ही यहां छोड दिए हों , पर मन ही मन तैयार थी कि यदि बोकारो मे घर नहीं मिला तो यहां दुबारा नहीं आऊंगी , क्‍यूंकि मुझे बच्‍चों को पढाने के लिए ही यहां रहना था और ऐसे वातावरण्‍ा में जब बच्‍चे पढ ही नहीं पाएंगे , तो फिर यहां रहने का क्‍या फायदा ?? बोकारो के खट्टे मीठे अनुभवों से संबंधित पोस्‍ट आगे भी चलती ही रहेगी।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

5-6-7 अगस्‍त 2010 को आसमान में एक खास ग्रहयोग

ज्‍योतिष शास्‍त्र मानता है कि ग्रहों के हिसाब से किसी के लिए कोई वर्ष , कोई दिन और कोई घंटा खुशियों भरा होता है , तो किसी के लिए वही वर्ष , वही दिन और वही घंटा तनावपूर्ण भी। पर आसमान में कभी कभी ग्रहों की खास स्थिति बनती है , जिसके कारण इस समय अधिकांश लोग किसी न किसी महत्‍वपूर्ण कार्यों में व्‍यस्‍त होते हैं। आनेवाले 6 और 7 अगस्‍त को आसमान में दिखाई पडनेवाली किसी ग्रह की खास स्थिति तो नहीं , पर कई ग्रहों की खास गत्‍यात्‍मक शक्ति के कारण एक ग्रहयोग अधिक प्रभावशाली हो सकता है। वैसे तो इसके प्रभाव से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं होता है , आज ग्‍लोबल युग में संचार माध्‍यमों की सुविधा के कारण इसकी संभावना और बढ जाती है। वैसे इस बार यह तिथि बहुत ही समन्‍वयवादी है , इस कारण कई प्रकार के निर्णय भी इन तिथियों को होंगे।

6 और 7 अगस्‍त के ग्रहों की महत्‍वपूर्ण स्थिति का प्रभाव सबसे अधिक राजनीति पर पडता है , केन्‍द्रीय स्‍तर से लेकर प्रांतीय और क्षेत्रीय स्‍तर तक अधिकांश जगहों में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनने लगती है , बहुत ही जोड तोड कर स्थिति को संभालना पडता है और कई स्‍थानों में तो इसमें कामयाबी भी नहीं मिलती है। खासकर इस स्थिति में सत्‍ताधारी पार्टी को अधिक नुकसान उठाना पडता है। वैसे इस बार सोनिया गांधी की व्‍यक्तिगत जन्‍मकुंडली में कुछ मजबूत स्थिति होने के कारण उनकी पार्टी थोडी राहत मे दिख रही है , पर अधिकांश स्‍थानों में सत्‍ताधारी पार्टियों को ही नुकसान की संभावना रहेगी।

मौसम पर भी इस स्थिति का कम प्रभाव नहीं देखा जाता है , खासकर भारतवर्ष में इस समय बारिश का मौसम होने से यह तो स्‍पष्‍ट है कि अधिकांश स्‍थानों में भारी बारिश होती रहेंगी , धूप के दर्शन भी मुश्किल होंगे। चमक और गरज भी सामान्‍य से अधिक होगी । पर इससे अधिकांश किसानों को खुशियां ही मिलेगी , ऐसा दावा नहीं किया जा सकता , क्‍यूंकि बहुत से जगहों पर बाढ के हालात भी पैदा हो सकते हैं। अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं में भी इस योग की भूमिका होती है , पूरे विश्‍व में भूकम्‍प की तीव्रता और बारंबरता भी बढ सकती है। कई देशों में तूफान और सुनामी आने में भी इस योग की भूमिका होती है, हालांकि इस बार इसकी तीव्रता कम है। इसी योग को देखते हुए मैने 29 मार्च को लिखे अपने लेख में ही लिख दिया था कि इस वर्ष यानि 2010 में मौसम की सबसे अधिक बारिश 4 अगस्‍त के आसपास से शुरू होकर 19 सितम्‍बर के आसपास तक होगी, जिसे पुन: 17 जुलाई को दुहराया था।

अपडेट .. वंदना जी की टिप्‍पणी के बाद इस लेख को थोडा विस्‍तार दिया जा रहा है , मकर और तुला राशि वालों के लिए यह योग झंझट पूर्ण रहेगा , जबकि धनु और मीन राशिवालों के लिए यह अच्‍छा । महीने के हिसाब से जनवरी फरवरी माह में जन्‍म लेनेवालों के लिए यह योग कुछ कुछ गडबड , जबकि मार्च अप्रैल में जन्‍म लेनेवालों के लिए अच्‍छा रहेगा।

बुधवार, 4 अगस्त 2010

किसी प्रकार के रिस्‍क से भय कैसा .. अपने घर लौटने के लिए तो रास्‍ता हमेशा खुला होता है !!

बेटे के एडमिशन के सिलसिले में एक सप्‍ताह से नेट से , ब्‍लॉग जगत से दूर थी , कुछ भी लिखना पढना नहीं हो पाया। दो वर्ष पहले जब बडे बेटे ने अपनी पढाई के लिए घर से बाहर कदम बढाया था , छोटे की घर में मौजूदगी के कारण बनी व्‍यस्‍तता ने इसका अहसास भी नहीं होने दिया था। पर इस बार छोटे का कॉलेज में दाखिले के बाद घर लौटना हुआ तो घर इतना खाली लग रहा है कि यहां रहने की इच्‍छा नहीं हो रही। वैसे रहने की बाध्‍यता भी इस घर में , इस शहर में नहीं है , क्‍यूंकि ये शहर तो मैने बच्‍चों की 12वीं तक की पढाई लिखाई के लिए ही चुना था , जो पूरा हो चुका। पर जहां की मिट्टी में एक बार घुलना मिलना हो जाता है , तुरंत पीछा छुडा पाना इतना आसान भी तो नहीं होता। 12 वर्षों का समय कम भी तो नहीं होता , शहर के एक एक गली से ,घर के एक एक कोने से ऐसा जुडाव हो जाता है कि उससे दूर होने का जी भी नहीं करता। किसी नई जगह जाना हो , तो एक उत्‍सुकता भी मन में होती है , पर उसी पुरानी छोटी सी जगह में लौटना , जिसे 12 वर्षों पहले छोडकर आयी थी , मन में कोई उत्‍साह नहीं पैदा करता है। वैसे तो उस छोटी सी कॉलोनी के अंदर भी सुख सुविधा की तो कोई कमी नहीं , पर जो बात इस शहर में है , वो भला कहीं और कहां ??

12 वर्ष पहले की एक एक बात हमें याद है , सभी जागरूक अभिभावकों की तरह ही हमें भी यह अ‍हसास होने लगा था कि बच्‍चों को पढाई लिखाई का अच्‍छा माहौल दिया जाए , तो उनके कैरियर को मजबूती दी जा सकती है। बच्‍चों को लकर हमारी महत्‍वाकांक्षा बढती जा रही थी और हमारी कॉलोनी के जिस स्‍कूल में बच्‍चे पढ रहे थे , उसमें पढाई लिखाई के वातावरण का ह्रास होता जा रहा था। राज्‍य सरकार के विद्यालयों को तो छोड ही दें , बिहार और झारखंड के केन्‍द्रीय विद्यालय का तो हाल भी किसी से छुपा न होगा। पढाई के ऐसे वातावरण से ऊबकर हमलोग अच्‍छे अच्‍छे अवासीय स्‍कूलों का पता करने लगें। पर उनमें दो बच्‍चों की पढाई का बजट हमारी क्षमता से अधिक था। कुछ दिनों तक दौड धूप करने के बाद हम निराश बैठे थे कि अचानक बोकारो के 'दिल्‍ली पब्लिक स्‍कूल' में हर कक्षा में एक नए सेक्‍शन के शुरूआत की घोषणा की खबर हमें मिली। हमने स्‍कूल से दो फार्म मंगवा तो लिए , पर स्‍कूल में होस्‍टल की व्‍यवस्‍था नहीं थी , बच्‍चे छोटे थे , इसलिए कोई वैकल्पिक व्‍यवस्‍था भी नहीं की जा सकती थी , यह सोंचकर हमलोग दाखिले के लिए अधिक गंभीर नहीं थे।

पर बोकारो के इस स्‍कूल की सबने इतनी प्रशंसा सुनी थी कि फॉर्म जमा करने के ठीक एक दिन पहले परिवार के अन्‍य सदस्‍यों के बातचीत के बाद निर्णय हुआ कि फार्म भर ही दिया जाए , रिजल्‍ट से ये तो पता चलेगा कि बच्‍चे कितने पानी में हैं। जहां तक एडमिशन कराने की बात है , कोई बाध्‍यता तो नहीं है , रिजल्‍ट के बाद ही कुछ सोंचा समझा जाएगा। पर दूसरे दिन दिसंबर का अंतिम दिन था , कंपकंपाती ठंड महीने में लगातार बारिश , मौसम के बारे में सब अंदाजा लगा सकते हैं, फार्म जमा करने की हमलोगों की इच्‍छा समाप्‍त हो गयी थी ,  पर अपने भांजे के बेहतर भविष्‍य के लिए वैसे मौसम में भी बस से लंबी सफर करते हुए दिनभर क्‍यू मे खडा रहकर मेरा भाई फॉर्म जमा करके आ ही गया , साथ में परीक्षा की तिथि लेकर भी। बच्‍चों को हमने एक सप्‍ताह तक परीक्षा की तैयारी करायी , परीक्षाभवन में भीड की तो पूछिए मत , बोकारो के अभिभावकों के लिए डी पी एस पहला विकल्‍प हुआ करता है । पर दोनो भाइयों ने लिखित के साथ साथ मौखिक परीक्षा और इंटरव्‍यू तक में अच्‍छा प्रदर्शन किया और क्रमश: तीसरी और पहली कक्षा में एडमिशन के लिए दोनो का चयन कर लिया गया।

दोनो में से किसी एक के चयन न होने से हमारे सामने बोकारो न जाने का अच्‍छा बहाना हो जाता , पर दोनो के चयन के बाद हमारी मुश्किल और भी बढ गयी। एडमिशन तक के दस दिनों का समय हमलोगों ने किंकर्तब्‍यविमूढता में गुजारे। ये नौकरी छोडकर बोकारो आ नहीं सकते थे , बच्‍चों को दूसरी जगह छोडा नहीं जा सकता था , एकमात्र विकल्‍प था , मैं उनको लेकर यहां रहूं , एक दो वर्ष नहीं , लगातार 12 वर्षों तक । पर बडे होने पर बच्‍चे मेरी आज्ञा की अवहेलना करें , पिता के घर में नहीं होने से पढाई न करें , बिगड जाएं तो सारी जबाब देही मेरे माथे पर ही आएगी , सोंचकर मैं परेशान थी। लेकिन एडमिशन के डेट के ठीक दो दिन पहले यहां भी निर्णय हुआ।

इनके एक मित्र के भाई बोकारो में रहते थे , डी पी एस की पढाई और व्‍यवस्‍था के बारे में उन्‍हें जानकारी थी। वो संयोग से हमारे यहां आए , जब सारी बातों की उन्‍हें जानकारी हुई , तो उन्‍होने तुरंत एडमिशन कराने को कहा। भविष्‍य के प्रति हमारी आशंका को देखते हुए उन्‍होने कहा .. 'अपने घर लौटने के लिए तो आपका रास्‍ता हमेशा खुला होता है , किसी प्रकार के रिस्‍क लेने में भय कैसा ?? दूसरी जगह जाने के लिए मौका कभी कभार ही मिलता है , वहां कोई परेशानी हो , उसी दिन वापस लौट जाइए।  हां , इसमें कुछ पैसे भले ही बर्वाद होंगे , पर इसे अनदेखा किया जाना चाहिए।' उनका इतना कहना हमें बहुत कुछ समझा गया । पुरानी व्‍यवस्‍था को बिना डगमग किए सफलता की ओर जाने का कोई चांस मिले तो वैसे रिस्‍क लेने में भला क्‍या गडबडी ?? हमलोगों ने तुरंत एडमिशन का मन बना लिया और दूसरे ही दिन बोकारो आ गए। आगे की पोस्‍टों में भी चलता ही रहेगा .. बोकारो के 12 वर्षों के सफर के खट्टे मीठे अनुभव !!