शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

जबतक ग्रहों के जड चेतन पर पडनेवाले सही स्‍वरूप का ज्ञान नहीं हो .. दुनियाभर में अंधविश्‍वास कैसे रूके ??

कल दिब्‍या जी ने एक पोस्‍ट लिखा था ... इतना मुश्किल भी नहीं आपको समझना --आप तो मेरी ही तरह भावुक हैं...न्‍यूमरोलोजी पर आधारित यह पोस्‍ट पाठको को आकर्षित करने में सक्षम रहा है , पर ऐसे पोस्‍ट परंपरावादियों और आधुनिक विचार वालों के मध्‍य वाद विवाद का केन्‍द्र बन ही जाते हैं।  पर ज्‍योतिष , तंत्र मंत्र , परंपरा , ईश्‍वर , आदि मामलों में बहस का कभी निर्णय न अब तक निकला है और न ही निकलेगा। सामान्‍य परिस्थिति में किसी झंझट को सुलझा पाना कमजोर पक्ष के बूते की बात ही नहीं , मजबूत पक्ष ही झंझट को सुलझा सकता है , इसलिए झंझट नहीं सुलझा करता ,  क्‍यूंकि इसमें मजबूत पक्ष को घाटे की गुंजाइश रहती है। आधुनिक विज्ञान आज मजबूत स्थिति में है , जबतक सामाजिक , राजनीतिक स्थिति को क्षत विक्षत और हमारी जीवनशैली को पूरी तरह प्रदूषित न कर दे , न तो परंपरागत ज्ञान को स्‍वीकारेगा और न अपनी हार  स्‍वीकार करेगा। पर परंपरागत ज्ञान का कोई आधार नहीं , ऐसा तो नहीं माना जा सकता , पर नए रिसर्च के अभाव और पुरानी पीढी के समाप्‍त होने से उसका बडा नुकसान तो हुआ है। 


19 जन्‍म तारीख होने से मेरा भी मूलांक 1 ही है, यह संयोग भी हो सकता है कि वहां लिखी बातें मेरे व्‍यक्त्वि से मिलती है, पर ज्‍योतिष में रिसर्च के बाद निष्‍कर्ष इतने सूक्ष्‍म आने लगे कि मुझे न्‍यूमरोलोजी बहुत स्‍थूल लगने लगा है। वैसे महत्‍वाकांक्षा का भी डिविजन होना चाहिए , पैसे कमाने की, राज करने की , ज्ञानार्जन करने की, दुनिया के जीवनशैली को बदलने की .. महत्‍वाकांक्षा तो हर प्रकार की हो सकती है। इसकी जानकारी भी तो आवश्‍यक है , जैसे कि मेरे बारे में जिद्दी लिखा गया, मैं ज्‍योतिष के नियमो की पूरी जांच पडताल के बाद ही एक कदम आगे बढती हूं , पर भविष्‍यवाणी करने के लिए लिए गए अपने सिद्धांतों पर अटल रहती हूं, भले ही रिजल्‍ट में एक दो जगह खामी आ जाए। अभी पृथ्‍वी के प्रक्षेपण में ही तकनीकी गडबडी आ गयी , इतने विकसित विज्ञान मे सिद्धहस्‍त पूरी टीम के द्वारा गल्‍ती हो सकती है  , तो हमारे व्‍यक्तिगत ज्ञान  को अपवाद का मौका मिलना ही चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे अन्‍य किसी भी जगह काम्‍प्रोमाइज करने में कठिनाई होती है !!


कालिदास ने कहा था ....

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि नवमित्यवद्यम् |
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ||


अर्थात न पुरानी होने से सबकुछ बुरा है .. न नया होने से सबकुछ अच्‍छा .. बुद्धिहीन दूसरों की बुद्धि से चलते हैं .. जबकि बुद्धिमान परीक्षा करते हुए।

मेरा यह मानना है कि जबतक दुनिया में दो प्रकार के लोग बने रहेंगे .. यानि एक नए को ही अच्‍छा कहता रहे और एक पुराने को ही .. दोनो बुद्धिहीन की श्रेणी में दुनिया की खुशहाली ढूंढने में असमर्थ रहेंगे .. क्‍यूंकि बुद्धिमान दोनो के मध्‍य का रास्‍ता निकालने की कोशिश करता है .. ताकि संसार का कल्‍याण किया जा सके!!



इसी पोस्‍ट में एक टिप्‍पणी में डॉ रूपेश श्रीवास्‍तव जी भी सही कह रहे हैं सत्य वही होता है जिसे हम मानते हैं जिसे मानते ही नहीं वह सत्य कैसे हो सकता है कई जटिल बीमारियों के इलाज नहीं होने के बावजजूद भी डॉक्‍टर का ज्ञान सत्‍य है .. क्‍यूंकि इसकी पढाई के लिए टैलेंट के बल पर किसी का दाखिला होता है .. सरकार द्वारा उसके पीछे लाखों करोडों खर्च होता है .. दुनिया भर के रिसर्च होते हैं .. सरकारी तनख्‍वाह के भरोसे या लोगों के विश्‍वास के भरोसे जीवनभर एक डॉक्‍टर के सामाजिक स्‍टेटस के बढते जाने की उम्‍मीद है .. पर परंपरागत विज्ञान और उनके नियमों को एक सिरे से नकार दिया गया है .. उनके विकास के लिए न तो प्रतिभा और न ही खर्च हो रहा है उस ओर .. जिसका जीवन सामान्‍य तौर पर चलता रहता है उसके लिए तो प्राकृतिक नियम एक पहेली ही हैं .. पर जिनके जीवन में गंभीर विपत्ति आती है .. वे इसा कोई कारण नहीं ढूंढ पाते .. लोग दौडेंगे ही नीम हकीम खतरे जान ज्‍योतिषियों के पास .. जबतक विज्ञान उस ज्ञान तक पहुंचेगा कि ग्रहों या अन्‍य प्राकृतिक नियमों का प्रभाव हमपर पडता है .. और जबतक ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले सही स्‍वरूप की विवेचना नहीं होगी .. तबतक दुनियाभर में अंधविश्‍वास फैलने से रोका ही नहीं जा सकता !!


गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

आप पाठकों के लिए प्रतिदिन का उपयोगी राशिफल लेकर आए हैं हम !!

जहां एक ओर ज्‍योतिष को बहुत ही सूक्ष्‍म तौर पर गणना करने वाला शास्‍त्र माना जाता है , वहीं दूसरी ओर पूरी जनसंख्‍या को 12 भागों में बांटकर उनकी राशि के आधार पर राशिफल के रूप में भविष्‍यवाणी करने का प्रचलन भी है। राशिफल के द्वारा दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटकर उनके बारे में भविष्‍यवाणी करने का प्रयास आमजनों को भले ही नहीं जंचे , पर इसके वैज्ञानिक आधार की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ज्‍योतिष के अनुसार राशि के हिसाब से दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटा जा सकता है और उनके बारे में बहुत सारी बाते कही जा सकती हैं ,  भले ही उसमें स्तर , वातावरण , परिस्थिति और उसके जन्मकालीन ग्रहों के सापेक्ष कुछ अंतर हो। जैसे किसी विशेष समय में किसी राशि  के लिए लाभ एक मजदूर को 25-50 रुपए का और एक व्यवसायी को लाखों का लाभ दे सकता है। 

मेरे हिसाब से राशिफल की शुरूआत उस वक्‍त की मानी जा सकती है , जब आम लोगों के पास उनके जन्‍म विवरण न हुआ करते हों पर अपने भविष्‍य के बारे में जानने की कुछ इच्‍छा रहती हो। पंडितो द्वारा रखे गए नाम में से उनकी राशि को समझ पाना आसान था, इसलिए ज्‍योतिषियों ने उनकी राशि के आधार पर गोचर के ग्रहों को देखते हुए भविष्‍यवाणी करने की परंपरा शुरू की हो। चूकि प्राचीन काल में अधिकांश लोगों की जन्‍मकुंडलियां नहीं हुआ करती थी , इसलिए राशिफल की लोकप्रियता निरंतर बढती गयी। गोचर के आधार पर भविष्‍यवाणियां कर पाना बहुत ही कठिन होता है , पर लोकप्रियता प्राप्‍त करने के लिए राशिफल के रूप में कुछ पंक्तियों को इकट्ठा करने का प्रचलन चल पडा , जिसने ज्‍योतिष के पतन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी।

भले ही किसी मुकदमें का हल होते एक पक्ष की हार और एक पक्ष की जीत हमें यह महसूस कराती है कि मुहूर्त्‍त का कोई महत्‍व नहीं , एक ही दिन या घंटा किसी को सुखमय या कष्‍टमय वातावरण दे सकता है , ऐसा नही है। गोचर के ग्रहों के आधार पर किसी किसी दिन सुखमय और किसी किसी दिन कष्‍टमय वातावरण तैयार होता है। गोचर में कभी कभी आसमान में ग्रहों की अत्‍यंत सुखद स्थिति होती है , जिस दिन अधिकांश लग्‍वाले सुखद फल ही महसूस करते हैं , जबकि कभी कभी आसमान में ग्रहों की स्थिति कष्‍टकर होती है , उस दिन अधिकांश लोग कष्‍ट में देखे जाते हैं। इसलिए विभिन्‍न ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति के आधार पर सामान्‍य लोगों के लिए उससे संबंधित कई सामान्‍य पंक्तियां कही जा सकती हैं , भले ही उसमें से कोई पंक्ति किसी के लिए अधिक प्रभावी तथा कोई पंक्ति किसी के लिए कम प्रभावी हो सकती है। पर इसका महत्‍व नहीं है , ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।
बहुत पाठक को लग्‍न और राशि में अंतर न समझने के कारण कुछ कन्‍फ्यूजन में पड जाते हैं। लग्‍न और राशि अलग अलग होते हैं , 'गत्‍यात्‍मक ज्‍यातिष' के हिसाब से राशि के आधार पर शुभ या अशुभ दिनों की चर्चा भले ही की जा सकती है , पर संदर्भों को तय करने में लग्‍न की भूमिका महत्‍वपूर्ण होती है , इसलिए विभिन्‍न संदर्भों की स्थिति को जानने के लिए अपना लग्‍न जानना आवश्‍यक होता है। आज तो किसी जातक का लग्‍न राशि निकालने के लिए बहुत सुविधा हो गयी है। इंटरनेट में भी आप अपने लग्‍न और अपनी राशि की जानकारी के लिए कई लिंकों पर जा सकते हैं , यहां और यहां । जन्‍म के शहर के लांगिच्‍यूड और लैटिच्‍यूड की जानकारी के लिए आप इस लिंक पर भी जा सकते हैं। अपने एक पुराने आलेख में मैं राशिफल की वैज्ञानिकता पर कुछ बातें लिख चुकी हूं , उसमें यह भी बताया है कि चंद्र राशि या सूर्य राशि की तुलना में लग्‍न राशि के आधार पर की गयी मासिक , साप्‍ताहिक या दैनिक भविष्‍यवाणियां अधिक उपयोगी हो सकती है। एक नए ब्‍लॉग में लगभग गोचर के चंद्र की स्थिति के आधार पर दो या तीन दिनों का भविष्‍यफल एक पोस्‍ट में समेटते हुए पाठकों के लिए आनेवाले दो तीन दिनों की परिस्थिति का अनुमान लगा पाने की दिशा में कार्य आरंभ किया है , आप सभी लाभ प्राप्‍त करने की कोशिश करे, यह आपके लिए बहुत उपयोगी हो सकता है।

जिन्‍हें लग्‍न की जानकारी न हो , वे अपना जन्‍म विवरण 09835192280 पर एसएमएस करके अपने लग्‍न की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं ... लग्‍न की जानकारी नि:शुल्‍क दी जाएगी।

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

आस्‍था और प्रेम किस हद तक अतिशयोक्ति को जन्‍म देते हैं ??

1999 तक पूरे मनोयोग से ज्‍योतिष का अध्‍ययन करने के बाद  बोकारो में रहते हुए मैने लोगों को ज्‍योतिषीय सलाह देने का काम शुरू कर दिया था। मैने पहले भी अपने एक आलेख में लिखा है कि 1998 से 2000 के समय में आसमान में शनि की स्थिति किशोरों को बुरी तरह प्रभावित करने वाली थी और उस दौरान अधिकांशत: टीन एजर बहुत ही परेशानी में अपने मम्‍मी पापा के साथ मेरे पास आते रहें। तब वे इतने परेशान थे कि मेरे समझाने बुझाने का भी उनपर कोई खास असर नहीं होता था। सामान्‍य तौर पर होनेवाले बुरे ग्रहों के प्रभाव को भी मैं सर्दी खांसी की तरह ही लेती हूं , जो जीवन की लडाई के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद करता है।

एक दिन एक अभिभावक मेरे पास आए , उनका टीन एजर बेटा घर छोडकर कहीं चला गया था। मैने उसके जन्‍म विवरण के आधार पर उसकी जन्‍मकुंडली बनायी , और आवश्‍यक गणनाएं की और बताया कि अप्रैल के बाद ही उसके घर लौटने की संभावना है। उस समय दिसंबर ही चल रहा था और अप्रैल आने में काफी समय बचे हुए था , मात्र 16 वर्ष का हर सुख सुविधा में पलने वाला बच्‍चा 4 महीने घर , शहर के बाहर कैसे काट सकता है , माता पिता उसकी आस ही छोड चुके थे। पर मैं जानती थी कि दो ढाई वर्षों तक चलनेवाला शनि भी लोगों को वर्ष पांच महीने अधिक परेशान किया करता है।

मई माह में एक दिन अचानक वो सिन्‍हा दंपत्ति हमसे बाजार में मिले , उनकी पत्‍नी बहुत परेशान थी , मुझसे कहा कि आपका कहा समय भी समाप्‍त हो गया , बेटा तो नहीं आया। मैने कहा कि नहीं , मेरा दिया समय समाप्‍त नहीं हुआ है , मैने अप्रैल के बाद कहा है , जून तक आने की उम्‍मीद है , जून में न लौटे तब कुछ गडबड माना जा सकता है। उसके दो चार दिनों बाद ही उ प्र से सूचना मिली कि उनका बेटा सुरक्षित किसी चीनी के मिल में काम कर रहा है। अभी उसकी तबियत खराब है , मिल के मालिक ने पहले उन्‍हें फोन किया और फिर अपने एक कर्मचारी के साथ उसे बोकारो वापस भेज दिया।

उस समय से उक्‍त दंपत्ति हर समस्‍या में नियमित तौर पर मेरी सलाह लेने लगे। धीरे धीरे मुझपर उनका विश्‍वास जमता चला गया। कभी‍ कभी उनके रेफरेंस से भी मेरे पास किसी और तरह की समस्‍या से जूझते लोग आते रहें। उसमें से कुछ लोग मेरे संपर्क में अभी भी हैं , कुछ नहीं भी , पर सिन्‍हा दंपत्ति का मुझपर अतिशय आस्‍था और प्रेम हैं , जिसका परिणाम अभी दो चार दिन पूर्व उनकी अतिशयोक्ति में देखने को मिला।  मेरे पास एक दंपत्ति आए , उनका बेटा खो गया है। उन्‍होने बताया "सिन्‍हा दंपत्ति ने हमें भेजा है , क्‍यूंकि उनके बेटे के खोने पर आपने उन्‍हें बता दिया था कि उनका बेटा ईख पेर रहा है। अब हमें भी बताइए कि मेरा बेटा कहां क्‍या कर रहा है ??"

मैं तो चौंक पडी , इस तरह की बातें मैं न तो बताती हूं और न ही बताने का दावा करती हूं। किसी प्रकार के तंत्र मंत्र की सिद्धि करने वाले , जो भविष्‍य को नहीं , सिर्फ भूत को स्‍पष्‍ट देखा करते हैं , उनके लिए शायद यहां पर जबाब देना आसान हो , जैसा वे दावा करते हैं , पर ज्‍योतिष जो मूलत: समय की जानकारी देने वाला विषय है , भूत और वर्तमान को भी संकेत में देखा करता है और भविष्‍य को भी , अपनी विद्या के आधार पर इसका स्‍पष्‍ट जबाब मेरे पास न था । प्राचीन ऋषि महर्षियों की तरह दिव्‍य ज्ञान भी मेरे पास नहीं , इसलिए मैं लोगों में ग्रहों के प्रभाव का वैज्ञानिक सोच भरना चाहती हूं ,पर ऐसा नहीं हो पाता है । उस वक्‍त मैं सिर्फ यही सोंच रही थी कि आस्‍था और प्रेम किस हद तक अतिशयोक्ति को जन्‍म देते हैं ??

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

बेनामी भाई फिर से अपनी ऋणात्‍मक सोंच के साथ हाजिर

बेनामी भाई आप फिर से अपनी ऋणात्‍मक सोंच के साथ हाजिर है ...मेरे विरोधी मात्र एक पोस्‍ट के साथ
लिंक ही देना था तो वो सकारात्‍मक पोस्‍टों की भी ता दे सकते थे .. जां संख्‍या में अधिक हैं , जैसे कि
संगीता पुरी जी की भविष्‍यवाणी सच: हैती से लाखों मरे
संगीता पुरी जी ने कहा था
संगीता पुरी जी की भविष्‍यवाणियां सही हुई
पंद्रह अगस्‍त बारिश और संगीता पुरी
संगीता पुरी जी आपकी भविष्‍यवाणी सही हुई आपको बधाई
संगीता पुरी सारा जीवन समर्पित कर दिया ज्‍योतिष को
एक बात और कहनी है आपसे बेनामी जी .. 16 सितंबर को जब चतुर्दिक बारिश का हाहाकार मचा था .. मौसम विभाग तक भी कॉमनवेल्‍थ गेम में बारिश को लेकर चिंता कर रहे थे
उस वक्‍त 
मेरी भविष्‍यवाणी यह थी .. ज्‍योतिष को न मानने वाले मेरी इन बातों पर क्‍यूं कुछ नहीं कहते .. ऋणात्‍मकता छोडे सकारात्‍मकता ओढें .. यदि किसी की मदद नहीं कर सकते तो किसी को काम करने में बाधा भी न डाले .. वैसे आपलोगों के द्वारा डाली गयी बाधाओं से मैं और मजबूत होती हूं !!