शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

अब कंप्‍यूटर ही मेरे बचपन के शौक को पूरा करेगा !!

मेरे घर में पहली गाडी मेरे होश संभालने से पूर्व से ही थी , पर दूसरी गाडी के खरीदे जाने की खुशी की धुधली तस्‍वीर अभी भी है। क्‍यूं न हो , उस वक्‍त मैं छह वर्ष की थी और माना जाता है कि इस उम्र की खास घटनाओं के प्रभाव से मस्तिष्‍क जीवनभर अछूता नहीं होता। इन दोनो एम्‍बेसडर गाडियों के बाद हमारे परिवार की गिनती गांव के खास परिवारों में होने लगी थी। जिस तरह आज के बच्‍चों को घर के सभी फोन और मोबाइल नं याद रहते हैं , हम बचपन में खुद भी अपनी गाडी के नंबर रटा और भाई बहनों को रटाया करते। बाबूजी की गाडी का नंबर ‘BRW 1016’ पापाजी के गाडी का नंबर ‘BRW 1658’ भले ही पापाजी से छोटे तीनो भाइयों को हमलोग चाचा और उनके अपने बच्‍चे पापा कहा करते हों , पर बडे दोनो भाई अभी तक पूरे घर के बाबूजी और पापाजी ही हैं। कहीं किसी प्रकार के धार्मिक आयोजन होने पर दादी जी और फिल्‍मों या अन्‍य कार्यक्रम के सिलसिले में मम्‍मी या चाची कहीं बाहर जाती। हम बच्‍चों को तो प्रत्‍येक में शामिल रहना ही था।

पूरे परिवार के सदस्‍यों को गाडी में बैठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान की ओर सुरक्षित ढंग से ले जाने में ड्राइवर की भूमिका मनोमस्तिष्‍क पर बचपन से ही प्रभाव डाला करती। पूरे ध्‍यान संकेन्‍द्रण से गाडी की गति को तेज और धीमा करना और समयानुसार स्‍टेयरिंग को बाये और दायें घुमाना हमें बच्‍चों का ही खेल लगता। कोई गाडी आगे निकलती तो हम आगे बढने के लिए ड्राइवर अंकल को परेशान करते और जब हमारी गाडी किसी से आगे बढती तो खास विजयी अंदाज में चिल्‍लाते। ऐसे में दस बारह वर्ष की उम्र में ही गाडी चलाने का शौक मुझपर हावी होता जा रहा था। यूं तो सरकारी नियम के हिसाब से गाडी चलाने के लिए मेरी उम्र बहुत कम थी , इसलिए लाइसेंस मिलने का कोई सवाल ही न था , पर घरवालों ने मेरे मैट्रिक की परीक्षा ठीक ढंग से पास कर लेने पर गाडी चलाना सिखाने का वादा कर दिया था।

पर वाह रे भाग्‍य का खेल , मेरे मैट्रिक पास करने से पूर्व ही गाडी खुद असहाय होकर दरवाजे पर लग गयी थी, वो गाडी सीखने में मेरी मदद क्‍या करती ?  परिवार वालों के अति विश्‍वास और ड्राइवरों के विश्‍वासघात ने मात्र 8 और 10 वर्ष पुरानी गाडी के कल पुर्जो में ऐसी गडबडी कर दी थी कि 1977 के बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर खडे मेरे चाचाजी के चुनाव प्रचार तक तो किसी तरह गाडी ने साथ दिया , पर उसके बाद वह सडक पर चलने लायक नहीं रही। मैं मन लगाकर पढाई करती हुई 1978 में फर्स्‍ट डिविजन से मैट्रिक पास भी कर लिया था , आशा और विश्‍वास के साथ विश्‍वकर्मा पूजा और दीपावली में दोनो कार की साफ सफाई और पूजा भी करती रही कि किसी दिन यह फिर जीवित होगी। पर कुछ दिनों तक यूं ही पडी हुई उस कार परिवारवालों के द्वारा औने पौने मूल्‍य में यह सोंचकर बेच दिया गया कि उन्‍हें ठीक करने में होनवाले खर्च की जगह एक नई गाडी आ जाएगी , पर मेरे विवाह के वक्‍त तक नई गाडी नहीं आ सकी और मेरा गाडी सीखने का सपना चूर चूर हो गया।

मेरे विवाह के वक्‍त ससुराल में सिर्फ स्‍कूटर और मोटरसाइकिल था , घर में कई बार गाडी लेने का कार्यक्रम अवश्‍य बना , पर वो खरीदा तब गया , जब मैं अपने बच्‍चों को लेकर बोकारो आ चुकी थी। वहां कभी दो चार दिनों के लिए जाना होता था , इसलिए हाथ आजमाने से भी कोई फायदा नहीं था। कभी पारिवारिक कार्यक्रम में उसका उपयोग भले ही मैने कर लिया हो , पर मेरे अपने व्‍यक्तिगत कार्यक्रम में बस , ट्रेन या टैक्‍सी ही सहयोगी बनी रही। बोकारो स्‍टील सिटी में जहां खुद के रहने की इतनी समस्‍या हो , एक गाडी लेकर अपना जंजाल बढाने का ख्‍याल कभी दिल में नहीं आया , इसलिए बैंको या अन्‍य फायनांस कंपनियों द्वारा दी जा रही सुविधाओं का लाभ उठाने से भी परहेज करती रही।

बचपन का शौक तब पूरा हुआ जब मैने कंप्‍यूटर खरीदा , कंप्‍यूटर में तरह तरह के कार वाले गेम इंस्‍टॉल कर घंटों चलाती। हाल के वर्षों में कंप्‍यूटर पर कार चलाना बंद कर दिया था। इच्‍छा थी कि घर वापस लौटने से पहले बोकारो स्‍टील में कार चलाना सीख लूं, पर घर के लोग इस पक्ष में नहीं। दरअसल मैं जिस कॉलोनी में रहने जा रही हूं , उसका फैलाव मात्र दो तीन किलोमीटर के अंदर है, कॉलोनी के अंदर कार की आवश्‍यकता पडती नहीं। कॉलोनी से बाहर जाने वाला रास्‍ता कोयला ढोने वाले ट्रकों के कारण इतना खराब है कि बिना अच्‍छे ड्राइवर के उसमें चला नहीं जा सकता। ऐसे में मेरे ड्राइविंग सीखने से का कुछ भी उपयोग नहीं है, इसलिए मैने ड्राइविंग सीखने का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है। अब मेरे ड्राइविंग के शौक को जीवनभर कंप्‍यूटर ही पूरा कर सकता है , इसलिए दो चार कार गेम और इंस्‍टॉल करने जा रही हूं।

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

कर्मकांड और ज्‍योतिष बिल्‍कुल अलग अलग विधा है !!

कुछ अनजान लोगों को मैं अपने प्रोफेशन ज्‍योतिष के बारे में बताती हूं , तो एक महिला के ज्‍योतिषी होने पर उन्‍हें आश्‍चर्य होता है। क्‍यूंकि उनकी जानकारी में एक ज्‍योतिषी और गांव के पंडित में कोई अंतर नहीं है , जो उनके बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बनाता है , विभिन्‍न प्रकार के शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त्‍त देखता है , घर में पूजा पाठ करता है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलान करता है , लग्‍न निकालता है , कोई सामान खोने पर उसकी वापसी की दिशा बताता है। उसके पास एक पंचांग होता है ,‍ जिसमें हर काम के उपयुक्‍त तिथि और कर्मकांड की विधियां दी हुई है। पर चूंकि जनसामान्‍य को इन बातों की जानकारी नहीं है , इसलिए पंडित लोगों के लिए ज्ञानी है,  उनसे पूछे बिना कोई काम नहीं करते। कभी किसी महिला की इस पेशे में उपस्थिति नहीं देखी , इसलिए उनका आश्‍चर्यित होना स्‍वाभाविक है।

हमारे गांव में ज्‍योतिषीय सलाह लेने  दूर दूर से लोग पापाजी के पास आया करते। पापाजी की अंधभक्‍तों से कभी नहीं बनी , चाहे वो परंपरा के हों या विज्ञान के। प्रारंभ से अबतक वे तार्किक बुद्धिजीवी वर्ग से ही ग्रहों के स्‍वभाव और उसके अनुसार उसके प्रभाव की विवेचना करते रहें। उनकी लोकप्रियता में कमी का यही एक बडा कारण रहा। पर घर के बाहर हमेशा गाडी खडी होने से गांव के लोगों को बडा आश्‍चर्य होता। धीरे धीरे लोगों को मालूम हुआ कि ये पंडित है , इसलिए लोग इनके पास आया करते हैं। फिर तो गांव वाले लोग भी अपनी समस्‍याएं लेकर आने लगे। किसी की बकरी खो गयी है , किसी का बेटा चला गया है , कोई व्रत करे तो किस दिन , कोई विवाह करे तो किससे और कौन से दिन ??

गांव के किसी भी व्‍यक्ति को पापाजी 'ना' नहीं कह सकते थे , पर उनके पीछे इतना समय देने से उनके अध्‍ययन मनन में दिक्‍कत आ सकती थी। हम सभी भाई बहन भी ऊंची कक्षाओं में पढ रहे थे , किसी को भी उन्‍हें समय देने की फुर्सत नहीं थी। ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति को देखने के लिए जो पंचांग िपापाजी  उपयोग में लाते , उसी में सबकुछ लिखा होता , पापाजी ने आठ वर्षीय छोटे भाई को पंचांग देखना सिखला दिया था। दो चार वर्षों तक मेरा छोटा भाई ही इनकी समस्‍याओं को सुलझाता रहा , क्‍यूंकि इसमें किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी नहीं करनी पडती थी। हजारो वर्ष पूर्व जिस आधार पर पंचांग बनाए जाते थे , जिस आधार पर शकुन , मुहूर्त्‍त , दिशा ज्ञान आदि होता था , आजतक उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है , इसमें कितनी सच्‍चाई और कितना झूठ है , इसकी भी कभी जांच नहीं की गयी है। अंधभक्ति में लोग पंडितों की बातों को आजतक सत्‍य मानते आ रहे हैं , आठ वर्ष के बच्‍चे की बातों को भी सत्‍य समझते रहें।

प्राचीन काल में गांव के पंडितों का संबंध सिर्फ कर्मकांड से था , क्रमश: बालक के जन्‍म का रिकार्ड रखने के लिए जन्‍मकुंडली बनाने का काम भी उन्‍हें सौंप दिया गया। पर ज्‍योतिषीय गणना का काम और किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी तो ऋषि मुनियों के अधीन था। हां उन्‍होने कुछ पुस्‍तके जरूर लिखकर इन पंडितों को दी , जिनके आधार पर बालक की जन्‍मकुंडली  बनाने के बाद बच्‍चे के आनेवाले जीवन के बारे में कुछ बातें लिखी जा सकती थी। पर समय सापेक्ष भविष्‍यवाणी करने के लिए बडे स्‍तर पर गाणितिक अध्‍ययन मनन की आवश्‍यकता होती है , जिसकी परंपरा भारतवर्ष में उन ऋषि मुनियों के बाद समाप्‍त हो गयी। यही कारण है कि आज तक समाज में ज्‍योतिष और कर्मकांड को एक ही चीज समझा जाता है , दोनो को हेय नजर से देखा जाता है।

उस समय से लोगों के मन में जो भ्रम बना , वो अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है। एक ज्‍योतिषी के रूप में मुझे समझने के बाद जन्‍मकुंडली बनवाने , मुहूर्त्‍त देखने , जन्‍मकुंडली मिलाने तथा अन्‍य कर्मकांडों की जानकारी के लिए मेरे पास लोग फोन किया करते हैं। कुछ लोग पूछते हैं कि बिना संस्‍कृत के आप ज्‍योतिष का काम कैसे कर सकती है ?? भले ही हर ज्ञान विज्ञान किसी न किसी रूप में एक दूसरे से सहसंबंध बनाते हों , पर लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि कर्मकांड और ज्‍योतिष में फर्क है। दोनो के विशेषज्ञ अलग होते हैं , सामान्‍य तौर पर कोई जानकारी भले ही दूसरे विषय की दी जा सकती है , पर विशेष जानकारी के लिए लोग को संबंधित विषय के विशेष जानकारी रखने वालों से ही संपर्क करना उचित है। मैं ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करती हूं और उसी आधार पर पृथ्‍वी में होनेवाली घटनाओं का समय से पूर्व आकलन करती हूं। कर्मकांड की जानकारी या अपने या अपने बच्‍चे की जन्‍मकुंडली का चक्र तो लोग किसी पंडित से प्राप्‍त कर सकते हैं , पर संबंधित व्‍यक्ति के वर्तमान भूत और भविष्‍य के बारे में कुछ जानकारी की आवश्‍यकता हो , तब मुझसे संपर्क किया जाना चाहिए।

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बुधवार, 10 नवंबर 2010

छठ सिर्फ श्रद्धा और आस्‍था का त्‍यौहार है .. इसमें दिखावटीपना कुछ भी नहीं !!

बिहार और झारखंड का मुख्‍य त्‍यौहार है छठ , अभी चारो ओर इसकी धूम मची है। ब्‍लॉग में भी दो चार पोस्‍ट पढने को मिल ही जा रहे हैं।  लोग छठ की खरीदारी में व्‍यस्‍त है , पडोस में मेहमानों की आवाजाही शुरू हो गयी है।  दूर दूर से इसके खास धुन पर बने गीत सुनने को मिल ही रहे हैं , फिर भी वर्ष में एक बार इसकी सीडी निकालकर दो तीन बार अवश्‍य चला लिया करती हूं। छठ के बाद फिर सालभर  इस गाने को नहीं बजाया जाता है , पडे पडे सीडी खराब भी तो हो जाएगी। गीत सुनते हुए न जाने कब मन बचपन में छठ की पुरानी यादों में खो जाता है।

कहते हैं , हमारे पूर्वज 150 वर्ष पूर्व ही पंजाब से आकर बोकारो जिले के पेटरवार नाम के गांव में बस गए थे।  इनके नाम से गांव में एक 'खत्री महल्‍ला' कहलाने लगा था। आर्सेलर मित्‍तल ने अब अपने स्‍टील प्रोजेक्‍ट के लिए इस स्‍थान को चुनकर अब इसका नाम औद्योगिक शहरों में शुमार कर दिया है! हमलोगों के जन्‍म तक तो कई पीढियां यहां रह चुकी थी , इसलिए यहां की सभ्‍यता और संस्‍कृति में ये पूरे रच बस चुके थे। पर छठ का त्‍यौहार कम घरों में होता था और कुछ क्षेत्रीय लोगों तक ही सीमित था , खासकर उस समय तक हममें से किसी के घर में नहीं मनाया जाता था। सब लोग छठ मैय्या के नाम पर एक सूप या जोडे सूप के मन्‍नत जरूर रखते थे , उसकी खरीदारी या तैयारी भी करते , पर अर्घ्‍य देने या दिलवाने के लिए हमें किसी व्रती पर निर्भर रहना पडता था।

हमारे मुहल्‍ले में दूसरी जाति के एक दो परिवार में यह व्रत होता था , खरना में तो हमलोग निश्चित ही खीर और पूडी या रोटी का प्रसाद खाने वहीं पहुंचते थे। माना जाता है कि खरना का प्रसाद जितना बंटे , उतना शुभ होता है , इसलिए बच्‍चों के लिए रखकर बाकी पूरे मुहल्‍ले का गाय का दूध व्रती के घर चला जाता था । कभी कभार हमारा मन्‍नत वहां से भी पूरा होता। पर अधिकांश वर्ष हमलोग दादी जी के साथ अपनी एक दीदी के दोस्‍त के घर जाया करते थे। एक दिन पहले ही वहां हमलोग चढावे के लिए खरीदे हुए सामान और पैसे दे देते। दूसरे दिन शाम के अर्घ्‍य के दिन नहा धोकर घर के गाय का ताजा दूध लेकर अर्घ्‍य देने जाते थे।

वहां सभी लोग प्रसाद के रख रखाव और पूजा की तैयारी में लगे होते थे। थोडी देर में सब घाट की ओर निकलते। कुछ महिलाएं और बच्‍चे दंडवत करते जाते , तो कुछ मर्द और बच्‍चे माथा पर प्रसाद की टोकरी लिए हुए । प्रसाद के सूप में इस मौसम में होने वाले एक एक फल मौजूद होते हैं , साथ में गेहूं के आटे का ठेकुआ और चावल के आटे का कसार भी।  बाकी सभी लोग पूरी आस्‍था में तथा औरते छठ का विशेष गीत गाती हुई साथ साथ चलती। हमारे गांव में कोई नदी नहीं , इसलिए पोखर पर ही छठ मनाया जाता। घाट पर पहुंचते ही नई सूती साडी में व्रती तालाबों में डुबकी लगाती , फिर हाथ जोडकर खडी रहती। सूर्यास्‍त के ठीक पहले व्रती और अन्‍य लोग भगवान को अर्घ्‍य देते। हमारे यहो सभी मर्द लडके भी उस वक्‍त तालाब में नहाकर अर्घ्‍य देते थे। महीने या सप्‍ताह भर की तैयारी के बाद कार्यक्रम थोडी ही देर में समाप्‍त हो जाता था। पर आधी पूजा तो सुबह के लिए शेष ही रह जाती थी।

पहले ठंड भी बहुत पडती थी , सूर्योदय के दो घंटे पहले घाट में पहुंचना होता है , क्‍यूंकि वहां पूरी तैयारी करने के बाद आधे घंटे या एक घंटे व्रती को जल में खडा रहना पडता है। इसलिए सूर्योदय के ढाई घंटे पहले हमें अपने घर से निकलना होता। वहां जाने का उत्‍साह इतना अधिक होता कि हमलोग अंधेरे में ही उठकर स्‍नान वगैरह करके वहां पहुंच जाते। वहां तैयारी पूरी होती , दो तीन दिन के व्रत और मेहनत के बाद भी व्रती के चेहरे पर एक खास चमक होती थी। शाम की तरह ही सारा कार्यक्रम फिर से दुहराया जाता , उसके बाद प्रसाद का वितरण होता , फिर हमलोग घर वापस आते।

विवाह के दस वर्ष बाद तक संतान न होने की स्थिति में खत्री परिवार की दो महिलाओं ने पडोसी के घरों में जाकर इस व्रत को शुरू किया और सूर्य भगवान की कृपा कहें या छठी मैय्या की या फिर संयोग ... दोनो के ही बच्‍चे हुए , और बाद में हमारे मुहल्‍ले में भी कई परिवारों में धूमधाम से यह व्रत होने लगा। इसलिए अब हमारे मुहल्‍ले के लोगों को इस व्रत के लिए गांव के दूसरे छोर पर नहीं जाना पडता है,  उन्‍हे पूरे मुहल्‍ले की हर संभव मदद मिलती है। बचपन के बाद अभी तक कई जगहों की छठ पूजा देखने को मिली ,  हर स्‍थान पर इस व्रत और पूजा का बिल्‍कुल एक सा परंपरागत स्‍वरूप है , यह सिर्फ श्रद्धा और आस्‍था का त्‍यौहार है .. इसमें दिखावटीपना कुछ भी नहीं।

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

भूकम्‍प का ग्रह योग 16 नवंबर 2010 को सर्वाधिक प्रभावी होगा !!

मनुष्‍य के जीवन में प्राकृतिक आपदाओं में सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाली दुर्घटना भूकम्‍प ही है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण भू-पट्टियों में लगातार हो रही गति के कारण पृथ्वी की प्लेटों का खिसकना ही है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के अंदर लावा भी ज्वालामुखी वाले क्षेत्रों में भूकम्‍प लाने में जिम्‍मेदार होती है। धरती के भीतर चल रही भूगर्भीय प्रक्रियाओं के कारण हर सैकेंड लगभग तीन भूकम्प ग्लोब के किसी न किसी कोने पर सिस्मोग्रॉफ के जरिए अनुभव किए जाते हैं , पर इनमें से दो प्रतिशत भूकम्प सतह पर महसूस होते हैं । इनमें से लगभग 100 भूकम्प हर साल रिक्टर पैमाने पर दर्ज होते हैं, पर इनमें से दो चार भूकम्‍प जानमाल का भारी नुकसान करते हैं , जिसके कारण भूकम्‍प का नाम ही इतना भयावह प्रतीत होता है।

29 सितंबर 2010 के पोस्‍ट में ही मैने एक खास ग्रहयोग के कारण नवंबर के मध्‍य में एक विनाशकारी भूकम्‍प की आशंका जतायी थी। इसके खास तिथि , समय और क्षेत्र की जानकारी देते हुए नवंबर के प्रथम सप्‍ताह में ही एक और लेख का वादा आपसे किया था। वैसे तो इस योग के फलीभूत होने की संभावना एक सप्‍ताह पूर्व से एक सप्‍ताह पश्‍चात तक कभी भी हो सकती है , पर काफी अध्‍ययन के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ इस नतीजे पर पहुंचा है कि यह योग 16 नवंबर को भारतीय समय के अनुसार दिन के साढे तीन बजे अत्‍यधिक प्रभावी रहेगा। इसलिए इस तिथि और समय के आसपास भूकम्‍प की आशंका बढ जाती है।

मैने अपने पूर्व के आलेखों में स्‍पष्‍टत: कहा है कि अभी तक के रिसर्च के आधार पर तिथि की जितनी जानकारी हुई है , उतना दावा समय के बारे में नहीं किया जा सकता। और क्षेत्र के बारे में तो हमारा रिसर्च अभी बिल्‍कुल प्रारंभिक दौर से गुजर रहा है , आक्षांस के बारे में तो हम बिल्‍कुल ही दावा नहीं कर सकते , पर एक खास आधार का पता चलने के कारण देशांतर रेखा का कुछ अनुमान कर पाने की हिम्‍मत कर पाते हैं। हमारे हिसाब से भूकम्‍प के आने की संभावना 51 डिग्री पूर्व और 21 डिग्री पश्चिम के आसपास मानी जा सकती है। यदि इसके क्षेत्र को थोडा विस्‍तार दिया जाए , तो कहा जा सकता है कि 41 डिग्री से 61 डिग्री पूर्व तथा 11 डिग्री पश्चिम से 31 डिग्री पश्चिम में भूकम्‍प की संभावना हो सकती है। दोनो ही स्‍थानों में इस भूकम्‍प का समय भिन्‍न भिन्‍न हो सकता है।

दोनो ही हिसाब से हमारा देश पूर्ण तौर पर सुरक्षित दिख रहा है , यह हमारे लिए बडी राहत की बात है। हालांकि देश के पचिमी हिस्‍से में रहनेवालों के प्रभावित होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जहां तक हमारी गणना का सवाल है , यह छोटे मोटे भूकंप के लिए नहीं होता । कम से 6 रिक्टर से ऊपर की तीव्रता वाले भूकम्प के ही बारे में कहा जाता है , जो विनाशकारी होते हैं, खासकर जहां-जहां जनसंख्या का घनत्व अधिक है उन क्षेत्रों में भूकम्प आ जाने से अधिक जन-धन की हानि होने की आशंका बनी रहती है। अपने गणना के आधार पर हमारा मानना है कि 16 नवंबर को भूकम्‍प आएगा तो यह बडा भयावह होगा , यदि एक दो दिन पूर्व और पश्‍चात् हो , तो थोडी राहत की बात अवश्‍य हो सकती है। भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है जिसे जब इतने बडे बडे वैज्ञानिक नहीं रोक सकते , तो हम इसका दावा कैसे कर सकते हैं ? परन्तु अन्‍य विज्ञानों के तरह ही पूर्वानुमानों और संकेतों को निरंतर कुछ वर्षों तक विकसित किया जाए , तो इसके आधार पर हम इससे होने वाले जान-माल के नुकसान को कम जरूर कर सकते हैं । आइए ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि जान माल की कम से कम क्षति हो।

रविवार, 7 नवंबर 2010

कैसा रहेगा अगले सप्‍ताह का शेयर बाजार ??

जब एक महीने से तेज गति से चलते हुए शेयर बाजार को विराम लग रहा था, सेंसेक्‍स और निफ्टी में थोडी सी बढत भी बिकवाली का दबाब पैदा कर रही थी , निवेशकों के समक्ष थोडी आशंका बनी हुई थी, 22 अक्‍तूबर को अपने पोस्‍ट में मैने लिखा था कि  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांतों की माने , तो अभी आनेवाले समय में शेयर बाजार के सकारात्‍मकता को लेकर बडी दुविधा नहीं दिखाई दे रही। खासकर अभी 8 नवंबर तक बाजार फिर एक नई ऊंचाई हासिल करेगा। कल 8 नवंबर आने को ही है और पिछले सप्‍ताह ही शेयर बाजार ने लगभग 900 प्‍वाइंट्स की बढत हासिल कर ली है

पिछले सप्‍ताह 1 नवंबर को मैने लिखा कि 1 और 2 नवंबर की तुलना में 3 , 4 और 5 नवंबर शेयर बाजार के लिए बेहतर रहेगा , ग्रहों का प्रभाव 3 और 4 नवंबबर को मेटल सेक्‍टर के लिए खास रहेगा , इसलिए कोल इंडिया के शेयरों को अच्‍छा रिस्‍पांस मिलना चाहिए। 5 नवंबर आई टी, रियल्‍टी और बैंकिंग जैसे कुछ सैक्‍टरों को प्रभावित करने वाले होंगे। इन तीनों दिनों में सेंसेक्‍स और निफ्टी ने बडी़ बढ़त हासिल की , खासकर मेटल सेक्‍टर में बहुत अच्‍छी बढत हुई और दिवाली के दिन मुहूर्त ट्रेडिंग के दौरान सेंसेक्स 21000 के आकंडे को पार करने में कामयाब रहा। 

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की माने तो बाजार में आने वाले दिनों में बढत को लेकर बडी शंका नहीं दिखाई देती लेकिन पिछले सप्‍ताह वाली बात भी अभी लौटकर नहीं आनेवाली। 8 नवंबर तक बाजार की स्थिति बहुत ही मजबूत दिखती है, इसलिए आने वाले सप्‍ताह का पहला दिन शेयर बाजार के लिए मनोनुकूल होगा। इस दिन ऑयल और गैस सैक्‍टर में बडी़ बढ़त देखने को मिलेगी। इसके साथ ही आईटी और रियलटी जैसे सूचकांक भी बढत लिए रहेंगे। खासकर बाजार की शुरूआत अच्‍छे ढंग की होगी। पर 10 , 11 , 12 और 13 नवंबर को बाजार से बडी उम्‍मीद नहीं रखी जा सकती। कुछ शेयर या सैक्‍टर बढते हुए दिखेंगे, तो कुछ में घटत की भी संभावना बनेगी और इस तरह मिला जुला कारोबार होने की संभावना है। हां, लगभग प्रतिदिन बाजार शुरूआती दौर में जितना तेज रहेगा,वैसा अंत तक देखने को नहीं मिलेगा। सप्‍ताह के अंत तक कुछ उतार चढाव यानी 100–200 अंकों की घटत या बढत से इनकार नहीं किया जा सकता।

कुछ पाठको , जिन्‍हें हमारे द्वारा किए गए एक सप्‍ताह के आकलन से दूरस्‍थ प्‍लानिंग करने में सुविधा नहीं महसूस होती है , की इच्‍छा को ध्‍यान में रखते हुए , पूरे नवंबर भर के शेयर बाजार का आकलन किया जा चुका है। प्रतिमाह इस प्रकार का आकलन किया जा सकता है। सशुल्‍क उसे प्राप्‍त करने की इच्‍छा रखनेवाले हमारे ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं।   

काली पूजा के कुछ चित्र देखिए ..........

कार्तिक अमावस्या की शाम को घर घर होने वाली लक्ष्‍मी पूजा के साथ ही रात्रि में काली पूजा की भी बहुत महत्ता है। एंसी मान्‍यता है कि देवों में सबसे पराक्रमी और शक्तिशाली मां काली देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। मां काली की पूजा से वे सभी सभी नकारात्मक प्रवृतियां दूर होती हैं ,  जो धार्मिक प्रगति और यश प्राप्ति में बाधक हैं। बोकारो में हमारी कॉलोनी मे हुए काली पूजा के कुछ चित्र देखिए .....................