शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

वृश्चिक लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में संबंध ...


आसमान के 210 डिग्री से 240 डिग्री तक के भाग का नामकरण ...वृश्चिक राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न वृश्चिक माना जाता है। वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र नवम् भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाग्‍य , धर्म आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए वृश्चिक लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातक बहुत भाग्‍यशाली होते हैं , संयोग से इनका काम होता रहता है।भाग्‍य का भरपूर सुख मिलने से  तुला लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के पिता , पद प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक स्थिति का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए वृश्चिक लग्‍न के जातक अपने पद प्रतिष्‍ठा को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनका जन्‍म प्रतिष्ठित परिवार में होता है , इन्‍हें पिता का सुख प्राप्‍त होता है ,  पद प्रतिष्‍ठा की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन सबकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास और रोग , ऋण , शत्रु जैसे झंझटों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के  स्‍वास्‍थ्‍य में झंझट बने होने की संभावना रहती है ।  जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इनका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा होता है , जीवन में अधिक झंझट नहीं आते , झंझओं से लडने की शक्ति मौजूद होती है , जिससे प्रभावशाली माने जाते हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर स्‍वास्‍थ्‍य की कमजोरी आत्‍मविश्‍वास को कमजोर बनाती है, झंझटों से लडने की शक्ति कम होती है तथा प्रभाव की कमी महसूस करते हैं।

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र सप्‍तम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के घर गृहस्‍थी , खर्च और बाह्य संदर्भों आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनके घर गृहस्‍थी के वातावरण में खर्च का बहुत महत्‍व होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर वृश्चिक लग्‍नवालों को खर्चशक्ति की प्रचुरता प्राप्‍त होती है , इस कारण इनकी घर गृहस्‍थी बहुत आरामदायक होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर खर्चशक्ति की कमी के कारण वृश्चिक लग्‍नवालों के घरेलू जीवन में समस्‍याएं देखने को मिलती हैं।

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध अष्‍टम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के जीवनशैली और लाभ का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के जीवनशैली को मजबूती देने में लाभ की तथा लाभ को मजबूत बनाने में जीवनशैली  की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का लाभ मजबूत होता है , जिससे जीवनशैली सुखद बनी होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर वृश्चिक लग्‍नवाले लाभ की कमी के कारण अपनी जीवनशैली को बहुत कमजोर पाते हैं। 

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और पंचम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , परिवार , बुद्धि , ज्ञान और संतान का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए वृश्चिक लग्‍न के जातकों के अपनी या संतान की पढाई लिखाई में धन की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती  है।  जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर तुला लग्‍न के जातकों की धन की स्थिति  मजबूत होती है , जिससे अपना या संतान पक्ष का बौद्धिक विकास सुखद ढंग से हो पाता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर वृश्चिक लग्‍नवाले जातकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है , जिसका बुरा प्रभाव उनकी खुद या संतान पक्ष के बौद्धिक विकास पर पउता है। 

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि तृतीय और चतुर्थ भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के भ्रातृ पक्ष , मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , स्‍थायित्‍व मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के भाई , बंधुओं के कारण स्‍थायित्‍व के मजबूत या कमजोर होने की संभावना बनती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को भाई बंधु बांधव से सुख प्राप्‍त होता है, हर प्रकार की संपत्ति की स्थिति मजबूत होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर वृश्चिक लग्‍नवालों के भाई बंधु में संपत्ति को लेकर विवाद बनने की संभावना बनती है। मातृ पक्ष के सुख में भी कमी देखने को मिलती है।

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

तुला लग्‍न वालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में सहसंबंध ...


आसमान के 180 डिग्री से 210 डिग्री तक के भाग का नामकरण तुला राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न तुला माना जाता है। तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के पिता , समाज , पद प्रतिष्‍ठा आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए तुला लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर पिता का भरपूर सुख और मन मुताबिक प्रतिष्‍ठा मिलने से  तुला लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के लाभ , मंजिल आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए तुला लग्‍न के जातक अपने लाभ को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नाम यश फैलाने के लिए ये अपनी मंजिल को बहुत मजबूत बनाने में दिलचस्‍पी लेते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से लाभ और मंजिल की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इनकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , घर गृहस्‍थी , ससुराल पक्ष आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के घर गृहस्‍थी में धन का काफी महत्‍व होता है।  जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इनकी आर्थिक मजबूती से घर गृहस्‍थी का वातावरण बहुत अच्‍छा होता है , पत्‍नी पक्ष से या ससुराल से भी धन प्राप्‍त करने की संभावना बनी होती है। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर आर्थिक मामलों की कमजोरी घर गृहस्‍थी के मामलों को कमजोर बनाती है। ससुराल पक्ष का माहौल भी कमजोर बना होता है।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र प्रथम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास और जीवनशैली आदि से संबंधित मामलों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनकी जीवनशैली से स्‍वास्‍थ्‍य और स्‍वास्‍थ्‍य से जीवनशैली का संबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर तुला लग्‍नवालों की जीवनशैली बहुत आरामदायक होती है , जिसके कारण इनका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर जीवनशैली की गडबडी के कारण तुला लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में समस्‍याएं देखने को मिलती हैं।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध नवम और द्वादश भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाग्‍य , खर्च , बाहरी संदर्भों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के भाग्‍य को मजबूती देने या कमजोर बनाने में खर्च तथा बाहरी संदर्भों  की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का संबंध खर्चशक्ति की मजबूती के कारण दूर दूर तक बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर तुला लग्‍नवाले खर्च शक्ति की कमी के कारण अपने भाग्‍य को बहुत कमजोर मानते हैं। बाहरी संबंधों में भी बाधाएं आती हैं।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति तृतीय और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव और झंझट भरे वातावरण का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए तुला लग्‍न के जातकों के भाई , बहन , बंधु बांधव का झंझट से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर तुला लग्‍न के जातकों को भाई बहन , बंधु बांधव का सुख प्राप्‍त होता है , जिससे प्रभाव की बढोत्‍तरी होती है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर तुला लग्‍नवाले जातकों को भाई , बहन बंधु बांधवों की कमजारियों को झेलने को विवश होना पडता है।  इनसे झंझट होने की संभावना भी बहुत अधिक होती है।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि चतुर्थ और पंचम भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , स्‍थायित्‍व , बुद्धि , ज्ञान और संतान जैसे मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई में मातृ पक्ष की भूमिका होती है , संतान के द्वारा स्‍थायित्‍व के मजबूत या कमजोर होने की संभावना बनती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को माता से सुख प्राप्‍त होता है, खुद की सूझ बूझ अच्‍छी होती है , संतान पक्ष बहुत मजबूत स्थिति में होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर तुला लग्‍नवाले मातृ पक्ष के सुख में कमी , छोटी बडी संपत्ति का सुख न प्राप्‍त करने के कारण स्‍थायित्‍व की कमी तथा अपनी या बच्‍चों की पढाई लिखाई के मामलों में असफलता प्राप्‍त करते हैं।।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

सरस्‍वती पूजा पर आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं !!

सरस्‍वती पूजा को लेकर सबसे पहली याद मेरी तब की है , जब मैं मुश्किल से पांच या छह वर्ष की रही होऊंगी और सरस्‍वती पूजा के उपलक्ष्‍य में शाम को स्‍टेज में हो रहे कार्यक्रम में बोलने के लिए मुझे यह कविता रटायी गयी थी ...

शाला से जब शीला आयी ,
पूछा मां से कहां मिठाई ।
मां धोती थी कपडे मैले ,
बोली आले में है ले ले।
मन की आशा मीठी थी ,
पर आले में केवल चींटी थी।
खूब मचाया उसने हल्‍ला ,
चींटी ने खाया रसगुल्‍ला।

गांव में रहने के कारण अपनी पढाई न पूरी कर पाने का मलाल दादाजी को इतना रहा कि उन्‍होने पांचों बेटों को अधिक से अधिक पढाने की पूरी कोशिश की। एक मामूली खेतिहर और छोटा मोटा व्‍यवसाय करनेवाले मेरे दादाजी अपने पांचो बेटे को कक्षा में टॉपर पाकर और उनके ग्रेज्‍युएट हो जाने मात्र से ही काफी खुश रहते और मानते कि हमारे परिवार पर मां सरस्‍वती की विशेष कृपा है , इसलिए अच्‍छा खासा खर्च कर अपने घर  पर ही वसंत पंचमी के दिन सरस्‍वती जी की विशेष पूजा करवाया करते थे। सुबह पूजा होने के बाद शाम को लोगों की भीड जुटाने के लिए एक माइक और लाउस्‍पीकर आ जाता , वहां के सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में हमारे परिवार के लोगों का तो शरीक रहना आवश्‍यक होता। घर के छोटे बच्‍चे भी स्‍टेज पर जाकर अपना नाम ही जोर से चिल्‍लाकर बोल आते।

थोडी बडी होने पर स्‍कूल में भी हमारा उपस्थित र‍हना आवश्‍यक होता , चूंकि स्‍कूलों के कार्यक्रम में थोडी देरी हो जाया करती थी , इसलिए हमारे घर की पूजा सुबह सवेरे ही हो जाती और माता सरस्‍वती को पुष्‍पांजलि देने के बाद ही हमलोग तब स्‍कूल पहुंचते , जब वहां का कार्यक्रम शुरू हो जाता था। सभी शिक्षकों को मालूम था कि हमारे घर में भी पूजा होती है , इसलिए हमें कभी भी देर से पहुंचने को लेकर डांट नहीं पडी। बचपन से ही हम भूखे प्‍यासे स्‍कूल जाते और स्‍कूल की पूजा के बाद ही प्रसाद खाते हुए सारा गांव घूमते , प्रत्‍येक गली में एक सरस्‍वती जी की स्‍थापना होती थी , हमलोग किसी भी मूर्ति के दर्शन किए बिना नहीं रह सकते थे।

ऊंची कक्षाओं के बच्‍चों को स्‍कूल के सरस्‍वती पूजा की सारी व्‍यवस्‍था खुद करनी होती थी , इस तरह वे एक कार्यक्रम का संचालन भी सीख लेते थे। चंदा एकत्रित करने से लेकर सारा बाजार और अन्‍य कार्यक्रम उन्‍हीं के जिम्‍मे होता। सहशिक्षा वाले स्‍कूल में पढ रही हम छात्राओं को सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम में चंदा इकट्ठा करने और पंडाल की सजावट के लिए घर से साडियां लाने से अधिक काम नहीं मिलता था , इसलिए सबका खाली दिमाग अपने पहनावे की तैयारी करता मिलता।

तब लहंगे का फैशन तो था नहीं , बहुत कम उम्र से ही सरस्‍वती पूजा में हम सभी छात्राएं साडी पहनने के लिए परेशान रहते। आज की  तरह तब महिलाओं के पास भी साडियों के ढेर नहीं हुआ करते थे , इसलिए अच्‍छी साडियां देने को किसी की मम्‍मी या चाची तैयार नहीं होती और पूजा के मौके पर साधारण साडियां पहनना हम पसंद नहीं करते थे। साडियों के लिए तो हमें जो मशक्‍कत करनी पडती , उससे कम ब्‍लाउज के लिए नहीं करनी पडती। किसी भी छात्रा को अपनी मम्‍मी और चाचियों का ब्‍लाउज नहीं आ सकता था, ब्‍लाउज के लिए हम पूरे गांव में दुबली पतली नई ब्‍याहता भाभियों को ढूंढते। तब रंगो के इतने शेड तो होते नहीं थे , हमारी साडी के रंग का ब्‍लाउज कहीं न कहीं मिल ही जाता , तो हमें चैन आता।

हमारे गांव में वसंतपंचमी के दूसरे दिन से ही मेला भी लगता है , हमारे घर में तो सबका संबंध शुरू से शहरों से रा है , इसलिए मेले को लेकर बडों को कभी उत्‍साह नहीं रहा , पर दूर दराज से पूरे गांव में सबके घर मेहमान मेला देखने के लिए पहुंच जाते हैं। अनजान लोगों से भरे भीड वाले वातावरण में हमलोगों को लेकर अभिभावक कुछ सशंकित भी रहते , पर एक सप्‍ताह तक हमलोगों का उत्‍साह बना रहता। ग्रुप बनाकर ही सही , पर मेले में आए सर्कस से लेकर झूलों तक और मिठाइयों से लेकर चाट पकौडों तक का आनंद हमलोग अवश्‍य लेते।

वर्ष 1982 में के बी वूमेन्‍स कॉलेज , हजारीबाग में ग्रेज्‍युएशन करते हुए चतुर्थ वर्ष में पहली बार सरस्‍वती पूजा के आयोजन का भार हमारे कंधे पर पडा था। इस जिम्‍मेदारी को पाकर हम दस बीस लडकियां अचानक बडे हो गए थे और पंद्रह दिनों तक काफी तैयारी के बाद हमलोगों ने सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम को बहुत अच्‍छे ढंग से संपन्‍न किया था। वो उत्‍साह भी आजतक नहीं भूला जाता। आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं , सबों को सरस्‍वती पूजा की शुभकामनाएं !!

कन्‍या लग्‍नवालों के सभी संदर्भों का सहसंबंध ...


आसमान के 150 डिग्री से 180 डिग्री तक के भाग का नामकरण कन्‍या राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न कन्‍या माना जाता है। कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के लाभ , लक्ष्‍य और मंजिल आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कन्‍या लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर लाभ प्राप्ति की मजबूत स्थिति से कन्‍या लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य द्वादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के खर्च और बाहरी संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कन्‍या लग्‍न के जातक अपनी खर्च शक्ति को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नाम यश फैलाने के लिए ये बाह्य संदर्भों को मजबूत बनाने में दिलचस्‍पी लेते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से खर्चशक्ति और बाह्य संदर्भों की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इनकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के भाई बहन , बंधु बांधवों का इनकी जीवनशैली से सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इन्‍हें भाई बंधुओं का सहयोग मिलता है , जिससे जीवनशैली मजबूत बनी होती है। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाई , बहन , बंधु बांधवों के सहयोग न मिलने या उनसे संबंधित तनाव के कारण जीवनशैली बहुत कमजोर दिखती है। 

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र द्वितीय और नवम् भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाग्‍य , धन आदि से संबंधित मामलों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए किसी प्रकार के संयोग या दुर्योग का इनके धन से सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर कन्‍या लग्‍नवालों के धनविषयक मामलों में भाग्‍य मददगार सिद्ध होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर भाग्‍य की गडबडी के कारण जीवन में आर्थिक मामलों में बडी गडबडी देखने को मिलती है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध प्रथम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , पिता , पद प्रतिष्‍ठा , सामाजिक राजनीतिक मामलों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के आत्‍मविश्‍वास बढाने या घटाने में पिता और कैरियर की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातक अपने पिता की मजबूत स्थिति के बलबूते मजबूत आत्‍मविश्‍वास तथा इस मजबूत आत्‍‍मविश्‍वास के बल पर कैरियर को मजबूती देने में समर्थ होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर कन्‍या लग्‍नवाले पिता की कमजोरी के कारण आत्‍विश्‍वास को कमजोर पाते हैं , स्‍वास्‍थ्‍य की गडबडी और कार्यस्‍थल पर मनोनुकूल वातावरण का अभाव भी इन्‍हें प्राप्‍त होता है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति चतुर्थ और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के माता , हर प्रकार की संपत्ति , घर गृहस्‍थी का वातावरण का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कन्‍या लग्‍न के जातकों के मातृ पक्ष या हर प्रकार की संपत्ति का उनके घरगृहस्‍थी से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर कन्‍या लग्‍न के जातकों को मातृ पक्ष तथा हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त होता है , जिससे घर गृहस्‍थी का वातावरण मजबूत बना होता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर कन्‍या लग्‍नवाले जातकों को मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति और स्‍थायित्‍व की कमजोरी देखने को मिलती है , जिससे घर गृहस्‍थी की स्थिति कमजोर महसूस होती है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि पंचम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान पक्ष और रोग , द्वण , शत्रु जैसे झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई और अन्‍य मामलों में झंझट आने की बहुत संभावना बन जाती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की खुद की सूझ बूझ अच्‍छी होती है , संतान पक्ष बहुत मजबूत स्थिति में होता है , जो प्रभाव को बढाने में सहायक सिद्ध होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर कन्‍या लग्‍नवाले अपनी या बच्‍चों की पढाई लिखाई को लेकर बडा झंझट प्राप्‍त करते हैं।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

सिंह लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में सहसंबंध ....

आसमान के 120 डिग्री से 150 डिग्री तक के भाग का नामकरण सिंह राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न सिंह माना जाता है। सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र द्वादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के खर्च , बाहरी संदर्भों आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए सिंह लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ खर्च और बाह्य संपर्क होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर खर्च शक्ति की मजबूत स्थिति और देशाटन वगैरह से सिंह लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य लग्‍न भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व और आत्‍मविश्‍वास का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए सिंह लग्‍न के जातक अपने शरीर को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नाम यश फैलाने के लिए ये अपने व्‍यक्तित्‍व का ही स‍हारा लेना पसंद करते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने व्‍यक्तित्‍व की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इनकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के मातृ पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व और भाग्‍य का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के मातृ पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व का भाग्‍य से  सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इन्‍हें मातृ पक्ष का सहयोग मिलता है , हर प्रकार की संपत्ति और स्‍थायित्‍व की मजबूती रहती है , जिससे भाग्‍य की मजबूती बनती है । विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाग्‍य बहुत कमजोर हो जाता है। इसी प्रकार भाग्‍य के मजबूत होने का सर्वाधिक फायदा माता और हर प्रकार की संपत्ति को मिलता है , जबकि विपरीत स्थिति में ये पक्ष कमजोर बने होते हैं।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाई , बहन , बंधु , बांधव पक्ष , पिता पक्ष और सामाजिक राजनीतिक स्थिति का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनका आपस में सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर सिंह लग्‍नवालों के सामाजिक राजनीतिक और कैरियर के मामलों की मजबूती में भाई बहन बंधु बांधव मददगार सिद्ध होते हैं और भाई बहन बंधु बांधव की मजबूती में सामाजिक राजनीतिक वातावरण। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर भाई बहन बंधु बांधव का सहयोग नहीं मिलता और ऐसे लोगों के कैरियर या सामाजिक राजनीतिक मामलों में बडी गडबडी आ जाती है।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी है और यह जातक के धन , कोष और लाभ से संबंधित मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के धन कोष को मजबूती देने में हर प्रकार के लाभ तथा लाभ को मजबूती देने में धन और कौटुम्बिक मजबूती का हाथ होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातक अपनी मजबूत पूंजी के बल पर लाभ को मजबूती देने में समर्थ होते हैं और लाभ की मजबूती से कोष को मजबूती देने में समर्थ होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर सिंह लग्‍नवाले धन की कमी से लाभ से और लाभ की कमी से कोष से वंचित रह जाते हैं ।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति पंचम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए सिंह लग्‍न के जातकों के बुद्धि , ज्ञान और संतान पक्ष का जीवनशैली पर बहुत प्रभाव देखा जाता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर सिंह लग्‍न के जातकों का खुद का बुद्धि , ज्ञान या संतान पक्ष बहुत मजबूत दिखाई पडता है , जिससे जीवनशैली मजबूत बनी रहती है , उनकी जीवनशैली संतान पक्ष को मजबूती देती है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर सिंह लग्‍नवाले जातकों की अपनी सूझ बूझ और संतान पक्ष में गडबडी पैदा होती है , जिससे जीवन कमजोर हो जाता है और इससे आनेवाली पीढी के जीवन में भी गडबडी आती है।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि षष्‍ठ और सप्‍तम  भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के घर , गृहस्‍थी और झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के घर गृहस्‍थी से संबंधित मामलों में झंझट आने की बहुत संभावना बन जाती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों के घर गृहस्‍थी या ससुराल का पक्ष बहुत मजबूत होता है , जो प्रभाव को बढाने में सहायक सिद्ध होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर सिंह लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी के मामलों को लेकर बडा झंझट प्राप्‍त करते हैं , उनके ससुराल पक्ष का माहौल भी अच्‍छा नहीं होता।