शनिवार, 27 अगस्त 2011

2012 जुलाई के बाद शनि की ढैय्या समाप्‍त हो रही है ... जीवन में सुधार होगा !!

पाठकों के प्रश्‍नों के उत्‍तर देने के क्रम में ही आज का यह लेख है। जब से मैं ब्‍लॉग जगत में आयी हूं , व्‍यक्तिगत समस्‍याओं के लिए पाठक मेल करते ही रहते हैं। 28 मई 2009 को ही मेरे पास एक ईमेल आया ....


NAMSAKAARJI
AAPKI BHAVISHVANI THEEK RAHI PRANTU NUKSAAN TO HO HI GAYA.
YADI AAP UCHIT SAMJHE TO KIRPYA MERA MARGDARSHAN KARE :
DATE OF BIRTH 17 JULY, 1964
TIME : 15:43:25
PLACE : SIRSA - HARYANA
QUESTION :
BUSINESS
PARENTS CARE (KAR PAUNGA KE NAHI)
SAMAJ SEWA KAISI RAHEGI
SHIKSHA KE KHASHETAR MEIN KUCHH SEWA KAR RAHU HU, SAFAL HO PAUNGA YA NAHI
KRIPYA ANYATHA HI N LE
AABHAR.

समाजसेवा की भावना से ओत प्रोत इनके प्रश्‍नों से ही इनके व्‍यक्तित्‍व का अनुमान लगाया जा सकता है , ऐसे लोगों के जबाब देने में मुझे प्राथमिकता देनी चाहिए थी , पर ऐसा नहीं हो पाया। पता नहीं , किन ग्रहों का प्रभाव इनपर चल रहा था कि ये मेरी ओर से न तो सांत्‍वना और न ही शुभकामना प्राप्‍त कर सके। किसी न किसी वजह से मैं अन्‍यों को जबाब देती गयी , जबकि दो चार महीने में एक एक मेल कर ये मुझे याद दिलाते रहें। परिकल्‍पना सम्‍मान के बाद इन्‍होने मुझे बधाई दी और फिर याद कराया कि 'आप मेरी जन्‍मकुंडली का अध्‍ययन कीजिए , मैं आपका शुल्‍क चुका दूंगा।'

पर बात शुल्‍क की थी ही नहीं , बात मेरे पास समय की कमी की थी , इसलिए उनका काम अबतक नहीं हो सका था। वास्‍तव में तीन वर्ष की निरंतर व्‍यस्‍तता के बाद 5 अगस्‍त से मैं बिल्‍कुल निश्चिंत हूं और मनमौजी ढंग से पुराने कार्यों को समेटने की दिशा में काम कर रही हूं। इसी क्रम में मुझे इनकी याद आ गयी , अपने सॉफ्टवेयर में इनका जन्‍म विवरण डाला , तो ये ग्राफ प्राप्‍त हुआ .......



जन्‍मकुंडली के हिसाब से जीवन में किसी भी बात की कमी नहीं होनी चाहिए , पर मानसिक अशांति बनी रहती है। किसी भी कार्यक्रम में भाई बंधु या सहयोगी की कमी के कारण आगे बढने में दिक्‍कत होती है इस काले और लाल ग्राफ से हम देख सकते हैं कि 1994 तक ये आरामदायक ढंग से जीवन यापन कर रहे थे , पर वहां से 2006 तक इनकी महत्‍वाकांक्षा और स्‍तर का ग्राफ काफी तेजी से आगे बढा , उस हिसाब से सफलता का ग्राफ नहीं। यही कारण है कि इन्‍होने जितनी मेहनत की और जितने बडे स्‍तर पर अपनी योजनाएं बनायी , उतने बडे स्‍तर पर इनके लक्ष्‍य की पूर्ति नहीं हो पायी।
  

पिता की सेवा का बढिया मौका मिलेगा , पर माताजी से संबंधित मामले बहुत गडबड रहेंगे।
2005 से तो थोडी बहुत कठिनाई चल ही रही थी , 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के‍ हिसाब से 2009 से शनि के ढैय्या इनके सम्‍मुख और मुसीबतें लेकर आयी। 2012 जुलाई के बाद शनि की ढैय्या समाप्‍त हो रही है , जो काफी राहत उपस्थित करनेवाली होगी। उसके बाद ही लंबित बहुत सारे काम एक दो वर्षों के अंदर बनेंगे , पारिवारिक जीवन भी उसके एक वर्ष बाद बहुत हद तक सुखद बनेगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी बढिया सफलता मिलेगी , समाज सेवा की दिशा में भी 2013 के बाद कदम बढेंगे। 

इससे पहले कुछ परेशानियां आती ही रहेंगी। 2013 से पूरा सुधार दिखेगा , वैसे तीन चार वर्ष के बाद ही पुन: परिस्थितियों से समझौता करते ही दिखेंगे , क्‍यूंकि हर वक्‍त महत्‍वाकांक्षा और मेहनत के हिसाब से कम ही मिल रहा है। यह बात अलग है कि पिछले तीन वर्षों से जितना झेलना पड रहा है , वैसी स्थिति आनेवाले दिनों में नहीं आएगी। क्रमश: सुधार होना चाहिए।

गणना करने के बाद जब उनसे बात हुई , तो उन्‍होने बताया कि 1963 या 1964 में से कोई भी वर्ष इनका जन्‍मवर्ष हो सकता है , पर इनके जीवन की घटनाएं 1963 के ग्रहों के हिसाब से मेल नहीं खायी , इसलिए मैने 1964 वाला जन्‍म विवरण ही लिया। इनके बेटे की जन्‍मकुंडली पर ध्‍यान दिया तो उसका भी बचपन ही कमजोर दिखा , बाकी वक्‍त वो बहुत ही स्‍वस्‍थ और सानंद रहेगा , जीवन में किसी बात की कमी नहीं दिखती , पर उसके मन मुताबिक माहौल उसके 12 वर्ष पूरे होने के बाद ही दिखेगा। तबतक छोटी मोटी परेशानी आती रहेगी।

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

..... बस यादें ही तो शेष रह जाती हैं हमारे पास !!!!

परसों शाम जैसे ही ब्‍लॉगर का डैशबोर्ड रिफ्रेश किया , अलबेला खत्री जी की एक पोस्‍ट के शीर्षक पर नजर गयी। भगवान करे यह सच न हो , झूठ हो , डॉ अमर कुमार जी जीवित ही हों , पढने के बाद इसे खोलने की हिम्‍मत ही नहीं हो रही थी। कांपते हाथो से इसपर क्लिक किया  , एक दूसरी पोस्‍ट भी पढी। घटना सच्‍ची ही है , भला कोई ऐसा मजाक करता है ??  न कभी मिलना जुलना , न कभी फोन या पत्र , बस एक दूसरे की पोस्‍ट और टिप्‍पणियों को पढते हुए ब्‍लोगरों के विचारों से रूबरू होने के कारण ऐसा लगता है , मानो हम एक कितने दिनों से एक दूसरे के परिचित हों। इस दौरान हमारे मध्‍य गलतफहमियां भी जन्‍म लेती हैं , पर उसका असर कितने दिन रह पाता है ?? वैसे शायद डॉ अमर कुमार जी को ज्‍योतिष में रूचि न हो , और ज्‍योतिष के सिवा दूसरे मुद्दों पर मैं अधिक लिखती नहीं , इसलिए किसी मुद्दे पर मेरा प्रत्‍यक्ष वाद विवाद उनसे नहीं रहा। पर उनके व्‍यक्तित्‍व से काफी प्रभावित रही , हालांकि उनसे मेरे परिचय की शुरूआत एक टिप्‍पणी को लेकर गलतफहमी से ही हुई।

तब ब्‍लॉग जगत में आए बहुत दिन नहीं हुए होंगे , समाज में फैले ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने की दिशा में छोटे मोटे लेख लिखने लगी थी। 16 फरवरी को प्रकाशित मेरे एक लेख नजर कब लगती है ?? को पढकर मसीजीवी जी के द्वारा की गई टिपपणी  क्‍या इस पोस्‍ट के आने का अर्थ माना जाया कि हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत पर नकारात्‍मक ग्रहों का प्रभाव हो गया है :) से मैं आहत हुई , अपने मनोभाव को व्‍यक्‍त करने के लिए मैने मसीजीवी जी की टिप्‍पणी के जबाब में एक पोस्‍ट लिख डाली। शीर्षक में ही मसीजीवी जी का नाम देखकर डा अमर कुमार जी मेरे ब्‍लॉग पर आए , पर उनकी नजर मेरे ब्‍लॉग के नीचे कोने पर रखे तिरंगे पर गयी और उन्‍होने पोस्‍ट पर ऐसी टिप्‍पणी की ....

बड़े हौसले से आया हूँ कि,
कुछ सार्थक बहस की ग़ुंज़ाईश हो..
पर, एक खेद व्यक्त करके लौट जा रहा हूँ
[ क्योंकि इससे अधिक और कर ही क्या सकता हूँ :) ]
इतने बुरे दिन भी नहीं आयें है, बहना
कृपया अपने राष्ट्रीय तिरंगे को नीचे कोने से उठा कर कहीं ऊपर सम्मानजनक स्थान दें ।
आप देशभक्त हैं, यह तो ज़ाहिर हो गया ।


उनके द्वारा दिया गया सुझाव तो मुझे पसंद आया , पर अंतिम पंक्तियों में छुपा व्‍यंग्‍य मुझे बहुत चुभा , पर मैने इसे सार्वजनिक नहीं किया और उन्‍हे ईमेल से ही जबाब भेजा ....

मुझे जो कोड मिला था.......वह मैने ज्‍यों का त्‍यों पेस्‍ट कर दिया....आप सही तरीके से भी हमें इस बात से आगाह कर सकते थे.........इसपर इतना व्‍यंग्‍य करने की आवश्‍यकता नहीं थी........झंडे को उपर डालने के बारे में मुझे जानकारी नहीं.......इसे हटा ही देती हूं.।

मैं तो इस बात को कुछ दिन बाद भूल गयी , पर वो इसे नहीं भूल सकें। कुश जी के टोस्‍ट विद टू होस्‍ट  में इंटरव्‍यू देते वक्‍त उन्‍होने इस बात की चर्चा कर ही दी .....

एक बार संगीता पुरी और मसिजीवी जी के बीच के कुछ कुछ हो गया .. देखने मैं भी पहुँच गया, टिप्पणी कर दी कि ब्लाग के निचले दायें कोने में पड़े तिरंगे को उचित सम्मान तो दीजिये, बहन जी..फिर, क्या हुआ होगा ? झुमका तो गिरना ही था । ज़ायज़ है भई, मैं देश के सम्मान का ठेकेदार न सही, पर भी तो नहीं ?भला बताओ, मैं कोई अमेरीकन हूँ क्या ? जो अपने झंडे का कच्छा बना लें, या ट्रेंडी नाइट गाऊन, उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता !


जब डॉ अमर कुमार जी सार्वजनिक कर ही चुके थे , तो मैं अपनी सफाई क्‍यूं न देती??  पर हमारे मध्‍य संवादहीनता नहीं रही , इस पोस्‍ट को पढकर उन्‍होने भी टिप्‍पणी की .....

व्यंग्य और तंज़ मेरे लेखन के स्तंभ हैं, इनको घुसने से कैसे रोका जा सकता है ?
जिस किसी ने भी यह कोड बनाया है, उसे position: no-repeat fixed right bottom; का विकल्प रखना ही नहीं था ।
position: no-repeat fixed top right ; करने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती !
अपने ’ देश ’ का मैंने ऎसा अपमान देखा है, कि अपने झंडॆ के प्रति सदिव ही संवेदी रहूँगा !
मुझे कोई खेद नहीं है !
क्योंकि वाकई यह बतंगड़ बनाने वाली बात ही नहीं है !
और मेरी मंशा ऎसी थी भी नहीं..


सचमुच उनकी मंशा ऐसी न थी , दो चार महीने बाद ही जब टिप्‍पणी करने वाली आदत को लेकर प्रवीण जाखड जी ने मुझपर व्‍यंग्‍य करता हुआ लेख लिखा , उन्‍होने आकर मेरे पक्ष में टिप्‍पणी की ....

आप क्यों आपना समय और मानसिक ऊर्ज़ा ज़ाखड़ पर बरबाद कर रही हैं ।
उनकी टैगलाइन ही उनके व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करती है ।
अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना उनकी आदत में है, या नहीं..
यह वह बेहतर बता सकते हैं । पर, जहाँ कोई न पहुँच रहा हो, वहाँ नवाँगतुकों का ऎसा रस्मी स्वागत कोई बुरी बात तो नहीं ?

उसके बाद नए वर्ष की पूर्व संध्‍या पर मैने उन्‍हें नववर्ष की शुभकामनाएं दी , 50 मिनट तक  तो मैं यही समझती रही कि वे मुझे जबाब नहीं देंगे , पर न सिर्फ उनका जबाब आया , उन्‍होने बीते वर्ष हुई गलतफहमी के लिए क्षमा भी मांगी ....


१०:३७ अपराह्न मुझे: आपके और आपके पूरे परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

50 मिनट
११:२८ अपराह्न अमर: धन्यवाद.. मेरी यही शुभेच्छायें आपके लिये भी है ।
बीते वर्ष में जो कुछ भूल चूक हुई हो क्षमा करेंगी !

११:२९ अपराह्न मुझे: जी
धन्‍यवाद

... और मैं इतना भी नहीं समझ पायी थी कि मैं उन्‍हे क्षमा करने लायक हूं भी नहीं !!!

अभी कुछ दिन पूर्व ही तो फेसबुक में उनका प्रोफाइल देखा था , जो उनकी खुशमिजाजी को बयान करता है।

नियोक्ता

महाविद्यालय

उच्च माध्यमिक

दर्शनशास्त्र

धार्मिक विचारमतलब परस्ती

राजनैतिक विचारयह क्यों पिट रहा है, भाई ?

पसन्दीदा वाक्यमुझे पढ़ लो, हज़ार कोटेशन पर भारी पडूँगा !


उन्‍होने ऑरकुट में मित्रता का अनुरोध भेजा , मैने उसे स्‍वीकार कर लिया । पर अभी कुछ दिन पूर्व फेसबुक में भेजा गया मेरा मित्र अनुरोध उनके पास लंबित ही रह गया। इस कारण उनके वॉल में मैं श्रद्धांजलि के दो शब्‍द भी नहीं लिख सकती।








'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में तो नहीं , यदा कदा 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में टिपपणी करते रहें। टिप्‍पणी में मॉडरेशन के विरूद्ध थे वे , मेरी एक पोस्‍ट एक लोकोक्ति का अर्थ स्‍पष्‍ट करें !!! पर लिखा था ......

comments must be approved by the blog author

फिर भी..
इसका भावार्थ यह होगा ।

माघ की आर्द्रा और इस समय की हथिया ( हस्तिका ) सबके लिये बराबर है, चाहे मेहमान हों या गृहस्थ सभी अपनी जगह ठप्प पड़ जाते हैं ।


उनके कडे शब्‍दों की वजह से अक्‍सर उन्‍हें लोग गलत समझ लेते थे , पर उनके कहने का वो मकसद नहीं होता था। ब्‍लॉग जगत के नए पन्‍ने पर तो अब हम उनकी टिप्‍पणियों का इंतजार ही करते रह जाएंगे। उन्‍हें याद रखने के लिए अब सिर्फ पुराने पन्‍ने ही तो उल्‍टे जा सकते हैं , क्‍यूंकि किसी के जाने के बाद बस यादें ही तो शेष रह जाती हैं हमारे पास !!!!


उन्‍हें हार्दिक नमन !!!!!

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

आखिर कृष्‍ण जी के इतने संतुलित बाल लीलाओं का राज क्‍या था ??

भले ही महाभारत की कहानी के कुछ अंश को लेखक की एक कपोल कल्‍पना मान लें , पर यह मेरी व्‍यक्तिगत राय है कि पूरे महाभारत की कहानी पर प्रश्‍न चिन्‍ह नहीं लगाया जा सकता है। लोग भगवान कृष्ण को एक कथा या एक कहानी मान सकते हैं , पर ग्रंथो में उल्लिखित उनकी जन्‍मकुंडली एक ऐसा सत्‍य है , जो उनके साक्षात पृथ्‍वी पर जन्‍म लेने की कहानी कहता है। सिर्फ जन्‍म ही नहीं , उन्‍‍होने पूर्ण तौर पर मानव जीवन जीया है। इनके अनेक रूप हैं और हर रूप की लीला अद्भुत है। भले ही लोग उन्‍हें ईश्वर का अवतार कहते हों , पर बाल्‍यावस्‍था में उन्‍होने सामान्‍य बालक सा जीवन जीया है । कभी मां से बचने के लिए मैया मैंने माखन नहीं खाया , तो कभी मां से पूछते हैं , राधा इतनी गोरी क्यों है, मैं क्यों काला हूं? , कभी शिकायत करते हैं कि दाऊ क्यों कहते हैं कि तू मेरी मां नहीं है।

कृष्ण भक्ति में डूबे उनकी बाल लीलाओं का वर्णन करने वाले कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। पर भले ही सूरदास ने कृष्ण के बाल्य-रूप का सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन करने में अपनी कल्पना और प्रतिभा का कुछ सहारा लिया हो , पर कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली से स्‍पष्‍ट है कि वास्‍तव में उनका बालपन बहुत ही संतुलित रहा होगा । इसमें शक नहीं की जा सकती कि बालपन में ही एक एक घटनाओं पर उनकी दृष्टि बहुत ही गंभीर रही होगी। और बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टाएं पीढी दर पीढी चलती हुई सूरदास की पीढी तक पहुंच गयी होगी। भले ही उसके चित्रण में सूरदास ने अपनी कला का परिचय दे दिया हो।

ये रही कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली ........


'लग्‍नचंदायोग' की चर्चा करते हुए 9 फरवरी 2010 को प्रकाशित लेख में मैने लिखा था कि ज्‍योतिष में आसमान के बारहों राशियों में से जिसका उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता रहता है , उसे बालक का लग्‍न कहते हैं। अब इसी लग्‍न में यानि उदित होती राशि में चंद्रमा की स्थिति हो , तो बालक की 'जन्‍मकुंडली' में लग्‍नचंदायोग बन जाता है , जिसे ही क्षेत्रीय भाषा में 'लगनचंदा योग' कहते हैं। कृष्‍ण जी की कुंडली में 'लग्‍नचंदा योग स्‍पष्‍ट दिख रहा है , जो कृष्‍ण जी के बचपन को महत्‍वपूर्ण बनाने के लिए काफी है।

 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी देते हुए लिखे गए अपने एक लेख में चंद्रमा की कमजोरी और मजबूती की चर्चा करने के क्रम में मैने लिखा है यदि चंद्रमा की स्थिति सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री, या 270 डिग्री दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत और यदि 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। चूंकि कृष्‍ण जी ने अष्‍टमी के दिन जन्‍म लिया , जब सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य कोणिक दूरी 90 डिग्री की होती है , इसलिए उनके जन्‍मकालीन चंद्रमा को 50 प्रतिशत अंक प्राप्‍त होते हैं। 

इसी लेख में मैने आगे लिखा है कि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास संतुलित ढंग से होता है। इस नियम से कृष्‍ण जी का मनोवैज्ञानिक विकास बहुत ही संतुलित ढंग से होना चाहिए। 

अब यदि भाव यानि संदर्भ की की बात की जाए , तो  14 नवंबर 2008 में ही प्रकाशित इस लेख में मैने बताया था कि वृष लग्‍न लग्‍न में मजबूत चांद में बच्‍चे का जन्‍म हो , तो बच्‍चों का भाई बहन , बंधु बांधव के साथ अच्‍छा संबंध होता है। बाल सखाओं के साथ्‍ा मीठी मीठी हरकतों के कारण कृष्‍ण जी का बचपन यादगार बना रहा। यहां तक कि बाल सखा सुदामा को जीवनपर्यंत नहीं भूल सके। 

इसके अतिरिक्‍त 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से एक और ग्रहीय स्थिति बनती है , जिसका उल्‍लेख भी मैने 'लग्‍नचंदा योग' वाले लेख में कर चुकी हूं। 'लग्‍नचंदा योग' के साथ यदि षष्‍ठ भाव में अधिकांश ग्रहों की स्थिति हो तो इस योग का प्रभाव और अधिक पडता है। कृष्‍ण जी के षष्‍ठ भाव में शुक्र और शनि दोनो ही ग्रहों की मजबूत स्थिति से कृष्‍ण जी के बचपन को महत्‍वपूर्ण बनाती है। इसके अलावे जिस ग्रह की पहली राशि में चंद्रमा स्थित है , उसी ग्रह की दूसरी राशि में शुक्र और शनि की स्थिति होने के कारण जीवन में झंझट भी आए और उन्‍होने उनका समाधान भी किया। शुक्र और शनि क्रमश: शरीर , व्‍यक्तित्‍व , प्रभाव , भाग्‍य और प्रतिष्‍ठा के मामले थे और ये सब बचपन में मजबूत बने रहें। यही था कृष्‍ण की संतुलित बाल लीलाओं का राज !!

सोमवार, 22 अगस्त 2011

हिंदी ब्‍लॉग जगत के लेखकों और पाठकों को जन्‍माष्‍टमी की ढेरो शुभकामनाएं !!!!





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मंगल के बुरे प्रभाव के दौर में अभी बहुत सारे युवा हैं ..... संगीता पुरी

20 अगस्‍त को प्रकाशित अपने लेख में मैने बताया कि कुछ दिनों के अंदर 7 मार्च से 27 अप्रैल 1982 , 22 अप्रैल से 6 जून 1984 और 25 जून से 29 जुलाई 1986 के मध्‍य जन्‍म लेनेवाले जातकों की जन्‍मकुंडलियां मुझे बहुत मिली हैं , क्‍यूंकि ये मंगल के सर्वाधिक प्रभाव वाले उम्र में यानि 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र का जीवन व्‍यतीत कर रहे हैं। 18 वर्ष की उम्र के बाद से ही इनके जीवन में कुछ कठिनाइयां आनी शुरू हो गयी है और 24 वर्ष के बाद अपने जीवन जीने के ढंग को परिवर्तित करने के बाद भी इन्‍हें अपने कदम सफलता की ओर बढते नहीं दिखाई दे रहे हैं। इसलिए ये परेशान है और मुझसे सलाह लेने को बाध्‍य भी। इनकी समस्‍याओं की वजह मंगल है और इस कारण स्‍थायी तौर पर इनकी समस्‍याएं 30 वर्ष के बाद हल्‍के और 36 वर्ष की उम्र के बाद स्‍थायी तौर पर समाप्‍त हो सकेंगी।

यही नही , कुछ खास स्थिति में इसके आसपास जन्‍म लेने वालों को भी लगभग इस दौरान समस्‍याओं का सामना करना पड रहा है। हाल फिलहाल में एक जन्‍मविवरण मुझे यह मिला .....


जन्मतिथि - 14 मई 1986 
जन्मसमय - बुधवार सांयकाल 5.25 
जन्मस्थान - दिल्ली 

जब मैने इस जन्‍म विवरण को अपने सॉफ्टवेयर में डाला , तो ये ग्राफ मिला ....


जैसा कि इस ग्राफ से ही स्‍पष्‍ट है , जीवन ग्राफ 18 वर्ष की उम्र तक यानि 2004 तक सुखद परिस्थिति में जीवन यापन के बाद वहां से नीचे की ओर मुड गया है। इसी कारण वहां से कई प्रकार की बाधाएं शुरू हो गयी होंगी। खासकर पढाई लिखाई के मामलों में बारंबार बाधाएं आ रही होंगी। स्‍थायित्‍व का अभाव दिख रहा होगा। 2010 के बाद महत्‍वाकांक्षा बढी , बडे स्‍तर पर कुछ काम भी किया गया , जीवनशैली में कुछ परिवर्तन तो देखने को मिला , पर रोजगार की समस्‍या आ रही होगी। वैवाहिक मामलों की कठिनाई भी आनेवाले समय में दिखती है।

जैसा कि ग्राफ से स्‍पष्‍ट है 2016 तक कई प्रकार की बाधाओं के कारण जीवन मनोनुकूल नहीं रह पाएगा , अभी आनेवाले दो महीने भी कई दृष्टि से निराशाजनक दिखते हैं , पर ऐसा नहीं है कि जीवन में कभी कभी खुशियां नहीं दिखेंगी। गोचर के ग्रहों के मनोनुकूल होने से कभी कभी सुखद वातावरण बनेगा। चूंकि स्‍पष्‍ट तौर पर और कोई सवाल नहीं किए गए हैं , इसलिए छोटी छोटी समयावधि का उल्‍लेख करना कठिन है , पर बडे रूप में ग्रहों का साथ 2016 के बाद या अधिक स्‍पष्‍ट तौर पर 2022 के बाद ही मिलना आरंभ होगा।
अब दूसरे एक चार्ट पर नजर डालते हैं ......


इस चार्ट से स्‍पष्‍ट है कि इन्‍हें सबसे अधिक ऊर्जा भाग्‍य , खर्च करने की शक्ति और बाहरी संदर्भों से मिलती है , जबकि सबसे कम ऊर्जा विद्या , बुद्धि और ज्ञान के वातावरण से। स्‍पष्‍ट है कि पढाई लिखाई के वातावरण मे जितनी बाधाएं आयी , जीवनभर खर्च करने में तो नहीं आएंगी। इसलिए 2016 के बाद तेज गति से माहौल बदलेगा। मेरी शुभकामनाएं हमेशा इसके साथ होगी ......

रविवार, 21 अगस्त 2011

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' पर आधारित पुस्‍तकों की उपलब्‍धता .... संगीता पुरी

विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में मेरे और पिताजी के लेखों को देखते हुए 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को जानने की इच्‍छा रखने वाले अनेक पाठकों के पत्र मुझे मिलते रहे हैं। उनकी इच्‍छा को ध्‍यान में रखते हुए 1991 से ही विभिन्‍न ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में मेरे आलेख प्रकाशित होने शुरू हो गए और दिसंबर 1996 मे ही मेरी पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: ग्रहों का प्रभाव’ प्रकाशित होकर आ गयी थी । पर मेरे द्वारा पत्र पत्रिकाओं में ज्‍योतिष से संबंधित जितने भी लेख छपे , वो सामान्‍य पाठकों के लिए न होकर ज्‍योतिषियों के लिए थे। यहां तक कि मेरी पुस्‍तक भी उन पाठकों के लिए थी ,जो पहले से ज्‍योतिष का ज्ञान रखते थे। इसे पाठकों का इतना समर्थन प्राप्‍त हुआ था कि प्रकाशक को शीघ्र ही 1999 में इसका दूसरा संस्‍करण प्रकाशित करना पडा।

कुछ वर्ष पूर्व ही प्रकाशक महोदय का पत्र तीसरे संस्‍करण के लिए भी मिला था , जिसकी स्‍वीकृति मैने उन्‍हें नहीं दी थी। इसलिए छह महीने पूर्व तक यत्र तत्र बाजार में मेरी पुस्‍तकें उपलब्‍ध थी , पर इधर बाजार में मेरी पुस्‍तक नहीं मिल रही है। इसलिए आम पाठकों को यह जानकारी दे दूं कि मेरे पास इस पुस्‍तक की प्रतियां उपलब्‍ध हैं ...





150 पृष्‍ठों वाली बाजार में आयी मेरी इस पुस्‍तक को पढने के बाद बहुत पाठकों की ओर से बहुत अच्‍छी प्रतिक्रियाएं आयी। सबों का प्रस्‍तुतिकरण मुश्किल है , दो प्रतिक्रियाओं का पत्र आपके सम्‍मुख हैं ......









इसके अलावे हमारी एक और पुस्‍तक प्रकाशित हो चुकी है......



हर घर में रखने और पढने लायक इस पुस्‍तक ‘फलित ज्‍योतिष कितना सच कितना झूठ’ के लेखक श्री विद्या सागर महथा जी हैं। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ को स्‍थापित करने का पूरा श्रेय अपने माता पिता को देते हुए ये लिखते हैं, ‘‘मेरी माताजी सदैव भाग्य और भगवान पर भरोसा करती थी। मेरे पिताजी निडर और न्यायप्रिय थे। दोनों के व्यक्तित्व का संयुक्त प्रभाव मुझपर पड़ा।’’ ज्‍योतिष के प्रति पूर्ण विश्‍वास रखते हुए भी इन्‍होने प्रस्‍तावना या भूमिका लिखने के क्रम में उन सैकडों कमजोर मुद्दों को एक साथ उठाया है, जो विवादास्‍पद हैं , जैसे ‘‘ज्योतिष और अन्य विधाएं परंपरागत ढंग से जिन रहस्यों का उद्घाटन करते हैं, उनके कुछ अंश सत्य तो कुछ भ्रमित करनेवाली पहेली जैसे होते हैं।’’ इस पुस्‍तक के लिए परम दार्शनिक गोंडलगच्‍छ शिरोमणी श्री श्री जयंत मुनिजी महाराज के मंगल संदेश ‘‘यह महाग्रंथ व्यापक होकर विश्व को एक सही संदेश दे सके ऐसा ईश्वर के चरणों में प्रार्थना करके हम पुनः आशीर्वाद प्रदान कर रहे है।’’ को प्रकाशित करने के साथ साथ ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के कुछ प्रेमियों के आर्शीवचन, प्रोत्‍साहन और प्रशंसा के पत्रों को भी ससम्‍मान स्‍थान दिया गया है। 

ज्‍योतिष विशेषज्ञों के साथ ही साथ आम पाठकों के लिए भी पठनीय श्री विद्या सागर महथा जी की यह पुस्‍तक ‘फलित ज्‍योतिष सच या झूठ’ आस्‍थावान लोगों के लिए आस्‍था से विज्ञान तक का सफर तय करवाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोणवालों के लिए तो इसके हर पाठ में विज्ञान ही है। समाज में मौजूद हर तरह के भ्रमों और तथ्‍यों की चर्चा करते हुए इन्‍हें 31 शीर्षकों के अंतर्गत 208 पन्‍नों और 72228 शब्‍दों में बिल्‍कुल सरल भाषा में लखा गया है। राहु और केतु को ग्रह न मानते हुए चंद्र से शनि तक के आसमान के 7 ग्रहों के 21 प्रकार की स्थिति और उसके फलाफल को चित्र द्वारा समझाया गया है, ताकि इस पुस्‍तक को समझने के लिए ज्‍योतिषीय ज्ञान की आवश्‍यकता न पडे।

चाहे समाज में प्रचलित ‘वार’ से फलित कथन हो या यात्रा करने का योग, शकुन, मुहूर्त्‍त हो या नजर का असर जैसे अंधविश्‍वास हो, इस पुस्‍तक में इन्‍होने जमकर चोट की है ... ‘‘मैने मंगलवार का दिन इसलिए चयन किया क्योंकि इस दिन अंधविश्वास के चक्कर में पड़ने से लोगों की भीड़ तुम्हारे पास नहीं होती और इसलिए तुम फुर्सत में होते हो।’’
हस्‍तरेखा, हस्‍ताक्षर विज्ञान, न्‍यूमरोलोजी, वास्‍तुशास्‍त्र, प्रश्‍नकुंडली जैसी विधाएं ज्‍योतिष के समानांतर नहीं हो सकती ........ ‘‘वास्तुशास्त्र में उल्लिखित सभी नियमों या सूत्रों का प्रतिपादन जिस काल में हुआ था, उस काल के लिए वे प्रासंगिक थे’
राहु, केतु, कुंडली मेलापक, राजयोग और विंशोत्‍तरी पद्धति जैसे सभी अवैज्ञानिक तथ्‍यों का इस पुस्‍तक में विरोध किया गया है ....
‘‘अधिकांश राजयोगों की गाणितिक व्याख्या के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इस प्रकार के योग बहुत सारे कुंडलियों में भरे पड़े हैं, जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं है।’’
इन्‍होने इस पुस्‍तक में अपनी खोज ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति’ का परिचय आसमान की विभिन्‍न स्थिति के ग्रहों के सापेक्ष चित्र बनाकर समझाया है .... ‘‘हम सभी यह जानते हैं कि बाल्यावस्था या शैशवकाल कुल मिलाकर भोलेपन का काल होता है और उसके भोलेपन का कारण निश्चित रुप से चंद्रमा होता है।’’
वास्‍तव में, बुरे ग्रहों का प्रभाव क्‍या है, कैसे पडता है हमपर , ज्‍योतिष के महत्‍व की चर्चा करते हुए ये लिखते हैं ....‘‘प्रकृति के नियमों के अनुसार ही हमारे शरीर, मन और मस्तिष्क में विद्युत तरंगें बदलती रहती है और इसी के अनुरुप परिवेश में सुख-दुःख, संयोग-वियोग सब होता रहता है।‘’
अंत में ज्‍योतिष का आध्‍यात्‍म से क्‍या संबंध है , इसकी विवेचना की गयी है ....‘‘परम शक्ति का बोध ही परमानंद है। जो लोग बुरे समय की महज अग्रिम जानकारी को आत्मविश्वास की हानि के रुप में लेते हैं, वे अप्रत्याशित रुप से प्रतिकूल घटना के उपस्थित हो जाने पर अपना संतुलन कैसे बना पाते होंगे ? यह सोचनेवाली बात है।

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