गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

भाग्‍य बडा या कर्म ?????

भाग्‍य बडा या कर्म .. इस बात पर अबतक सर्वसम्‍मति का अभाव है। दोनो पक्ष के लोग अपनी अपनी बातों को सही साबित करने के लिए अलग अलग तर्क दिया करते हैं , अलग अलग कहानियां गढा करते हैं। कर्म को मानने वाले लोगों का मत है कि हम जैसे कर्म करते हैं , वैसा ही फल मिलता है। असफलता स्थिति में हमें अपने भीतर झांकना चाहिए कि चूक कहां हुई। लेकिन हम धागे, टोने-टोटकों , माथे या हाथों की लकीरों और जन्‍मकुंडलियों से भाग्य को समझने की कोशिश करते हैं, यदि कर्म अच्छे हैं तो भाग्य अपने आप अच्छा हो ही जाएगा। इस दुनिया राजा से रंक और रंक से राजा बनने के कहानियों की कोई कमी नहीं।

दूसरी ओर भाग्‍य को मानने वाले लोगों का कहना है कि क्यों कुछ बच्‍चे मजबूत शरीर और कुछ कई बीमारियों के साथ या बिना हाथ पांव के जन्‍म लेते हैं। क्‍यूं कुछ बच्‍चे सुख सुविधा संपन्न परिवारों में तो कुछ का जन्‍म दरिद्रों के घर में होता है। कुछ अच्‍छे आई क्‍यू के साथ जन्‍म लेते हैं , तो कुछ अविकसित मस्तिष्‍क के साथ ही इस दुनिया में कदम रखते हैं। कुछ का पालन पोषण माता पिता और परिवार जनों के भरपूर लाड प्‍यार में होता है , तो कुछ इससे वंचित रह जाते हैं। जबकि इन बच्‍चों ने कोई गल्‍ती नहीं की है। इसी प्रकार बडे होने के बाद किसी को मनोनुकूल जीवनसाथी मिलते हैं,तो विवाह के बाद किसी का जीवन नर्क हो जाता है। किसी को अनायास संतान का सुख मिलता है , तो कई जीवनभर डॉक्‍टरों और देवी देवताओं के चक्‍कर काटते हैं। सचमुच विपरीत पक्ष वालों के लिए इसका जबाब दे पाना कठिन है।

वास्‍तव में कार्य कारण के नियमों से पूरी प्रकृति भरी पडी है। इतनी बडी प्रकृति में हमने कोई भी काम बिना नियम के होते नहीं देखा है। सूर्य अपने पथ पर तो बाकी ग्रह उपग्रह भी अपने पथ पर चल रहे हैं। पृथ्‍वी पर स्थित एक एक जड चेतन अपने अपने स्‍वभाव के हिसाब से काम कर रहे हैं। हम जैसा कर्म करेंगे , वैसा फल मिलेगा ही । बिना संतुलन के दौडेंगे , तो गिरेंगे , गिरेंगे तो चोट लगेगी। यदि कार्य और कारण का संबंध न हो तो हम कोई नियम स्‍थापित नहीं कर सकते। पर बालक ने जन्‍म लेते साथ जो पाया , वह उसके कर्म का फल नहीं। पर यहां भी तो कोई नियम काम करना चाहिए , आज विज्ञान माने या न माने , पर यह फल बिना किसी नियम के उसे नहीं मिल सकता।

जबतक कर्म से अधिक फल की प्राप्ति होती रहती है , कोई भी भाग्‍य की ताकत को स्‍वीकार नहीं करता। उसे महसूस होता है कि उसे उसके किए का ही फल मिल रहा है। जिन्‍हें फल नहीं मिल रहा , वे कर्म ही सही नहीं कर रहें। पर जब कर्म की तुलना में प्रतिफल नहीं मिल पाता , लोग भाग्‍य की ताकत को महसूस करने लगते हैं। अपने आरंभिक जीवन में सफल रहनेवाले लोग इसे स्‍वीकार नहीं कर पाते , पर जैसे ही उनके जीवन में भी बिना किसी बुरे कर्म के विपत्तियां दिखाई पडती हैं , उन्‍हें भी भाग्‍य की ताकत महसूस होने लगती है। जीवन के प्रारंभिक दौर में असफलता प्राप्‍त करने वाले लोग तो जीवन में संतुलन बना भी लेते हैं , बाद में 
भाग्‍य के कारण  असफलता प्राप्‍त करने वालों को अधिक कष्‍ट होता है।

भाग्‍य को जानने के लिए अक्‍सर लोग ज्‍योतिषियों से संपर्क करते हैं , पर प्रारब्‍ध की जानकारी ज्‍योतिषियों को भी नहीं होती। भिन्‍न भिन्‍न स्‍तर वाले परिवार में भी बच्‍चे का जन्‍म एक समय में हो सकता है यानि एक जन्‍म कुंडली होते हुए भी बच्‍चे का भाग्‍य अलग अलग हो सकता है। नक्षत्रों और ग्रहों पर आधारित ज्‍योतिष मात्र काल गणना का विज्ञान है। जिस तरह घडी के समय के आधार पर अंधरे उजाले को देखते हुए दिनभर के और कैलेण्‍डर के आधार पर जाडे , गर्मी , बरसात के मौसम को समझते हुए वर्षभर के कार्यक्रमों को अंजाम दिया जाता है , उसी प्रकार हम जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर अपने जीवन के उतार चढाव को समझकर तदनुरूप कार्यक्रम बना सकते हैं। जीवन में कभी समय आपके अनुकूल होता है तो कभी प्रतिकूल , प्रतिकूल समय में आपके अनुभव बढते हैं , जबकि अनुकूल समय में आपको अच्‍छे परिणाम मिलते हैं। अच्‍छे वक्‍त की जानकारी से आपका उत्‍साह, तो बुरे वक्‍त की जानकारी से आपका धैर्य बढता है।

किसी खास परिवार , देश या माहौल में जन्‍म लेना तो मनुष्‍य के वश में नहीं , इसलिए जीवन में जैसी जैसी परिस्थिति मिलती जाए , उसे स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी है , पर आशावादी सोंच के साथ अच्छे कर्म किए जा सकते हैं और उनके सहारे अपने भाग्‍य को मजबूत बनाया जा सकता है। महीने के पहली तारीख को मिले तनख्‍वाह को कम या अधिक करना आपके वश में नहीं , पर उससे पूरे महीने या पूरे जीवन अच्‍छे या बुरे तरीके से जीवन निर्वाह करना आपके वश में है। आप पहले ही दिन महीनेभर क्‍या भविष्‍य के भी कार्यक्रम बनाकर नियोजित ढंग से खर्च कर सकते हैं या बाजार में अंधाधुंध खरीदारी कर , शराब पीकर , जुआ खेलकर महीने या भविष्‍य के बाकी दिनों को बुरा बना सकते हैं। इसलिए किसी खास परिस्थिति में होते हुए भी कर्म के महत्‍व से इंकार नहीं किया जा सकता।

हां , जीवन में कभी कभी ऐसा समय भी आता है ,जब भाग्‍य के साथ देने से मित्रों , समाज या कानून का कुछ खास सहयोग आपको मिलने लगता है ,किसी तरह के संयोग से आपके काम बनने लगते हैं , तो कभी दुर्भाग्‍य से असामाजिक तत्‍वों को भी आपको झेलना पडता है। 100 वर्ष की लंबी आयु में कभी दस बीस वर्षों तक ग्रहों का खास अच्‍छा या बुरा प्रभाव हमपर पड सकता है। उस भाग्य या दुर्भाग्य से खुद को फायदा दिलाने के लिए हमें आक्रामक या सुरक्षात्‍मक ढंग से जीवन जीना चाहिए। जैसे जाडे की सूरज की गर्मी को सेंककर हम खुद को गर्म रखते हैं या गर्मी की दोपहर के सूरज की ताप में बचने के किसी पेड़ की छाया में या वातानुकूलित घर में शरण लेते हैं।

पर ध्‍यान रखें , जीवन में कभी भी हमारा मेहनत विफल नहीं होता । प्रकृति में प्रत्‍येक वस्‍तु का महत्‍व है , किसी में कुछ गुण हैं ,उसे विकसित करने की दिशा में कदम बढाए , आज या कल , उसकी कद्र होगी ही। कोई बीज तीन चार महीने में तो कोई दस बीस वर्ष में फल देना आरंभ करता है। हर पशु पक्षी का भी हर काम का अलग अलग समय है। देखने में एक जैसे होते हुए भी हर मनुष्‍य अलग अलग तरह के बीज हैं , इन्‍हें फलीभूत होने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है । आसमान में गोचर के ग्रह मनुष्‍य के सम्‍मुख विभिन्‍न परिस्थितियों का निर्माण करते हैं , जिसके आधार पर कर्म का सुंदर फल प्राप्‍त होता है। लोग भले ही इसे भाग्‍य का नाम दें , पर वह हमारे सतत कर्म का ही फल होता है।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

सच्‍चा जीवनसाथी [कहानी] - संगीता पुरी

साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित मेरे द्वारा लिखी कुछ कहानियों में आपके लिए एक और कहानी .....शाम के 4 बज चुके हैं , दिन भर काम करने के कारण थकान से शरीर टूट रहा है , इसके बावजूद टेबल पर फाइलों का अंबार लगा है। पिछले एक सप्‍ताह से दो चार छह फाइले छोडकर समय पर घर चले जाने से समस्‍या बढती हुई इस हालात तक पहुंच गयी है। यदि एक एक घंटे बढाकर काम न किया जाए तो फाइलों का यह ढेर समाप्‍त न हो सकेगा। सोंचकर मैने चपरासी को एक कप चाय के लिए आवाज लगायी और फाइले उलटने लगा। अब इस उम्र में कार्य का इतना दबाब शरीर थोडे ही बर्दाश्‍त कर सकता है , वो भी जिंदगी खुशहाल हो तो कुछ हद तक चलाया भी जा सकता है , पर साथ में पारिवारिक तनाव हों तो शरीर के साथ मन भी जबाब दे जाता है। चाय की चुस्‍की के साथ काम समाप्‍त करने के लिए मन को मजबूत बनाया।

किंतु ये फोन की घंटी काम करने दे तब तो। ऑफिस के नंबर पर भैया का फोन ,मैं चौंक पडा। ‘मुझे मालूम था , तुम ऑफिस में ही होगे। हमलोग एक जरूरी काम से दिल्‍ली आए हैं , तुम्‍हारे घर के लिए टैक्‍सी कर चुके हैं। तुम भी जल्‍द घर पहुंचो’
’क्‍यूं भैया, अचानक, कोई खास बात हो गयी क्‍या ?’ मेरी उत्‍सुकता बढ गयी थी।
’हां खास ही समझो, जॉली, हैप्‍पी और मेघना आ रहे थे, हैप्‍पी के विवाह के लिए लडकी देखने। मुझे भी साथ ले लिया , अब होटल में रहने से तो अच्‍छा है , तुम्‍हारे यहां रहा जाए’ साधिकार उन्‍होने कहा।
‘जी , आपलोग जल्‍द घर पहुंचिए , मैं भी पहुंच रहा हूं।‘ ऑफिस के फाइलों को पुन: कल पर छोडकर मैं तेजी से घर की ओर चल पडा।

भैया आ रहे थे , मेरे नहीं मानसी के , पर मेरे अपने भैया से भी बढकर थे। जिंदगी के हर मोड पर उन्‍होने मुझे अच्‍छी सलाह दी थी। उम्र में काफी बडे होने के कारण वे हमें बेटे की तरह मानते थे। उनके साले के लडके जॉली का परिचय भी हमारे लिए नया नहीं था। भैया ने हमारी श्रेया के जीवनसाथी के रूप में जॉली की ही कल्‍पना की थी। जॉली को भी श्रेया बहुत पसंद थी। श्रेया का रंग सांवला था तो क्‍या हुआ चेहरे का आत्‍मविश्‍वास , आंखों की चमक और बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व किसी को भी खुश कर सकता था। स्‍कूल कॉलेज के जीवन में मिले सैकडों प्रमाण पत्र और मेडल इसके साक्षी थे। एक चुम्‍बकीय व्‍यक्तित्‍व था उसमें , जो बरबस किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। श्रेया को भी जॉली पसंद था , पर एक पंडित के कहने पर हमने उसकी सगाई भी न होने दी थी। उक्‍त ज्‍योतिषी का कहना था कि जॉली की जन्‍मकुंडली में वैवाहिक सुख की कमी है , विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसकी पत्‍नी स्‍वर्ग सिधार जाएगी। इसी भय से हमने जॉली और श्रेया को एक दूसरे से अलग कर दिया था। मेघना से विवाह हुए जॉली के चार वर्ष व्‍यतीत हो गए। एक बेटा भी है उन्‍हें , सबकुछ सामान्‍य चल रहा है उनका , उक्‍त ज्‍योतिषी पर मुझे एक बार फिर से क्रोध आया।

इस रिश्‍ते को तोडने के बाद हमारे परिवार को खुशी कहां नसीब हुई। कहां कहां नहीं भटका मैं श्रेया के लिए लडके की खोज में , पर लडकेवालों की गोरी चमडी की भूख ने मुझे कहीं भी टिकने नहीं दिया। तीन चार वर्षों की असफलता ने मुझे तोडकर रख दिया था। रवि से विवाह करते वक्‍त मैने थोडा समझौता ही किया था , इससे इंकार नहीं किया जा सकता , पर आगे चलकर यह रिश्‍ता इतना कष्‍टकर हो जाएगा , इसकी भी मैने कल्‍पना नहीं की थी। रवि बहुत ही लालची लडका था, वो किसी का सच्‍चा जीवनसाथी नहीं बन सकता था। अपना उल्‍लू सीधा करने के लिए मेरे साथ अपना व्‍यवहार अच्‍छा रखता , पर आरंभ से ही श्रेया के साथ उसका व्‍यवहार अच्‍छा नहीं रहा। समाज के भय से मैने श्रेया को समझा बुझाकर ससुराल में रहने के लिए भेज तो दिया , पर वह वहां एक महीने भी टिक न सकी।

एक दिन सुबह सुबह घंटी बजने पर दरवाजा खोलते ही श्रेया ने घर में प्रवेश किया , काला पडा चेहरा , कृशकाय शरीर , आंखों के नीचे पडे गड्ढे , बिखरे बाल और रोनी सूरत उसकी हालत बयान् कर रहे थे। बेचारी ने ससुरालवालों का जितना अन्‍याय सही था , उसका एक प्रतिशत भी हमें नहीं बताया था। श्रेया मुझसे लिपटकर रोने लगी , तो मेरी आंखों में भी आंसू आ गए। न संतान के सुखों से बढकर कोई सुख है और न उनके कष्‍टों से बढकर कोई कष्‍ट। ‘अब मैं वहां वापस कभी नहीं जाऊंगी पापा’ वह फट पडी थी।
‘क्‍या हुआ बेटे’ सब जानते और समझते हुए भी मैं पूछ रहा था। मानसी भी अब बाहर के कमरे में आ चुकी थी।
‘पापा, वे लोग मुझे बहुत तंग करते हैं , बात बात में डांट फटकार , न तो चैन से जीने देते हैं और न मरने ही। सारा दिन काम में जुते रहो , सबकी चाकरी करो , फिर भी परेशान करते हैं , लोग तो नौकरों से भी इतना बुरा व्‍यवहार नहीं करते’ उसने रोते हुए कहा।

’मैं समझ रहा हूं बेटे , तुम्‍हारी कोई गल्‍ती नहीं हो सकती। तुम तो बहुत समझदार हो , इतने दिन निभाने की कोशिश की , लेकिन वे लोग तुम्‍हारे लायक नहीं। तुम पढी लिखी समझदार हो , अपने पैरों पर खडी हो सकती हो , दूसरे का अन्‍याय सहने की तुझे कोई जरूरत नहीं।‘ मैंने उसका साथ देते हुए कहा।
’उनलोगों ने सिर्फ लालच में यहां शादी की है, ताकि समय समय पर पूंजी के बहाने एक मोटी रकम आपसे वसूल कर सके। मुझसे नौकरी करवाकर मेरे तनख्‍वाह का भी मालिक बन सके , और घर में एक मुफ्त का नौकर भी। मेरे कुछ कहने पर कहते हैं कि तेरे पापा ने अपनी काली कलूटी बेटी हमारे मत्‍थे यूं ही मढ दी , कुछ दिया भी नहीं’
’छोडो बेटे , तुम फ्रेश हो जाओ , नई जिंदगी शुरू करो , पुरानी बीती बातों को भूलना ही अच्‍छा है। मैं अब फिर तुम्‍हें उस घर में वापस नहीं भेजूंगा’

कहने को तो कितनी आसानी से कह गया था, पर भूलना क्‍या इतना आसान है ? एक परित्‍यक्‍ता को अपनी जिंदगी ढोने में समाज में कितनी मुसीबतें होती हैं , इससे अनजान तो नहीं था मैं। इन दो वर्षों में ही श्रेया की चहकती हंसी न जाने कहां खो गयी है , चेहरे का सारा रस निचोड दिया गया लगता है , आंखों की चमक गायब है , सारा आत्‍मविश्‍वास समाप्‍त हो गया है , बात बात पर उसके आंखों से आंसू गिर पडते हैं , उसकी हालत इतनी खराब है कि कोई पुराने परिचित उसे पहचान तक नहीं पाते।

एक मिष्‍टान्‍न भंडार के पास मैने गाडी खडी कर दी , पता नहीं घर में व्‍यवस्‍था हो न हो। मिठाई , दही और पनीर लेकर पुन:गाडी को स्‍टार्ट किया। हमने जॉली के छोटे भाई हैप्‍पी से श्रेया के विवाह की इच्‍छा अवश्‍य प्रकट की थी , पर वहां उनलोगों ने ही इंकार कर दिया था। जॉली और हैप्‍पी दोनो का विवाह हमारे ही रिश्‍तेदारी में हुआ था , पर कुछ दिनों बाद एक दुर्घटना में हैप्‍पी ने अपनी पत्‍नी रश्मि को खो दिया था। छह माह के पुत्र को हैप्‍पी के पास निशानी के तौर पर छोडकर वह चल बसी थी। कुछ दिन तो हैप्‍पी दूसरी विवाह के लिए ना ना करता रहा , पर बच्‍चे के सही लालन पालन के लिए अब तैयार हो गया था।

घर पहुंचकर मानसी को खुशखबरी सुनाया , भैया आनेवाले थे , उसकी खुशी का ठिकाना न था। वह तुरंत उनके स्‍वागत सत्‍कार की तैयारी में लग गयी। थोडी ही देर में सारे मेहमान पहुंच गए , बातचीत में शाम कैसे कटी , पता भी न चला। श्रेया के बारे में भी उन्‍हें हर बात का पता चल चुका था। कल शाम को हैप्‍पी के लिए लडकी देखने जाना था। हैप्‍पी के साथ साथ लडकी से खास बातचीत की जिम्‍मेदारी मुझे ही दी गयी थी। दसरे दिन मैने ऑफिस से छुट्टी ले ली। शाम लडकी के घर जाने पर मालूम हुआ कि सामान्‍य हैसियत रखनेवाले लडकी के पिता हैप्‍पी और उसके परिवार के जीवन स्‍तर को देखते हुए अपनी लडकी का रिश्‍ता करने को तैयार थे। हैप्‍पी के वैवाहिक संदर्भों या एक बेटे होने की बात उसने लडकी से छुपा ली थी , पर हमलोग विवाह तय करने से पहले उससे सारी बाते खुलकर करना चाहते थे। जब हमने लडकी को इस बारे में जानकारी दी तो उसने उसका गलत अर्थ लगाया , उसने सोंचा कि मात्र बच्‍चे को संभालने के लिए उससे विवाह किया जा रहा है। वह इस तरह के किसी समझौते के लिए तैयार नहीं थी और हमें वहां से निराश ही वापस आना पडा।

लडकी वालों के यहां से आने में देर हो गयी थी। मानसी और श्रेया ने पूरा खाना तैयार रखा था , खाना खाकर हम सब ड्राइंग रूम में बैठ गए। गुमसुम और खोयी सी रहनेवाली श्रेया खाना खाने के बाद थके होने का बहाना कर अपने कमरे में चली गयी। । जॉली तो श्रेया की हालत देखकर बहुत परेशान था , एक ओर हैप्‍पी तो , दूसरी ओर श्रेया .. दोनो की समस्‍याएं हल करने में उसका दिमाग तेज चल रहा था। आज दोनो को ही एक सच्‍चे जीवनसाथी की जरूरत थी , दोनो साथ साथ चलकर एक दूसरे की जरूरत पूरा कर सकते थे, पर इस बात को मुंह से निकालने की उसकी हिम्‍मत नहीं हो रही थी। तभी गर्मी के दिन के इस व्‍यर्थ की यात्रा और तनाव से परेशान भैया ने कहा, ’इतनी गर्मी में बेवजह आने जाने की परेशानी , लडकी के पिता को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसे अपनी लडकी से बात करके ही हमें बुलाना चाहिए था।‘
‘उनकी भी क्‍या गलती ? उन्‍होने सोंचा होगा कि हैप्‍पी को देखकर लडकी मान ही जाएगी।‘ मेघना उन्‍हीं लोगों के पक्ष में थी।

’यहां आकर हमने कोई गल्‍ती नहीं की। हमारे सामने एक और अच्‍छा विकल्‍प उपस्थित हुआ है।‘ जॉली के मुंह से अनायास ही मन की बात निकल पडी। यह सुनकर हमलोग सभी अचंभित थे।
’कौन सा विकल्‍प ?’ भैया ने तत्‍काल पूछा।
’मेरे कहने का कोई गलत अर्थ न लगाएं, पर आज हमारे समक्ष सिर्फ हैप्‍पी की ही नहीं , श्रेया के जीवन की भी जिम्‍मेदारी है। इन दोनो के लिए दूसरे जगहों पर भटकने से तो अच्‍छा है कि दोनो को एक साथ चलने दिया जाए , यदि हैप्‍पी और श्रेया तैयार हो जाए तो‘ जॉली ने स्‍पष्‍ट कहा।
‘मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है , आपकी जैसी इच्‍छा’ हैप्‍पी को इस रिश्‍ते में कोई खराबी नहीं दिख रही थी , सो उसने भैया का तुरंत समर्थन कर दिया।
‘पर क्‍या श्रेया इस बात के लिए तैयार हो जाएगी’ भैया ने पूछा।

’अभी तुरंत तो नहीं, लेकिन जब वह ससुराल जाने को तैयार नहीं , तो कुछ दिनों में तो उसे तलाक लेकर दूसरे विवाह के लिए तैयार होना ही होगा।‘मानसी इतने अच्‍छे रिश्‍ते को आसानी से छोडना नहीं चाहती थी , उसे विश्‍वास था कि कुछ दिनों में वह श्रेया को मना ही लेगी।
जॉली ने हमारे सामने जो प्रस्‍ताव रखा , वह सबके हित में और सबसे बढिया विकल्‍प दिख रहा है। मैं भी दूसरी बार अब कोई भूल नहीं करना चाहता। मुझे भी मालूम है , हैप्‍पी और श्रेया एक दूसरे के सच्‍चे जीवनसाथी बन सकते हैं।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

9 फरवरी से शेयर बाजार में और तेजी आएगी ...

पिछले माह यानि 3 जनवरी को पोस्‍ट किए गए लेख में मैने लिखा था कि 17 जनवरी के दोपहर बाद से पूरे विश्‍व के बाजार में कुछ तब्‍दीलियां दिखाई देंगी , जिनके कारण 31 जनवरी तक बाजार में बढत यानि छोटी घटत और बडी बढोत्‍तरी की संभावना बनेगी। पिछले माह ठीक 17 जनवरी तक बाजार में अनिश्चितता का माहौल रहने के बाद बाजार में बढत आनी शुरू हुई और मात्र पंद्रह बीस दिनों में शेयर धारकों के चहरे पे चमक वापस आ गयी है।

2011 में बंबई स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स में करीब एक-तिहाई गिरावट देखी गई लेकिन इस साल सेंसेक्स में करीब 14 फीसदी की तेजी आई है। सेंसेक्स और निफ्टी के अन्य वैश्विक सूचकांकों के मुकाबले कहीं बेहतर प्रदर्शन दिखाई देने से इस क्षेत्र के जानकार भी चकित हैं। इस कारण दलाल स्ट्रीट में लंबे समय के बाद एक बार फिर से तेजडिय़ों की वापसी की चर्चा होने लगी है।

पिछले साल के मुकाबले आज हालात काफी बदल गए हैं। सेबी के आंकड़ों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशक इस साल अभी तक देसी शेयर बाजारों में 15,317 करोड़ रुपये का निवेश कर चुके हैं। जबकि ऊंची ब्याज दरों, सरकारी घाटे और भ्रष्टाचार के मामलों से उकताकर उन्होंने पिछले साल 3,417.60 करोड़ रुपये निकाल लिए थे।

बीएसई सेंसेक्स 18000 और एनएसई का निफ्टी 5400  को छूने ही वाला है। आज की सुधरी हुई हालात को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज दरों में कटौती और विकास में तेजी के बाद बाजार को इस साल नई ऊंचाई मिल सकती है। रुपये में सुधार और विदेशी संस्थागत निवेश बढऩे का भी बाजार को फायदा मिल सकता है।

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की मानें , तो आने वाले समय में भी ग्रहों की स्थिति शेयर बाजार के पक्ष में दिखती है। वैसे ग्रहों के हिसाब से 8 फरवरी 2012 तक शेयर बाजार में थोडी अनिश्चितता का माहौल बना रह सकता है , 9 फरवरी से पूरे विश्‍व के शेयर बाजार में अच्‍छे संकेत दिखेंगे , जिससे बाजार में और अधिक तेजी आएगी। दो चार दिनों तक की तेजी के बाद बाजार कुछ सामान्‍य हो सकता है , यानि एक दो जगहों पर कभी गिरावट दिख सकती है , पर सामान्‍य तौर पर 2 मार्च तक बाजार के कमजोर होने के संकेत नहीं दिखते हैं।