शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अपने पसंदीदा रंग से जानिए अपना भाग्‍य ....

रंग हमारे मन और मस्तिष्‍क को काफी प्रभावित करते हैं। कोई खास रंग हमारी खुशी को बढा देता है तो कोई हमें कष्‍ट देने वाला भी होता है। जिस तरह यदि हम प्रकृति के निकट हों , तो खुद को फायदा पहुंचाने वाले वस्‍तुओं की ओर हमारा ध्‍यानाकर्षण होता है , उन वस्‍तुओं का प्रयोग हम आरंभ कर देते हैं , उसी तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि कमजोर ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए जिस रंग का हमें सर्वाधिक उपयोग करना चाहिए , उस रंग को हम खुद पसंद करने लगते हैं और उस रंग का अधिकाधिक उपयोग करते हैं। इस कारण रंगों की पसंद के अनुसार भी किसी व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है।

सफेद रंग पसंद करने वाले लोग बचपन में ही अपने माहौल में किसी न किसी प्रकार की कमजोरी को देखते हैं और कमजोरियों दूर करने के लिए मनोवैज्ञानिक रुप से परेशान रहते हैं , बचपन के व्यवहार में संकोच हावी होता है , हर समय इन्‍हें भय बना होता है कि कोई गलती न हो जाए। यही मनोवैज्ञानिक कमजोरी इनके जीवन के अन्य भागों में भी देखी जा सकती है। 'पूरी तैयारी और सावधानी करके ही काम करो’ की प्रवृत्ति के कारण काम की शुरुआत ही नहीं हो पाती , बहुत सारे काम विचाराधीन भी पड़े रहते हैं। जीवनभर निरंतर इन कमजोरियों को दूर करने के लिए ये सतर्क रहते हैं। अपने विचारों को कमजोर समझकर दूसरों के सामने रखने में संकोच करते हैं। इनके मन के आवेग में पर्याप्त ठहराव होता है और अपनी बातों को रखने के लिए उचित समय की तलाश करते हैं। ये मन से कभी आक्रामक नहीं होते , फलतः आपपर बाह्य आक्रमण होता है। ये रूठकर प्रतिरोधात्मक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

हरा रंग पसंद करने वाले लोग किशोरावस्था में अपने माहौल को बहुत कमजोर पाते हैं , अध्ययन काल में विपरीत परिस्थितियों से गुजरते हैं । इनकी कठिनाइयां 12 वर्ष की उम्र से 18 वर्ष की उम्र तक बढ़ते हुए क्रम में बनी रहती हैं। बौद्धिक विकास या शिक्षा-दीक्षा के महत्व को समझने के बावजूद परिस्थितियों के विपरित होने से इनका कोई काम सही ढंग से नहीं हो पाता है , इस समय बाधाओं की निरंतरता बनी रहती है।  17 से 19 वर्ष की उम्र में भी इनके मनोबल को तोड़नेवाली कोई घटना घटती है । उस समय इनका आत्मविश्‍वास काम नहीं कर रहा होता है , भीड में पींछे पीछे रहने की आदत रहती है और जीवनभर  नेतृत्‍व क्षमता की कमी मौजूद होती है। इनके व्‍यक्तित्‍व में सेवा भावना होती है। कम उम्र में माहौल में आयी गडबडी इनके धैर्य और निर्णय लेने की शक्ति को बढाती है और इनके आगे के जीवन को संतुलित बनाने में भी मदद करती है। 

लाल रंग पसंद करने वाले लोगों के जीवन में युवावस्था के दौरान परेशानी उपस्थित रहती हैं , यूं तो इनकी समस्याएं 18 वर्ष के उम्र के बाद से ही आरंभ हो जाती हैं , पर 24 वर्ष की उम्र के बाद विपरीत परिणामों की निरंतरता से इनमें शक्ति साहस की कमी और संघर्ष करने की क्षमता कमजोर पड़ती है। 30 वर्ष की उम्र से पहले  ये भीतर से कुछ दब्बू होते हैं , चुस्त जीवनशैली से कोसों दूर इन्‍हें ग्रामीण या एकांतिक जीवन पसंद आता है , वृद्ध जैसा स्वभाव बना रहता है। जीवनभर व्‍यक्तित्‍व में हिम्मत की कुछ कमी बनी रहती है , पर ये लोगों के विश्‍वसनीय बने रहतें हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर विश्‍वास होता है , सरल जीवन पसंद होता है। 

नीला रंग पसंद करने वाले लोगों पर घरेलू उत्तरदायित्वों का भारी बोझ रहता है , बढती जिम्‍मेदारियों के साथ समय पर नौकरी या व्यवसाय में आगे बढने में दिक्कत आने से जीवन का मध्य खासकर 36 वर्ष से 42 वर्ष की उम्र तक का समय कष्टकर व्यतीत होता है , इस वक्त लोगों का कम सहयोग मिलता है। पारिवारिक सांसारिक मामलों का कष्ट बना होता है , इसलिए सांसारिक मामलों में रूचि कम होती है , इन्‍हें अपना जीवन नीरस महसूस होता है। 

नारंगी रंग पसंद करने वाले लोगों को किसी खास संदर्भ में निश्चिंत या लापरवाह रहने का बुरा फल कभी कभी जीवन में सामने आ जाया करता है। 48 वर्ष से 54 वर्ष की उम्र तक हर तरह की जवाबदेही बहुत बढ़ी हुई होती है। उम्र के ऐसे पड़ाव पर इतनी सारी जबाबदेहियों को सॅभाल पाने में तकलीफ होती है , प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इनको अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है, स्तर में बढोत्तरी के बावजूद 48 से 54 वर्ष की उम्र में ये खुद को सफल नहीं महसूस करते। परिस्थितियों की कुछ गडबडी 60 वर्ष की उम्र तक बनी होती है।

पीला रंग पसंद करने वाले लोग धार्मिक स्वभाव रखने वाले होते हैं , जीवनभर बहुतों को काम आते हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर पूरा विश्‍वास रहता है , पर सेवानिवत्ति के पहले अपनी जबाबदेहियों का निर्वाह कर पाने में असमर्थ रहते हैं , इस कारण उसके बाद इनके जीवन में कष्टकर परिस्थितियों की शुरूआत होती है। वृद्धावस्था में यानि 60 वर्ष की उम्र के बाद असफलताएं दिखाई देती हैं , इस समय इनका जीवन निराशाजनक बना रहता है , उम्र अधिक होने के कारण मानसिक कष्ट बहुत होता है , कमजोर शारीरिक मानसिक हालत के कारण किसी प्रकार के निर्णय लेने में दिक्कत आती है।

काले या स्‍लेटी रंग को पसंद करने वाले लोग जीवन में बहुत छोटी छोटी बातों में उलझे रहते  हैं , इनकी सोंच व्यापक नहीं बन पाती, इस कारण तरक्‍की में रूकावट आती है। मेहनत के हिसाब से कम सामाजिक महत्व प्राप्त करते हैं , जीवन में कभी कभी रहस्यमय ढंग से विपत्ति से घिर जाते हैं, इसका सामना करने की इनमें शक्ति नहीं होती , बहुत निरीह हो जाते हैं , पर जिस ढंग से अचानक समस्या आती है , उसी ढंग से तीन वर्ष के बाद उसका निराकरण भी हो जाता है। इनका अति वृद्धावस्था का समय यानि 72 वर्ष की उम्र के बाद का समय कष्‍टकर होता है। 
(बहुत दिनों से सबका पसंदीदा रंग नोट करने , ग्रहों के साथ उसका तालमेल बिठाने तथा उनकी परिस्थितियों पर ध्‍यान देने के बाद यह लेख लिखा गया है , आप भी अपने अनुभव साझा करें , तो हमें सुविधा होगी , पक्ष और विपक्ष दोनो में टिप्‍पणियां आमंत्रित हैं )

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा का ही नहीं क्रांति का दर्शन है .. संगीता पुरी


ईसा से 600 वर्ष पूर्व जब भारतवर्ष अंधविश्वासों के अंधेरे में डूब चुका था , ईर्ष्या और द्वेष की बहुलता थी, समाज जातिवाद के झमेले में फंसा था , धर्म पुस्तकों में सिमट कर रह गया था , धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़े, दंगा-फसाद एवं अत्याचार चरम पर थे , धर्म के नाम पर पशुबलि और हिंसा का प्रचलन बढ़ रहा था , आध्यात्म समाप्‍त था , तब देश में अहिंसा, सत्य, त्याग और दया की किरणें ले आना बहुत बडी बात थी। भगवान महावीर ने जगह-जगह घूमकर धर्म को पुरोहितों के शोषण , कर्म-कांडों के जकडन , अंधविश्वासों के जाल तथा भाग्यवाद की अकर्मण्यता से बाहर निकाला। उन्‍होने कहा कि धर्म स्‍वयं की आत्मा को शुद्ध करने का एक तरीका है।

धर्म का चतुष्टय भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतों का सार है , जो हमारी जीवनशैली को किसी भी युग में बदल सकता है ...


महावीर का पहला सिद्धांत अहिंसा का है , प्राणियों को मारना या सताना नहीं चाहिए । जैसे हम सुख चाहते हैं, वैसे ही सभी प्राणी सुख चाहते हैं, और जीना चाहते हैं। अहिंसा से अमन चैन का वातावरण बनता है। उन्‍होने किसी के शरीर को कष्ट देने को ही अहिंसा नहीं माना , बल्कि मन, वचन , कर्म से भी किसी को आहत करना उनकी दृष्टि से अहिंसा ही थी। उन्‍होने कहा कि दूसरों के साथ वह व्यवहार कभी मत करो जो स्वयं को अच्छा ना लगे। ‘स्वयं जीओ और औरों को जीने दो।‘ किसी भी प्राणी को मार कर बनाये गये प्रसाधन प्रयोग करने वाले को भी उतना ही पाप लगता है जितना किसी जीव को मारने में। उन्‍होने यहां तक माना कि बड, ऊमर, कठूमर, अंजीर, मधु , दही-छाछ , दही बडा आदि को खाने में भी मांस भक्षण का पाप लगता है। आज तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि वनस्पति सजीव है, पर महावीर ने आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व ही कह दिया था कि वनस्पति भी मनुष्य की भांति सुख-दुःख का अनुभव करती है।

महावीर का दूसरा सिद्धांत अनेकांत का है , संसार के सभी प्राणी समान हैं, कोई भी छोटा या बडा नहीं है। पर वस्तु और व्यक्ति विविध धर्मी हैं , सबका स्‍वभाव एक सा नहीं हो सकता। एक के लिए जो सही है, वह दूसरे के लिए भी सही हो, यह आवश्यक नहीं है। किसी को भी उसके स्वभाव से दूर नहीं किया जा सकता, ऐसा करने से वे रोगों से आक्रान्त हो जाते हैं। ये रोग पहले मन पर आक्रमण करते हैं, फिर शरीर को धर दबोचते हैं। मन सहज ही एक पक्ष को लेकर विरोधी पक्ष का खण्डन करने को आतुर रहता है। क्या दर्शन और क्या राजनीति, सर्वत्र यही दुराग्रह-पूर्ण पक्षपात दिखाई पडता है। सत्य पक्षपात में नहीं, निष्पक्षता में है। एक ही राय को सब को मानने के लिए बाध्य करना मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आता है। हम समन्वय का मार्ग लें, अति का मार्ग नहीं। हर वक्‍त दो विरोधी द्रव्यों अथवा विरोधी धर्मों के बीच सही अस्तित्व स्थापित करने वाले नियम को खोजा जाना चाहिए।

भगवान महावीर का तीसरा सिद्धांत अपरिग्रह का है। उनका मानना था कि संग्रह मोह का परिणाम है। जो हमारे जीवन को सब तरफ से घेर लेता है, जकड लेता है। धन पैसा आदि लेकर प्राणी के काम में आने वाली तमाम वस्तु/सामग्री परिग्रह की कोटि में आती है। मान, माया, क्रोध, लोभ.. इन चार से जो जितना मुक्त होगा, वह उतना ही निरोग होगा।

भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित चौथा सिद्धांत आत्म स्वातंत्र्य का है, इसे ही अकर्तावाद या कर्मवाद कहते हैं। यह ‘ किसी ईश्वरीय शक्ति/सत्ता से सृष्टि का संचालन नहीं मानना।‘ यानि हमें अपने किये गये कर्म पर विश्वास हो और उसका फल धैर्य, समता के साथ सहन करें। हम पर कोई कष्ट, विपत्ति या संकट आ पड़े तो उससे बचने के लिए देवी-देवता या ईश्वर के आगे सहायता के लिए भीख न मांगनी पड़े। बल्कि अपने आत्मबल को एकत्र कर उसका सामना करें। व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है, यह उद्घोष भी महावीर की चिंतन धारा को व्यापक बनाता है। मानव से महामानव, कंकर से शंकर, भील से भगवान और नर से नारायण बनने की कहानी ही महावीर का जीवन दर्शन है।

वे प्रकृति में मौजूद छोटे छोटे कण तक को समान मानते थे और किसी को भी कोई दु:ख देना नहीं चाहते थे। उन्‍होने अपने इसी सोच पर आधारित एक नया विज्ञान विश्व को दिया। यह था परितृप्ति का विज्ञान। वास्तव में विज्ञान ने जब-जब कोई नई खोज अथवा नया आविष्कार किया है , मानव की प्यास बढती गयी है। जब व्यक्ति अपने जीवन को इच्छा से संचालित करता है तो निरन्तर नई आवश्यकताएँ पैदा होने का सिलसिला चल निकलता है, जो मानव के लिए कष्टों का घर होता है। इच्छा आवश्यकता को और आवश्यकता इच्छा को जन्म देती है। भोग की अनियंत्रित इच्छा सामाजिक जीवन को विषाक्त कर देती है। भगवान महावीर इस अन्तहीन सिलसिले को समाप्त करना चाहते थे। जो अपने को जीत ले, वह जैन है। भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया और जितेन्द्र कहलाए। एक राजकुमार सुख सुविधाएं , ऐश्‍वर्य स्वेच्छा से त्यागकर वैराग्य धारण कर लेता है , तो वह घटना अविस्मरणीय और अनुकरणीय है ही। आत्मज्ञान प्राप्त करने वाले ऐसे राजकुमार वर्धमान से महावीर हो जाते हैं और ऐसे महामानव के लिए देश के कोने कोने में मनाई जाती है महावीर जयंती।

आज भगवान महावीर हमारे बीच नहीं है पर यह हमारा सौभाग्‍य है कि उनके विचार हमारे पास सुरक्षित हैं। उनका मानना था कि जीवन में आर्थिक, मानसिक और शारीरिक विकास तीनों एक साथ चलने चाहिए। भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा और समता का ही दर्शन नहीं है, क्रांति का दर्शन है। उनके विचारों को किसी काल, देश अथवा सम्प्रदाय की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। यह प्राणी मात्र का धर्म है। ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व उन्‍होने जो कहा , आज भी अनुकरणीय है। आज विश्व हिंसा की ज्वाला में झुलस रहा है। पूंजीवादी मानसिकता के कारण बडे छोटे का भेदभाव बढता जा रहा है। धर्म के नाम पर तरह तरह की कुरीतियां व्‍याप्‍त हैं। पेड पौधों , पशु पक्षियों की अवहेलना से प्रकृति में असंतुलन बढता जा रहा है , महावीर के विचार को माने जाने से ही संसार को राहत मिल सकती है। पर आज कठिनाई यह हो रही है कि महावीर का भक्त भी उनकी पूजा करना चाहता है , पर उनके विचारों पर नहीं चलता। कई जैन मंदिरों में महावीर की प्रतिमा बहुमूल्य आभूषणों से आभूषित मिलती है। यह महावीर का सही चित्रण नहीं है। यदि हम उनके चिंतन को जन-जन तक पहुंचा सकें, तभी उनके जन्म के इस महोत्सव को सच्ची सार्थकता प्राप्त होगी।

विभिन्‍न लग्‍नवालों के लिए योगकारक और अयोगकारक ग्रहों का फलाफल

16 फरवरी 2012 को पोस्‍ट किए गए लेख में   विभिन्‍न लग्‍नवालों के लिए योगकारक और अयोगकारक ग्रहों का फलाफल तय करने की चर्चा की गयी थी।  इस हिसाब से मेष लग्‍नवालों की चंद्रमा को +2  , बुध को -5 , मंगल को +4 , शुक्र को +4 , सूर्य को +6 , बृहस्‍पति को +7 तथा शनि को 0 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में मेष लग्‍नवालों की भाग्‍य , खर्च और बाहरी संदर्भों की स्थिति सर्वाधिक अच्‍छी होती है , उसके बाद बुद्धि , ज्ञान और संतान का स्‍थान होता है , उसके बाद शरीर , व्‍यक्तित्‍व , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , जीवन शैली , धन , कोष , घर गृहस्‍थी और ससुराल पक्ष का वातावरण होता है , वाहन समेत हर प्रकार की संपत्ति की भी स्थिति अच्‍छी होती है , पिता , समाज , प्रतिष्‍ठा , कर्मक्षेत्र की सफलता और अन्‍य प्रकार के लाभ का नं उसके बाद होता है , बुध के ऋणात्‍मक होने से भाई , बहन बंधु बांधव और सहयोगी से संबंधित जबाबदेही या किसी प्रकार के झंझट की उपस्थिति की संभावना बनती है।


इसी प्रकार वृष लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -2 अंक मिलते हैं , बुध को +7 अंक , मंगल को +3 , शुक्र को +2 , सूर्य को +2 , बृहस्‍पति को -5 तथा शनि को +11 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में वृष लग्‍नवालों का भाग्‍य , पिता , प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक वातावरण की स्थिति सबसे अच्‍छी होती है , उसके बाद इनकी धन , कोष , बुद्धि , ज्ञान , संतान का स्‍थान होता है , इसके बाद घर , गृहस्‍थी , खर्च और बाहरी संदर्भ , उसके बाद स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , झंझट के लडने की शक्ति , वाहन समेत हर प्रकार की संपत्ति के मामले होते हैं , चंद्रमा के कारण भाई बहन , बंधु बांधवों के सुख में थोडी कमी और बृहस्‍पति के कारण सबसे कमजोर इनकी जीवन शैली और लाभ होता है। 

इसी प्रकार मिथुन लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +1 अंक मिलते हैं , बुध को +7 अंक , मंगल को -7 , शुक्र को +6 अंक मिलते हैं। इसी प्रकार सूर्य को -2 , बृहस्‍पति को +7 तथा शनि को +6 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में  मिथुन लग्‍नवालों के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , हर प्रकार की संपत्ति , घर गृहस्‍थी का वातावरण , पिता पक्ष और पद प्रतिष्‍ठा की स्थिति अच्‍छी होती है , उसके बाद बुद्धि , ज्ञान , संतान , खर्च , बाहरी संदर्भ , भाग्‍य और जीवन शैली का स्‍थान भी पक्ष में ही होता है , धन की स्थिति भी सकारात्‍मक होती है , पर भाई , बहन , बंधु बांधव की स्थिति थोडी गडबड तथा किसी प्रकार के झंझट की उपस्थित की संभावना और लाभ की कमजोरी बनी रहती है।

इसी प्रकार कर्क लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +5 अंक मिलते हैं , बुध को -2 अंक , मंगल को +10 , शुक्र को -2 , सूर्य को  +1 , बृहस्‍पति को +4 तथा शनि को +2 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में कर्क लग्‍न वालों के बुद्धि , ज्ञान , संतान , पिता , समाज , पद ,प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक वातावरण को सर्वाधिक बढिया माना जा सकता है। उसके बाद उनके शरीर , व्‍यक्तित्‍व और आत्‍मविश्‍वास की स्थिति होती है , इसके बाद भाग्‍य और हर प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति , फिर घर , गृहस्‍थी और जीवनशैली को भी सकारात्‍मक माना जा सकता है। इनका भाई , बहन , बंधु बांधव , खर्च , बाहरी संदर्भ , माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति या लाभ से संबंधित मामले कुछ कमजोर होते हैं।

इसी प्रकार सिंह लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को 0 , बुध को -3 अंक , मंगल को +9 , शुक्र को +2 , सूर्य को +5 , बृहस्‍पति को +5 , तथा शनि को 0 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में सिंह लग्‍न वालों  का भाग्‍य और हर प्रकार की संपत्ति की स्थिति बहुत अच्‍छी होती है। उसके बाद इनके शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍म विश्‍वास , बुद्धि , ज्ञान , संतान और जीवन शैली को स्‍थान दिया जा सकता है , भाई , बहन , बंधु ,बांधव , पद  प्रतिष्‍ठा की स्थिति भी अच्‍छी होती हैं , खर्च , बाहरी संदर्भ , घर गृहस्‍थी और किसी प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति भी होती है , पर बुध के ऋणात्‍मक होने से धन के मामले काफी सुखद नहीं रह पाते।

इसी प्रकार कन्‍या लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -4 अंक , बुध को +9 अंक , मंगल को -3 , शुक्र को +8 , सूर्य को 0 , बृहस्‍पति को +5 तथा शनि को +3 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि अन्‍य कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो कन्‍या लग्‍न वालों के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , पिता पक्ष , सामाजिक राजनीतिक पक्ष और प्रतिष्‍ठा संबंधी मामले काफी सुखद होते हैं। इनके भाग्‍य और धन की स्थिति भी अच्‍छी होती है , घर गृहस्‍थी , पारिवारिक मामले और हर प्रकार की संपत्ति के मामले भी सुखद होते हैं , संतान पक्ष , प्रभाव और हर प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति भी सामान्‍य तौर पर अच्‍छी होती है , खर्च के मामले भी सामान्‍य होते हैं , पर लाभ के मामले ऋणात्‍मक महसूस होते हैं , भाई बहन बंधु बांधवों से भी इन्‍हें सहयोग कम मिलता है।

इसी प्रकार तुला लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +4 अंक , बुध को +7 अंक , मंगल को +4 , शुक्र को +4 अंक , सूर्य को -4 , बृहस्‍पति को -5 तथा शनि को +8 अंक मिलते हैं। इस कारण यदि अन्‍य कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो तुला लग्‍नवाले सुख के मामलों में बुद्धि , ज्ञान , हर प्रकार की संपत्ति और संतान की स्थिति को सर्वाधिक मजबूत पाते हैं। इनके भाग्‍य और खर्च की स्थिति भी काफी सुखद होती है , स्‍वास्‍थ्‍य , जीवन शैली , पिता , समाज , प्रतिष्‍ठा , धन , कोष और घर गृहस्‍थी का वातावरण भी अच्‍छा होता है , पर लाभ के मामले कष्‍टकर होते हैं ,  भाई बहन , बंधु बांधव और प्रभाव की स्थिति भी ऋणात्‍मक होती है। 

इसी प्रकार वृश्चिक लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +7 अंक , बुध को -5 अंक , मंगल को +2 , शुक्र को+3 अंक , सूर्य को +4 अंक, बृहस्‍पति को +7 अंक तथा शनि को 0 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो वृश्चिक लग्‍नवाले भाग्‍य , धन , बुद्धि , ज्ञान और संतान के मामले में सर्वाधिक सुखद वातावरण प्राप्‍त करते हैं , पिता पक्ष , पद प्रतिष्‍ठा और सामाजिक वातावरण भी सुखद होता है , इनकी घर गृहस्‍थी और खर्च का वातावरण भी सुखद बनी होतीं है , भाई बंधु , हर प्रकार की संपत्‍ित के मामले भी अच्‍छे होते हैं , पर जीवनशैली कुछ कष्‍टकर होती है , इन्‍हें लाभ से कुछ समझौता करना पडता है।

इसी प्रकार धनु लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -1 अंक , बुध को +7 अंक , मंगल को +6 , शुक्र को -7 अंक , सूर्य को +7 , बृहस्‍पति को +7 तथा शनि को -1 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो धनु लग्‍न वालों का सबसे सुखद संदर्भ पिता , घर गृहस्‍‍थी का वातावरण और सामाजिक वातावरण होता है , शरीर , व्‍यक्तित्‍व , माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , भाग्‍य , बुद्धि , ज्ञान , संतान और खर्च की स्थिति भी मनोनुकूल बने होते है , पर धन कोष , भाई बहन , बंधु बांधव की स्थिति और जीवन शैली कुछ कमजोर होता है , शुक्र के अधिक ऋणात्‍मक होने से जीवन में कई प्रकार के झंझट की उपस्थिति और लाभ की कमी की संभावना बनी रहती है।

इसी प्रकार मकर लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +3 अंक , बुध को +4 अंक , मंगल को -2 , शुक्र को+10 अंक , सूर्य को -1 , बृहस्‍पति को -2 तथा शनि को = +6 अंक मिलते हैं।  इस कारण यदि कोई ज्‍योतिषीय बडा कारण न हो तो मकर लग्‍न वालों के लिए सर्वाधिक सुखद संदर्भ बुद्धि , ज्ञान , संतान , पिता , कैरियर और सामाजिक वातावरण होता है। शरीर , व्‍यक्तित्‍व और धन की स्थिति भी सुखद होती है , भाग्‍य , घर गृहस्‍थी का वातावरण , प्रभाव और हर प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति भी अच्‍छी होती है , पर ये जीवन शैली को लेकर हल्‍की कमजोरी महसूस करते हैं , माता पक्ष और किसी प्रकार की संपत्ति से संबंधित लाभ में कमी होती है , भाई , बंधु और खर्च के मामले भी कुछ दबाबपूर्ण होते हैं।


इसी प्रकार कुंभ लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -3 अंक , बुध को +5 अंक , मंगल को +2 , शुक्र को +9 , सूर्य को +3 , बृहस्‍पति को  -3 तथा शनि +5 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि ज्‍योतिषीय कारण न हो तो माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति और भाग्‍य के मामले में कुंभ लग्‍नवालों की स्थिति सर्वाधिक सुखद होती है , इनके शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भ के मामले भी सुखद होते हैं , बुद्धि , ज्ञान , संतान और जीवन शैली के मामले भी अच्‍छे होते हैं , घर गृहस्‍थी का वातावरण सुखद होता है , उसके बाद इनके जीवन में भाई , बहन , बंधु बांधव , पिता और प्रतिष्‍ठा से संबंधित मामलों का सुख आता है , पर किसी प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति कम होती है , धन और लाभ का वातवरण भी कमजोर बना होता है।


इसी प्रकार मीन लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +6 अंक , बुध को +5 अंक , मंगल को +8 , शुक्र को -3 , सूर्य को -3 , बृहस्‍पति को +9 तथा शनि को -4 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो , तो मीन लग्‍न वाले शरीर , व्‍यक्तित्‍व , हर प्रकार की संपत्ति , धन और भाग्‍य के मामले में सर्वाधिक सुख प्राप्‍त करते हैं , इनका बुद्धि , ज्ञान , संतान , घर गृहस्‍थी और पद प्रतिष्‍ठा का वातावरण भी सुखद होता है , पर भाई , बहन , बंधु , बांधव , जीवन शैली , झंझट से जूझने की शक्ति कुछ कमजोर बनी होती है , लाभ और खर्च के मामले सर्वाधिक कमजोर होते हैं।


उपरोक्‍त लेख ग्रहों के स्‍वामित्‍व के आधार पर लिखा गया है , योग कारक और अयोग कारक ग्रहों के निर्णय में जन्‍मकुंडली में जिस भाव में ग्रह की उपस्थिति हो , इसके अंक को भी जोडा जाना चाहिए , जिससे ग्रहों की शक्ति का उपयुक्‍त निर्णय हो सकता है। इसके बाद ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति के आधार पर ग्रहों की शक्ति का निर्णय करना उचित है । अपनी अपनी शक्ति के हिसाब से ही सभी ग्रह अपने  प्रतिफलन काल में प्रभाव डालते हैं।