बुधवार, 9 मई 2012

बोलने और लिखने में सरल सार्थक नाम अधिक उचित है !!

किसी खास तरह की ग्रहस्थिति का प्राचीन ऋषि महर्षियों ने पृथ्‍वी पर कुछ खास प्रभाव देखा , तो उसे सही ढंग से समझने के लिए पूरी ताकत लगा दी और उसका ही परिणाम है कि एक सुव्‍यवस्थित ज्ञान के रूप में ज्‍योतिष शास्‍त्र विकसित हो सका। चंद्रमा के किसी खास नक्षत्र और उनके विभिन्‍न चरणों में जन्‍म लेने वाले जातकों के स्‍वभाव पर पूरा रिसर्च करने के लिए उन्‍होने जातको के नाम खास अक्षर से रखने की परंपरा शुरू की , ताकि जन्‍म विवरण या जन्‍मकुंडली नहीं होने पर भी उनके चरित्र के बारे में कुछ समझा जा सके। प्राचीन काल में हर गांव के पंडितों को इतनी जानकारी होती ही थी कि वे पंचांग से बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बना सके और नक्षत्र के आधार पर उनका नामकरण कर सकें। उस नाम से ही जातक के चारित्रिक विशेषताओं को समझने में मदद मिलती थी, इसलिए नाम का महत्‍व माना गया।

भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों में नामकरण संस्कार का कम महत्‍व नहीं होता था। विधि विधान से नामकरण करने की परंपरा का ज्‍योतिषीय आधार हुआ करता था। किसी शुभ मुहूर्त्‍त में नामकरण जन्म के 11 से 27 दिन के अंदर किया जाता था। शिशु के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में संचरण करता है, वह राशि जन्म राशि कहलाती है और इस राशि में आने वाले नामाक्षर पर उसका नाम रखा जाता है। अक्षर विशेष में नाम रखने के लिए कुल 27 नक्षत्रों के चार चार चरण किए गए हैं। इनमें जिस चरण में जन्म होता है, उसी अक्षर विशेष पर नाम रखा जाता है। उदाहरण के लिए बालक का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में हुआ है तो बालक का नामाक्षर चू होगा। अश्विनी नक्षत्र में चार अक्षर चू, चे, चो और ला अक्षर होते हैं। नाम कम अक्षरों वालों होना अधिक उचित होता है। पुत्र का नाम सम व पुत्री का नाम विषम संख्या में रखा जाता है।

जब पंडितो के द्वारा नाम रखे जाने की परंपरा समाप्‍त हुई या जन्‍मकुंडली तक ही सीमित रह गयी , तब भी बहुत दिनों तक नाम दिन, महीने , तिथि , पक्ष, प्रहर या कभी कभी उनकी शारिरीक या पारिवारिक स्थिति के हिसाब से रखा जाता रहा , पर फिर भी लोगों के दिलोदिमाग में नाम का महत्‍व बना रहा और बच्‍चों में चारित्रिक विशेषताओं को बनाए रखने के लिए सुंदर और सार्थक नाम रखने की परंपरा शुरू हुई। आज तो बच्‍चे का सटीक नाम रखने के लिए अभिभावक काफी माथापच्‍ची करते हैं।पुराने बहुत से नामों को तो लोगों ने ओल्ड फैशन बनाकर साइड लाइन कर दिया है, आज हर कोई अपने बच्चे को नाम से एक अलग पहचान देना चाह रहा है। कुछ समय से लडकियों के नाम में अनन्या, नेहा, शगुन, भव्या, आस्था, अदिति, रिया, खुशी, अणिता, अन्या, अनुष्का, परी, दिया, नव्या, काव्या आदि बहुतायत में रखे जा रहे हैं , तो लडकों में प्रतीक, पीयूष, हर्षित, यश, शुभम, आर्यन, कृष्णा, अर्णव, सांई, आरुष, इशान, नील, ओम, विहान, आयुष, अभिनव, वैदांत, विवान, शौर्य आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से नाम रखने में जातक की जन्‍मकुंडली को ध्‍यान में रखने की आवश्‍यकता नहीं, बच्‍चे का पुकारने का या वास्‍तविक नाम कुछ भी हो सकता है , पर बोलने और लिखने में सरल सार्थक नाम अधिक उचित है।

बच्‍चों के नाम चुनकर रखने की समस्‍या बहुत ही बडी है , इसका हल कई वेबसाइटों में मिल सकता है ....
www.indif.com
www.bachpan.com
www.pitarau.com
www. hinduchildnames.com
www.babynamenetwork.com
www.whereincity.com
www.hindubabynames.net
www.indianhindunames.com
www.hindunames.net
www.babynamesindia.com

रविवार, 6 मई 2012

विश्‍वास और श्रद्धा नहीं ... बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है !!


बौद्ध धर्म एक अनीश्‍वरवादी धर्म है, इसके अनुसार कर्म ही जीवन में सुख और दुख लाता है। भारत ही एक ऐसा अद्भूत देश है जहां ईश्वर के बिना भी धर्म चल जाता है। ईश्वर के बिना भी बौद्ध धर्म को सद्धर्म माना गया है। दुनिया के प्रत्येक धर्मों का आधार विश्वास और श्रद्धा है जबकि बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है, यह इस धर्म और गौतम बुद्ध के प्रति आकर्षित करता है। सभी धर्म अपना दर्शन सुख से आरम्भ करते हैं जो कि सर्वसाधारण की समझ से कोसों दूर होता है। महात्मा बुद्ध अपना दर्शन दुःख की खोज से आरम्भ तो करते हैं पर परिणति सुख पर ही होती है। बौद्ध धर्म का आधार वाक्य है ‘सोचो, विचारो, अनुभव करो जब परम श्रेयस् तुम्हारे अनुभव में आ जाये तो श्रद्धा या विश्वास करना नहीं होगा स्वतः हो जाएगा।’

बौद्ध धर्म के चार तीर्थ स्थल हैं- लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर। लुम्बिनी  नेपाल में , बोधगया बिहार में , सारनाथ काशी के पास और कुशीनगर गोरखपुर के पास है। बौद्ध धर्म एक धर्म ही नहीं पूरा दर्शन है। महात्मा बुद्ध ने इसकी स्‍थापना की, इन्‍हें गौतम बुद्ध, सिद्धार्थ, तथागत और बोधिसत्व भी कहा जाता है। उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला और बाद में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया। बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा बडा धर्म माना गया है , क्‍योंकि इसे पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं। "अज्ञानता की नींद"से जागने वाले ,  जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो , वे "बुद्ध" कहलाते हैं ।

बौद्ध धर्म के हिसाब से पहला आर्य सत्य दुःख है। जन्म दुःख है, जरा दुःख है, व्याधि दुःख है, मृत्यु दुःख है, अप्रिय का मिलना दुःख है, प्रिय का बिछुड़ना दुःख है, इच्छित वस्तु का न मिलना दुःख है। दुःख समुदय नाम का दूसरा आर्य सत्य तृष्णा है, सांसारिक उपभोगों की तृष्णा, स्वर्गलोक में जाने की तृष्णा और आत्महत्या करके संसार से लुप्त हो जाने की तृष्णा, इन तीन तृष्णाओं से मनुष्य अनेक तरह का पापाचरण करता है और दुःख भोगता है। तीसरा आर्य सत्य दुःखनिरोध है। तृष्णा का निरोध करने से निर्वाण की प्राप्ति होती है, देहदंड या कामोपभोग से मोक्षलाभ होने का नहीं। चौथा आर्य सत्य दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् है। यह दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् नामक आर्य सत्य भावना करने योग्य है। इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। वे अष्टांग ये हैं :- 1. सम्यक्‌ दृष्टि, 2. सम्यक्‌ संकल्प, 3. सम्यक्‌ वचन, 4. सम्यक्‌ कर्मांत, 5. सम्यक्‌ आजीव, 6. सम्यक्‌ व्यायाम, 7. सम्यक्‌ स्मृति, 8. सम्यक्‌ समाधि। दुःख का निरोध इसी अष्टांगिक मार्ग पर चलने से होता है। पहला अंत अत्यंतहीन, ग्राम्य, निकृष्टजनों के योग्य, अनार्य्य और अनर्थकारी है। दूसरा अंत है शरीर को दंड देकर दुःख उठाना। इन दोनों को त्याग कर मध्यमा प्रतिपदा का मार्ग ग्रहण करना चाहिए। यह मध्यमा प्रतिपदा चक्षुदायिनी और ज्ञानप्रदायिनी है।

कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्ति गत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया था , अशोक के शासनकाल में ही बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये, जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया । अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्मयात्राओं का प्रारम्भ किया , राजकीय पदाधिकारियों और धर्म महापात्रों की नियुक्ति की, दिव्य रूपों का प्रदर्शन तथा धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था की लोकाचारिता के कार्य, धर्मलिपियों का खुदवाना तथा विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजने आदि काम किए। इस तरह विभिन्न् धार्मिक सम्प्रदायों के बीच द्वेषभाव को मिटाकर धर्म की एकता स्थापित करने में अशोक ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी।

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सूपरमून ... बडा और चमकीला होगा आज का चांद !!


खगोलीय घटनाओं और दृश्‍यों में रूचि रखने वाले लोगों के लिए 5 और 6 मई की रात कुछ खास है , क्योंकि इस वक्‍त चांद पूरे वर्ष के हिसाब से सबसे चमकीला और बड़ा नजर आएगा। ऐसे संयोग पूर्णिमा के दिन ही बनते हैं और चूंकि चांद धरती के सबसे निकट होगा , इसलिए अपनी कक्षा में घूमते हुए चांद पहले की अपेक्षा पृथ्वी से अधिक निकट वाले बिंदु पर पहुंचेगा। इस घटनाक्रम को 'सुपरमून' कहा जाता है और इस साल ऐसा बुद्घ पुर्णिमा के अवसर पर हो रहा. छह मई को सूर्योदय से कुछ मिनट पहले चंद्रमा पश्चिमी क्षितिज पर डूबेगा और उसी शाम सूर्यास्त के एक घंटे के बाद पूर्वी क्षितिज पर उसका उदय होगा।

इस वर्ष नवंबर की 28 तारीख को पूर्णिमा के दिन चांद धरती से सबसे दूर रहेगा और दोनों की बीच की दूरी 4,06,349 रहेगी, जबकि अभी पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी घटकर 3,56,955 किलोमीटर होगी विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूर्णिमा को चांद औसत से 14 फीसदी अधिक चमकीला नजर आएगा। चांद के ज्यादा चमकीला होने के कारण गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ेगा और इसका समुद्र के ज्वार भाटे पर अधिक असर पड़ेगा। अब तक के सबसे बड़े और बेहद चमकीले चांद का किसी भी रूप में प्राकृतिक आपदा से कोई सम्बंध नहीं है। लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ने से समुद्र में ज्वार-भाटा की ऊंची लहरें उठ सकती हैं और उस पर चमकीले चांद की रोशनी अद्भुत दृश्य बना सकती है।

कल से ही इस मनोहारी दृश्य को निहारने को लोगों में उत्सुकता रही। तमाम लोग चांद के दर्शन के लिए आंगन , बाहर या छतों पर निकल गये। देर रात तक उसका लुत्फ उठाया। शनिवार दोपहर 12.52 बजे से पूर्णिमा लग गयी, जो रविवार को दोपहर प्रात: 9.05 बजे तक रहेगी। चंद्रमा तुला राशि में होने और दिन में भी पूर्णिमा लगने की वजह से चंद्रमा का आकार बढ़ता गया । दिन में पूर्णिमा शुरू होने के बाद रात नौ बजे तक चांद पूर्ण आकार में पहुंच गया। धीरे-धीरे उसका प्रभाव कम होता गया। तांत्रिकों के हिसाब से इस रात को मंत्र साधना लाभदायक रहती

अन्‍य खगोलीय स्थिति की तरह इस चंद्र का प्रभाव पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडेगा , इस संभावना से तो हम इंकार नहीं कर सकते , पर सामान्‍य तौर पर यह सुखद स्थिति के ही होने का संकेत दे रहा है। पर इससे वृष और मिथुन राशि वाले अधिक अच्‍छे ढंग से प्रभावित होंगे। अक्‍तूबर नवंबर में जन्‍म लेनेवालों पर भी इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकती है। इसलिए प्रकृति की इस गतिविधि से  चिंतित होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है , लुत्‍फ उठाइए इसका।