बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

करवा चौथ का चांद रोहिणी नक्षत्र में ....

आसमान में पूर्वी क्षितीज पर सूर्योदय के दो घंटे पहले तथा पश्चिमी क्षितिज पर दो घंटे बाद दिखाई देने वाले शुक्र ग्रह को आप सभी ने अवश्‍य देखा होगा। इसकी चमक एवं शान अन्य ग्रहो से बिल्‍कुल अलग व निराली होती है। ज्योतिष में शुक्र को आकर्षण , प्रेम , विवाह और दाम्‍पत्‍य जीवन का प्रतीक ग्रह माना जाता है। शुक्र ग्रह मजबूत होने से व्यक्ति आकर्षक, सुंदर, मनमोहक, सुखी रहता है। साथ ही प्रेम-संबंध मजबूत और दाम्पत्य-जीवन सुखद होता है। शुक्र की दो राशियां वृष और तुला है।

कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को शुक्र ग्रह के दोनो राशियों में से तुला में सूर्य तथा वृष में चंद्रमा होता है, जो क्रमश: आत्‍मा और मन का प्रतीक ग्रह है। वृष राशि में ही चंद्रमा के प्रिय रोहिणी नक्षत्र का वास है। क्‍या संयोग है कि हिंदू धर्म के अनुसार इस तिथि को सुहागिन और अविवाहित स्त्रियों के द्वारा करवा चौथ का लोकप्रिय निर्जला व्रत रखा जाता है। पूजा की विधि देशभर में भिन्‍न भिन्‍न हो सकती है, कथाएं भी अलग अलग हो सकती हैं, पर ग्रहों की स्थिति को देखते हुए माना जा सकता है कि सबका लक्ष्‍य एक है , अपनी मन और आत्‍मा को शुद्ध कर दाम्‍पत्‍य जीवन को अधिक से अधिक मजबूती देने की खुद की तपस्‍या , बुजुर्गों का आशीर्वाद और ईश्‍वर से प्रार्थना, चंद्रोदय के बाद चंद्र को अर्घ्‍य देने के बाद ही पति के हाथो अन्‍न जल ग्रहण कर व्रत तोडा जाता है।

इस वर्ष 18 अक्तूबर को रात 10 बजकर 48 मिनट पर चतुर्थी तिथि का प्रारंभ हो रहा है। यह 19 अक्तूबर को शाम सात बजकर 32 मिनट तक रहेगी। दोनो ही दिन चंद्रोदय चतुर्थी तिथि के अंतर्गत नहीं हो पाएगा, क्‍योंकि 19 अक्तूबर, बुधवार को चंद्रमा का उदय रात 9 बजे के आसपास होगा, समय में स्‍थान के हिसाब से कुछ परिवर्तन होते हैं। पर पूजा के वक्‍त शाम 5:43 से 6:59 तक चतुर्थी तिथि होगी , साथ ही पूजन के वक्‍त वृष लग्‍न का उदय होगा , जिसमें रोहिणी नक्षत्र का चंद्रमा मौजूद होगा , इसलिए यह त्‍यौहार 19 अक्‍तूबर को मनाया जा रहा है। 19 अक्‍तूबर को एक ग्रह मंगल को छोडकर सभी ग्रहों की स्थिति बहुत अच्‍छी है , इसलिए आनंदमय वातावरण में सारे कार्यक्रम संपन्‍न होंगे। 


पर मंगल की कमजोर स्थिति मेष और वृश्चिक लग्‍न वालों के स्‍वास्‍थ्‍य की, तुला और मीन लग्‍न वालों के धन की , कन्‍या और कुभ लग्‍न वालों के भाई-बंधु की , सिंह और मकर लग्‍नवाले के किसी सामान या संपत्ति की , कर्क और धनु लग्‍नवालों के पढाई लिखाई या संतान पक्ष की , मिथुन और वृश्चिक लग्‍नवालों के किसी झंझट की , मेष और कन्‍या लग्‍नवालों के रूटीन की, सिंह और मीन लग्‍नवालों के भाग्‍य की, कर्क और कुंभ लग्‍नवालों की प्रतिष्‍ठा की, मिथुन और मकर लग्‍न वालों के लाभ की , वृश और धनु लग्‍न वालों के खर्च की कुछ समस्‍या उपस्थित कर सकती है। पर मंगल की गडबड स्थिति के कारण प्रेम और दाम्‍पत्‍य के इस त्‍यौहार करवा चौथ में आपसी संबंध या प्रगाढता में थोडी कमी या दूरी महसूस करने वाले पति पत्‍नी वृष और तुला लग्‍न वाले पति-पत्‍नी होंगे।

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

सर्पधर नामक 13 वीं राशि से घबडाने की कोई आवश्‍यकता नहीं .....

परिवर्तन प्रकृति का नियम है , इसलिए कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं होता। पर परिवर्तन की एक सीमा होती है , कहीं भी किसी परिवर्तन को एकबारगी नहीं लादा जा सकता। जबतक शास्‍त्र के रूप में विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर ज्‍योतिषीय गणना में बडे स्‍तर पर गडबडी न दिखे , इसमें कोई बडा परिवर्तन किया जाना व्‍यर्थ है। पर इंग्लैंड की एक संस्था रॉयल ऐस्ट्रोनामिकल सोसाइटी द्वारा  विज्ञान कांग्रेस में घोषणा किए जाने से कि राशि 12 नहीं 13 है , यानी सूर्य और अन्य ग्रह13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। उनके हिसाब से इसका नाम ओफियुकस और भारतीय ज्‍योतिषियों के अनुसार सर्पधर तारामंडल रखा गया था , उनके द्वारा वृश्चिक और धनु के बीच आनेवाले इस तारामंडल को राशि मानने से पूरे ज्‍योतिषीय आधार को ही चुनौती मिल गयी है।

भारतीय ज्योतिष सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु को ही राशि परिवर्तन का विंदू मानता आया है।  पृथ्वी जिस मार्ग पर अपनी दैनिक गति से सूर्य के चारों ओर घूम रही है उसे क्रान्तिवृत कहा जाता है। इस  क्रांतिवृत्‍त को 30-30 डिग्री में बांटकर ही सभी राशियों की गणना की परंपरा है , भले ही उसकी पहचान के लिए आरंभिक दौर में तारामंडल का सहारा लिया जाता हो। इसलिए तारामंडल की स्थिति में परिवर्तन या उस पथ में आनेवाले किसी अन्‍य तारामंडल से ज्‍योतिषीय गणनाएं प्रभावित नहीं होती हैं।  पाश्चात्य ज्‍योतिषीय गणना प्रणाली ने खुद को विकसित मानते हुए  भारतीय गणनाप्रणाली   में प्रयोग किए जानेवाले संपात विंदू को राशि परिवर्तन का विंदू न मानकर तारामंडलों के परिवर्तन के हिसाब से अपनी राशि को परिवर्तित किया है। इस कारण भारतीय गणनाप्रणाली की तुलना में पाश्‍चात्‍य गणना प्रणाली में लगभग 23 अंशों यानी डिग्री का अंतर पड़ जाता है.।

अधिकांश भारतीय ज्‍योतिषियों ने इस पद्धति को अस्‍वीकार कर दिया है और हमारी गणनाएं तारामंडल के हिसाब से न होकर सूर्यसिद्धांत के संपात विंदू को राशि का प्रारंभिक विंदू मानकर होती है।  इसलिए  सर्पधर तारामंडल को पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष भले ही स्‍वीकार कर ले , क्‍यूंकि वह तारामंडल को ही राशि मानता आया है और सूर्य के झुकाव के फलस्‍वरूप होने वाले आकाशीय स्थिति के परिवर्तन को अपनी गणना में जगह देता आया है , पर भारतीय ज्‍योतिष में इस तारामंडल को स्‍वीकारे जाने की कोई वजह नहीं दिखती।  इसलिए यह पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों को भले ही आकर्षित करे , हमारे लिए इस नए तारामंडल या तेरहवीं राशि का भी कोई औचिंत्‍य नहीं। 

रविवार, 17 अप्रैल 2016

हैप्‍पी अभिनंदन में मैं .....


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो जहाँ एक तरफ हमें गत्यात्मक ज्योतिष ब्लॉग के जरिए भविष्य व वर्तमान की स्थिति से अवगत करवाती हैं, वहीं दूसरी ओर 'हमारा खत्री समाज' ब्लॉग के जरिए हमें इतिहास के साथ भी जोड़े रखती हैं। 
वो हिन्दुस्तान की स्टील सिटी के नाम से जाने वाले शहर बोकारो से तालुक रखती हैं। जी हाँ, इस बार हमारे साथ अर्थ शास्त्र में पोस्‍ट ग्रेज्‍युएट, इतिहास में गहन रुचि रखने वाली व ज्योतिष विद्या की विशेषज्ञ श्रीमति संगीता पुरी जी हैं। आओ जानते हैं, वो ब्लॉग जगत को लेकर क्या सोचती हैं के साथ साथ कुछ और बातें भी, जो सवाल जवाब के दौरान उन्होंने कही।

कुलवंत हैप्पी : आप ने अपने ब्लॉग का नाम 'गत्यात्मक ज्योतिष' रखा हुआ है, क्या ज्‍योतिष और गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष में कोई अंतर है?
संगीता पुरी : सभी पाठक एक परंपरागत ज्ञान के रूप में ‘ज्‍योतिष’ से अवश्‍य परिचित होंगे, जो आसमान के ग्रहों की स्थिति का मानव जीवन पर प्रभाव का अध्‍ययन करता है। हजारों वर्ष पूर्व के ज्‍योतिषीय सिद्धांतों और समय समय पर आए ‘नाना मुनि के नाना मतों’ के कारण ज्‍योतिष को सदा से अंधविश्‍वास का दर्जा ही प्राप्‍त है। उन सिद्धांतों के आधार पर चाहते हुए भी ज्‍योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध किया जा सकता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले मेरे पिताजी या आप मेरे गुरू भी कह सकते हैं, ने एस्‍ट्रोनॉमी के सिद्धांत को अच्‍छी तरह समझने के बाद ज्‍योतिष में प्रवेश किया। उन्‍होने ज्‍योतिष के आधार को ज्‍यों का त्‍यों लेते हुए इसकी उन कमजोरियों का विश्‍लेषण किया, जिसके कारण सटीक भविष्‍यवाणियां नहीं की जा सकती थी, उन्‍होने उन कमजोरियों को दूर करने में सारा जीवन अर्पित किया और अंत में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के रूप में ज्‍योतिष की एक नई शाखा विकसित करने में सफलता पाई। अब उन्‍होंने हमें वह आधार दे दिया है, जिसकी बदौलत हम किसी भी क्षेत्र में ग्रहों के सापेक्ष डाटा का विश्‍लेषण कर संबंधित मामलों के भविष्‍य का अनुमान लगा सकते हैं। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार भविष्‍य बिल्‍कुल निश्चित नहीं माना जा सकता है, पर हमारी जन्‍मजात प्रवृत्तियां और समय समय पर उत्‍पन्‍न होनेवाली परिस्थितियां अवश्‍य निश्चित होती हैं, जिसका अनुमान हम आसमान के ग्रहों को देखकर लगा सकते हैं।

कुलवंत हैप्पी : अर्थशास्‍त्र में पोस्‍ट-ग्रेज्‍युएट डिग्री हासिल करने के बाद ज्योतिष जगत को जीवन समर्पित करना, कोई खास कारण?
संगीता पुरी : बचपन से ही मेरी रूचि गणित और विज्ञान में है, पर सुविधा के अभाव ने मुझे इसमें नियमित नहीं रहने दिया। परिस्थितियों की मजबूरी में मेरे समक्ष आर्ट्स पढने की नौबत आ गई, सबसे अधिक संतुष्टि अर्थशास्‍त्र में ही मिल सकी, क्‍यूंकि इसमें जहां एक पेपर में सांख्यिकी के रूप में आंकडों का विश्‍लेषण करने का मौका मिल रहा था, वहीं एक नए पेपर अर्थमिति के शामिल किए जाने से अर्थशास्‍त्र में गणित के भी अच्‍छे खासे प्रयोग की संभावना दिख रही थी। अपनी रूचि के विषयों को देखकर मैंने अर्थशास्‍त्र में ही पोस्‍ट ग्रेज्‍युएट की डिग्री ली, उस समय तक मेरा लक्ष्‍य किसी कॉलेज में व्‍याख्‍याता बनने का ही था, पर विवाह के बाद मैं कैरियर को उतना महत्‍व न दे सकी। इधर मेरे पिताजी ने अपना सारा जीवन ज्‍योतिष को गत्‍यात्‍मक बनाने में लगा दिया था। बचपन से ही मेरी रूचि उसमें भी हो गयी थी, पर पिताजी मुझे या अपने किसी बच्‍चे को इस रूचिकर विषय की जानकारी नहीं देना चाहते थे, क्‍यूंकि सरकार की ओर से इसके अध्‍ययन के लिए कोई सुविधा न थी, यहां तक कि उनके शोध को भी कहीं पहचान भी नहीं मिल पा रही थी। वो तो उनका जमाना था कि घर का अनाज खाते, सरकारी विद्यालयों में पढते हुए उनके बच्‍चों का उचित लालन पालन हो गया था, पर उन्‍हें संदेह था कि आने वाली पीढी यदि ज्‍योतिष के अध्‍ययन मनन में ईमानदारी से जुडी, तो उसका जीवन नहीं कट पाएगा। इसलिए वे ज्‍योतिष की चर्चा भी हमारे सामने नहीं किया करते थे, पर उनकी कई सटीक भविष्‍यवाणियों को देखकर मेरी दिलचस्‍पी इसमें बन गयी थी। काफी दिनों पूर्व ही इसकी ABCD मेरी समझ में आ चुकी थी, सो कभी कभी इसका अध्‍ययन जारी रहा। इस चक्‍कर में कुछ दिनों बाद मैं अर्थशास्‍त्र को ही भूल गई और बच्‍चों के बड़े होते ही उनकी जिम्‍मेदारियों से मुक्‍त होते ही मैने गंभीरता से ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के विभिन्‍न आयामों को सीखना शुरू कर दिया। मात्र चार पांच वर्षों तक पत्र पत्रिकाओं में लिखने बाद 1996 के अंत में बाजार में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ पर आधारित मेरी पुस्‍तक भी आ गयी थी।

कुलवंत हैप्पी : आपके ब्लॉग 'गत्यात्मक ज्योतिष' और 'हमारा खत्री समाज' दोनों ही लीक से हटकर हैं, उनको चलाने का विचार कैसे आया?
संगीता पुरी : समय के साथ मेरा अध्‍ययन ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के इर्द गिर्द ही घूमने लगा । अब यह मेरा जीवन बन चुका था, इसलिए मैं हर घटना को इसी कोण से देखने लगी। इसलिए मेरा लिखना भी इसी कोण से होता है, जब लीक से हटकर सोचती और लिखती हूं, तो लीक से हटकर ही ब्‍लॉग चलेगी। हम लोगों का पालन पोषण गांव में हुआ , पिताजी, चाचाजी वगैरह सभी भाई गांव में स्‍कूलिंग करने के बाद कॉलेज की पढाई के लिए ही शहर गए। मेरे परिवार में सभी लोग विज्ञान के ही छात्र रहे हैं और हमारे चिंतन का ढंग पूर्ण तौर पर वैज्ञानिक है। पर हम सीधे परंपरागत नियमों को नकार देना उचित नहीं समझते, हम लोग एक मध्‍यम मार्ग की तलाश में हैं, जहां न तो विज्ञान के अंधाधुध विकास को महत्‍व दिया जाना चाहिए और न ही परंपरागत नियमों की एकदम से उपेक्षा की जानी चाहिए। जाति प्रथा को भी आज बिल्‍कुल प्रदूषित कर दिया गया है, पर कभी यह समाज के हित में था। जिस प्रकार एक बडे भूभाग के कई भाग और उपभाग कर देने से प्रबंधन में सुव्‍यवस्‍था लायी जा सकती है, उसी प्रकार समाज में सुव्‍यवस्‍था लाने के लिए कभी ‘जाति प्रथा’ की नींव पडी थी। किसी भी वक्‍त में बहुत बडे स्‍तर के लोग शादी विवाह करते वक्‍त जाति का ख्‍याल नहीं रखा करते थे, पर मध्‍यम वर्गीय या निम्‍न वर्गीय परिवारों में एक जाति के अंतर्गत लोगों के रहन सहन, काम करने और चिंतन के ढंग में साम्‍यता होने के कारण अपने बच्‍चों के शादी विवाह के लिए अपने समाज के पात्रों को ही प्रमुखता दी जाती है। यही कारण है कि अभी भी आनेवाले वर्षों में जातिप्रथा समाप्‍त नहीं होनेवाली। जिस प्रकार विकास के लिए अपने परिवार, अपने समाज, अपने क्षेत्र का विश्‍लेषण करना आवश्‍यक होता है, उसी प्रकार हमें अपने जाति आधारित समाज की अच्‍छाइयों पर नाज और बुराइयों पर शर्म करना चाहिए और अच्‍छाइयों को सुदृढ करने और बुराइयों को दूर करने के लिए कृतसंकल्‍प होना चाहिए , इन्‍हीं छोटी छोटी इकाइयों की मजबूती से राष्‍ट्र मजबूत हो सकता है। इसलिए मैने ‘हमारा खत्री समाज’ नामक ब्‍लॉग भी बनाया। राष्‍ट्र प्रेम से ओत प्रोत हमारे प्रयास से अन्‍य जाति के लोगों को भी सीख लेनी चाहिए।

कुलवंत हैप्पी : आपका एक ब्लॉगर के साथ टिप्पणियों को लेकर विवाद हो गया था, उसके बाद आपने टिप्पणी करना कम कर दिया, क्या उस विवाद ने आपको हताश कर दिया था?
संगीता पुरी : ज्‍योतिष जैसे विवादास्‍पद विषय का अध्‍ययन, मनन और इसी पर लेखन, साथ ही परंपरागत चीजों से प्रेम, अपने को आधुनिक मानने वाले लोगों से हमेशा विवाद बन जाते हैं, पर ईश्‍वर की कृपा है कि मैं कभी भी हताश या निराश नहीं होती। वैसे भी ज्‍योतिष के सिद्धांतों को समझने वाला पूर्ण रूप से प्रकृति के नियमों को समझ जाता है, फिर शिकायत की कोई जगह नहीं रह जाती। एक परिवार में दो बच्‍चे होते हैं, एक शांत और एक लडाकू स्‍वभाव का होता है। घर में हर समय आप शांत की प्रशंसा करते नहीं थकते, पर जब पडोसियों के आक्रमण का जबाब देने की बारी आती है, तो आपका वहीं लडाका बेटा आपको काम आता है, इस तरह हर व्‍यक्ति का अलग अलग जगह महत्‍व होता है। मैं तो यह मानती हूं कि इस दुनिया में बाहर से एक जैसे दिखाई पडने वाले व्‍यक्ति अलग अलग तरह के बीज हैं, सभी अलग अलग ढंग से रिएक्‍ट करते हैं, पर सभी का अलग अलग महत्‍व है। मेरा उक्‍त ब्‍लॉगर के साथ विवाद नए ब्‍लॉगरों के स्‍वागत में लिखी गयी टिप्‍पणियों के लिए हुआ था, मैंने अभी भी नए ब्‍लॉगरों का स्‍वागत करना बंद नहीं किया है। हां, समय की थोडी कमी अवश्‍य हो गयी है, इस कारण पहले की तुलना में अभी ब्‍लॉगिंग को कम समय दे रही हूं, न तो पहले की तरह पोस्‍ट लिख पा रही हूं और न पहले की तरह अधिक पोस्‍टों में कमेंट कर पाती हूं, पर यह किसी विवाद के कारण नहीं है।

कुलवंत हैप्पी : ज्योतिष कारोबार बहुत तेजी से बढ़ रहा है, टीवी से लेकर अखबारों तक ज्योतिष विद्या से भरे पड़े हैं, क्या लोगों का इसमें विश्वास बढ़ने लगा है?
संगीता पुरी : कुछ समय पहले तक लोगों का जीवन इतना अनिश्चितता भरा नहीं हुआ करता था, संयुक्‍त परिवार होते थे, इस कारण यदि परिवार के एक दो व्‍यक्ति जीवन में आर्थिक क्षेत्र में सफल नहीं हुए, तो भी घर के छोटे मोटे कामों को संभालते हुए उनका जीवन यापन आराम से हो जाता था, क्‍यूंकि उन्‍हें संभालने वाले दूसरे भाई या परिवार के अन्‍य सदस्‍य होते थे। पर आज व्‍यक्तिगत तौर पर अधिक से अधिक सफलता पाने की इच्‍छा ने, व्‍यक्तिगत परिवारों की बहुलता ने हर व्‍यक्ति के जीवन को अनिश्चितता भरा बना दिया है। एक लड़के की कमाई के बिना उसका शादी विवाह या सामाजिक महत्‍व नहीं बन पाता है। इसके अलावा वैज्ञानिक सुख सुविधाओं ने व्‍यक्ति को आराम तलब बना दिया है। जो अच्‍छी जगह पर हैं, वो अपने आनेवाली पीढी के मामलों में काफी महत्‍वाकांक्षी हो गए हैं। दो लोगों, दो परिवारों की जीवनशैली में बडा फासला बनता जा रहा है, ऐसे में भविष्‍य की ओर लोगों का ध्‍यान स्‍वाभाविक है। इसी कारण भविष्‍य को जाननेवाली विधा यानि ज्‍योतिष पर लोगों का विश्‍वास बढता जा रहा है।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में छोटी छोटी बातों को लेकर दो ब्लॉगरों के बीच विवाद होता रहता है, क्या उस विवाद को गुट बनाकर तूल देना सही है? 
संगीता पुरी : मैंने पहले भी कहा कि सारे मनुष्‍य अलग अलग स्‍वभाव और विशेषताओं वाले होते हैं, इसलिए विचारों का टकराव होना ही है। समय समय पर विचारों का ऐसा टकराव और पर्याप्‍त वाद विवाद ही एक सटीक विचारधारा को जन्‍म देती है। यह भी बिल्‍कुल स्‍वाभाविक ही है कि एक विचारवालों की आपस में दोस्‍ती हो, एक विचार वालों का आपस में ग्रुप बन जाए। दो गुटों के बीच भी विचारों के टकराव होने से हम पीछे नहीं जाते, आगे बढते हैं। कोई भी व्‍यक्ति या ग्रुप किसी विषय पर, किसी मुद्दे पर यूं ही अपना समय जाया नहीं करता, उसके पास भी पर्याप्‍त अध्‍ययन होता है, उसके पास भी तर्क होते हैं, उसकी अपनी सोच होती है। उस अध्‍ययन, उनके तर्क और उनके विचारों को अवश्‍य सुना जाना चाहिए, स्‍वस्‍थ वाद विवाद किया जाना चाहिए, तभी सर्वमान्‍य और सर्वाधिक उपयुक्‍त मत बन सकता है। यही कारण है कि सफल लोकतंत्र के लिए एक सशक्‍त विपक्ष का होना आवश्‍यक है। पर किसी भी मामले में छोटी छोटी बातों को तूल देना कदापि उचित नहीं। वैसे भी हिंदी ब्‍लागिंग अभी शैशवावस्‍था में है, इसलिए विचारों से मतभेद भले ही बनें, पर ब्‍लॉगरों से मतभेद रखना उचित नहीं।

कुलवंत हैप्पी : क्या कॉमेंट मॉडिरेशन पाठक की अभिव्यक्ति को दबाने का यत्न नहीं? 
संगीता पुरी : ब्‍लॉगर के द्वारा हमें कमेंट मॉडरेशन का अधिकार प्राप्‍त है, तो हम उसका प्रयोग करने के लिए अवश्‍य स्‍वतंत्र हैं। पर सार्थक टिप्‍पणियों, सार्थक तर्कों को हमें ज्‍यों का त्‍यों प्रकाशित कर देना चाहिए, चाहे वो लेखक के विचारों के बिल्‍कुल विरूद्ध ही क्‍यूं न लिखी गयी हो। ब्‍लॉगिंग में सिर्फ लेखक को ही नहीं, पाठक को भी अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता है, उनकी टिप्‍पणियों को न प्रकाशित कर हमें उनकी इस स्‍वतंत्रता को समाप्‍त करने का हक नहीं। हां, कभी कभी गाली गलौज, अश्‍लील या बेहूदी टिप्‍पणियां भी आती है, जो किसी का दिल दुखा सकती हैं। वैसी टिप्‍पणियों को प्रकाशित नहीं करके गलत मानसिकता वाले लोगों की उपेक्षा की जा सकती है, ब्‍लॉगिंग में अस्‍वस्‍थ माहौल पैदा करने से बचा जा सकता है।

कुलवंत हैप्पी : आपके पास दो परिवार हैं, ब्लॉगर परिवार और घर परिवार। आप दोनों में कैसे तालमेल बिठाती हैं एवं घर परिवार मैं कौन कौन हैं?
संगीता पुरी : मेरे घर पर मेरे पति और दो बेटे हैं, शारीरीक रूप से अस्‍वस्‍थ रहने के कारण माताजी भी आजकल हमारे साथ ही हैं। ऐसे में पारिवारिक जिम्‍मेदारियां तो हैं ही, पर ‘जहां चाह वहां राह’, सारे काम निबटाते हुए समय बचाने के लिए पूरा सतर्क रहना पड़ता है। वैसे सबके अपने अपने व्‍यक्तिगत कार्यों को छोडकर घर के अंदर की सारी जिम्‍मेदारियां मेरी हैं, पर मेरे अपने व्‍यक्तिगत कार्यों को छोड़कर घर से बाहर की सारी जिम्‍मेदारियां मेरे पति की। बच्‍चे भी अब बडे हो चुके हैं, इसलिए उन्‍हें अधिक समय नहीं देना होता है। परिवार के किसी सदस्‍य को बेवजह किसी को डिस्‍टर्ब करने की आदत नहीं। यही कारण है कि मुझे ब्‍लॉगिंग के लिए समय मिल जाता है। पर ब्‍लॉगिंग‍ में आने के बाद ज्‍योतिष के क्षेत्र में अध्‍ययन जरूर थोडा बाधित हुआ है। यही कारण है कि आजकल मेरे पोस्‍ट कम आ रहे हैं। इसके अलावे बहुत सारे लोग अपना जन्‍म विवरण भी भेज देते हैं, चाहते हुए भी कुछ को जबाब दे पाती हूं और कुछ को नहीं, इसका अफसोस बना रहता है।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉग जगत के बारे में कैसे पता चला, और आपने कब ब्लॉगिंग शुरू की?
संगीता पुरी : वैसे तो पत्र पत्रिकाओं में ब्‍लॉगिंग के बारे में पढ़कर मैंने 2004 में ही अपना ब्‍लॉग बना लिया था और कृतिदेव फॉण्‍ट में ही अपना आलेख प्रकाशित कर दिया था, क्‍यूंकि यूनिकोड में लिखने की जानकारी मुझे नहीं थी। 2007 के अगस्‍त माह में किसी पत्रिका में पढ़कर मैंने वर्डप्रेस पर अपना ब्‍लॉग बनाया था और अपने कृतिदेव में टाइप किए लेख को यूनिकोड में बदलकर ब्‍लॉग पर डाल दिया था और इस तरह यूनिकोड में पहला पोस्‍ट करने मे सफल हो सकी थी। एक वर्ष बाद 2008 के अगस्‍त में मैंने ब्‍लॉगस्‍पॉट पर लिखना शुरू किया था।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसी घटना या स्थिति, जो बहुत कुछ कहती हो?
संगीता पुरी : मैंने कई परिवारों में पति पत्‍नी दोनों के नौकरी या व्‍यवसाय से जुड़े रहने के कारण उनके बच्‍चों का सही लालन पालन नहीं होते देखा है, वो घटना मुझे अंदर तक कचोटती है। बालपन में बच्‍चों के शारीरिक विकास और किशोरावस्‍था में उनके मानसिक विकास में माता पिता की बहुत आवश्‍यकता होती है। यदि पति और पत्‍नी दोनों नौकरी करने वाले हों, तो दोनो को मिलजुलकर अपने बच्‍चों की सही देखभाल करनी चाहिए। यदि वे बहुत व्‍यस्‍त हों, तो पत्‍नी या तो बच्‍चे को जन्‍म ही न दे या फिर अपनी महत्‍वाकांक्षा को कम करें, क्‍यूंकि भावी पीढी को जन्‍म देना ही नहीं, उन्‍हें शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक रूप से मजबूत बनाना हमारा पहला कर्तब्‍य होना चाहिए। जैसे जैसे बच्‍चे अपनी जबाबदेही संभालने के लायक होते जाएं, पत्‍नी अपनी रूचि, अपने कैरियर पर ध्‍यान दे पाए, समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए। घर परिवार संभालने और बाल बच्‍चों का यथोचित लालन पालन करने वाली महिलाओं को नौकरी करने वाली या कमाने वाली महिला से कम सम्‍मान नहीं मिलना चाहिए।

कुलवंत हैप्पी : चलते चलते युवा सोच युवा खयालात के पाठकों और ब्लॉगर साथियों के लिए एक संदेश जरूर दें?
संगीता पुरी : सभी पाठकों और ब्‍लॉगर साथियों से मेरा निवेदन है कि वे प्रकृति के नियमों पर भरोसा रखें। हर अच्‍छे कार्य का अच्‍छा और बुरे कार्य का बुरा प्रतिफल मिलता है। इसलिए वे कोई ऐसा कार्य न करें , जिसकी अपेक्षा वे सामने वालों से न रखते हो। इसके अलावे हम सभी जानते हैं कि हमारे राष्‍ट्र ने सैकडों वर्षों की गुलामी झेलकर हाल में इससे मुक्ति पाई है। विदेशियों ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपनायी थी, जिसे समझते हुए भी हम उससे मुक्‍त नहीं हो पा रहे हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म ... जिसके कारण हम सांस्‍कृतिक तौर पर इतने समृद्ध थे .... तक को आज निकृष्‍ट मानने के लिए मजबूर है , क्‍यूंकि आज हम इन्‍हीं के नाम पर हम आपस में लड मर रहे हैं। बाहरी और भीतरी आतंकवाद के कारण हमारा देश बहुत ही संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। ऐसे में हमें आपस में एकता बनाए रखने की बहुत आवश्‍यकता है। आज लोगों का ध्‍यान सिर्फ अपने व्‍यक्तिगत लाभ पर ही लगा होता है, पर यदि राष्‍ट्र ही न बचा, विश्‍व ही न बचा, प्राकृतिक संसाधन ही न बचे, तो क्‍या व्‍यक्तिगत लाभ प्राप्‍त हो पाएगा, जरूरत है अपने सोंच को व्‍यापक बनाने की, दिलोदिमाग में विश्‍व बंधुत्‍व की भावना को बनाए रखने की, इसके बाद ही ईश्‍वर पर विश्‍वास रखें!!

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के प्रचार प्रसार में आपके सहयोग की अपेक्षा

 केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) ने देशभर की 100 फीमेल अचीवर्स का चुनाव करने के लिए फेसबुक के साथ मिलकर ‘#100वीमेन इनीशिएटिव’ नाम का कैंपेन शुरू किया। एमडब्ल्यूसीडी और फेसबुक का ये साझा प्रयास देश की 100 ऐसी महिलाओं को चुनना था जो अपने-अपने क्षेत्र में कुछ अनूठा कर रही है। लोगों को मंत्रालय के फेसबुक पेज में जाकर महिला के कार्यों से संबंधित एक वीडियो अपलोड करना और बताना था कि उसने जिस महिला का चुनाव किया वह क्यों भारत की 100 सबसे प्रभावशाली महिला के रूप में सम्मानित की जानी चाहिए.”
15 जुलाई 2015 से 30 सितंबर 2015 तक मंत्रालय के फेसबुक पेज (https://www.facebook.com/ministryWCD) पर ऐसी महिलाओं का नामांकन शुरू हुआ जो कुछ हटकर और खास हैं. एक निर्णायक मंडल द्वारा देशभर से भेजी गई सभी प्रविष्टियों में से 200 प्रविष्टियों पर 7 नवंबर 2015 से वोटिंग शुरु हुई, इन 200 महिलाओं में से विजेता चुनी जाने वाली 100 महिलाओं को सम्मानित किया गया। विजेताओं की घोषणा जनवरी 2016 में हुई। 22 जनवरी को राष्‍ट्रपति भवन में लंच पर आमंत्रित करके महामहिम प्रणव मुखर्जी ने हमें सम्‍मानित किया। 

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 ‪#‎100women‬ में मेरे सेलेक्‍शन की खबर के साथ इस बार नया साल मेरे लिए खुशियां लेकर आया .. जनवरी के अंतिम सप्‍ताह ने इन खुशियों को पूर्ण रूप से अनुभव करने का आनंद दिया.... देशभर से चुनी गई 100 सशक्‍त महिलाओं में खुद को शामिल देखकर अवार्ड प्राप्‍त करना .. इसके साथ साथ राष्‍ट्रपति महोदय के साथ लंच करना ..... गणतंत्र दिवस समारोह में विशिष्‍ट अतिथि के रूप में सम्‍मान प्राप्‍त करना .... ये सब मेरे लिए अकाल्‍पनिक और अविस्‍मरणीय बातें रहीं .... जीवनभर एक खास क्षेत्र में मेरे समर्पण भरे कार्य ने मुझे जो पुरस्‍कार दिलाया ... उसके लिए महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी जी का जितना आभार व्‍यक्‍त करूं कम ही होगा .... नोमिनेशन और वोटिंग के वक्‍त हमारे फेसबुक मित्रों ने हमें जो मदद की और मुझे यहां तक पहुंचाया उनका भी बहुत बहुत शुक्रिया!




22 जनवरी को राष्‍ट्रपति भवन में हमारे बैठने की व्‍यवस्‍था पहले से तय थी , राष्‍ट्रपति महोदय और मेनका गांधी जी के 1 नं के अंडाकार टेबल के चारो ओर 12 टेबल और लगे हुए थे , मेरे बैठने की व्‍यवस्‍था 11 नं टेबल पर थी , जिसमें हम पांच वूमेन एचीवर्स के साथ WCD के तीन सदस्‍य , ईटीवी हिंदी और उर्दु के प्रमुख जगदीश चंद्र जी और दो मेहमान थे, हमारे साथ बैठे रोहतक से आए डॉक्‍टर जोगिन्‍द्र पाल चुग जी की पत्‍नी Renu Chugh , एजुकेशन के क्षेत्र से ही वूमेन एचीवर थी , टेबल नं 6 पर थी। दिल्‍ली के डीपीएस से रिटायर हो चुकी तमन्‍ना सपेशल स्‍कूल की फाउंडर , पेसिडेंट , एजुकेशन के क्षेत्र की ज्‍यूरी मेम्‍बर श्रीमती श्‍यामा कोना हमारे टेबल के बगल में ही टेबल नं 10 पर बैठी हुई थी। इस व्‍यवस्‍था के बारे में हमें राष्‍ट्रपति भवन में जाने से पूर्व ही मालूम हो चुका था। खाने से पहले श्रीमती मेनका गांधी ने हम 100 एचीवर्स की सराहना करते हुए हमें शुभकामनाएं दी। खाना शुरू हुआ, खाने के दौरान नौसेना की विशेष धुन बजती रही। खुद को विशेष अनुभव कराता हुआ आधे पौन घंटे का समय कैसे व्‍यतीत हो गया, पता भी न चला, सिर्फ यादें ही शेष रह गई।

ज्‍योतिष के क्षेत्र में जीवन भर काम करती हुई , इस क्षेत्र में मौजूद सभी अंधविवश्‍वासों पर चोट करती हुई ,अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित की गई ज्‍योतिष की नई शाखा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के बारे में जानकारी प्रदान करती हुई इतने वर्षों से इंटरनेट में नियमित लिखने का पूरा पूरा फायदा मुझे मिल गया, यह पुरस्‍कार समाज के बीच मुझे एक नई पहचान देने में समर्थ हुआ है , जिसके फलस्‍वरूप जीवन में एक मोड की संभावना प्रशस्‍त हुई है , जो समाज से अंधविश्‍वास का खात्‍मा कर ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में स्‍थापित कर सकता है, इसके लिए भी आप सबों का सहयोग अपेक्षित है।